Monday, August 16, 2021

शोक त्याज्य है !



शोक त्याज्य है !



सन्तापाद्  भ्रश्यते  रूपं  

सन्तापाद् भ्रश्यते बलम्।

सन्तापाद्  भ्रश्यते  ज्ञानं 

      सन्तापाद् व्याधिमृच्छति।। 


शोक करने से रूप-सौन्दर्य नष्ट होता है, शोक करने से पौरूष नष्ट होता है, शोक करने से ज्ञान नष्ट होता है एवं शोक करने से मनुष्य का शरीर दुःखों का घर हो जाता है।  अतैव शोक करना त्याज्य है। 

'श्री रामचरितमानस' अनुसार सच्चा मित्र कौन है ?'

'श्री रामचरितमानस' अनुसार सच्चा मित्र कौन है ?'





'श्री रामचरितमानस' में एक बहुत ही सुन्दर प्रसंग है जो सच्चे मित्र के बारे में विस्तार से वर्णन करता है।  ये प्रसंग 'किष्किन्धाकाण्ड में है :

सच्चे एवं कुटिल मित्र की पहचान होना अत्यावशयक है गोस्वामी तुलसीदास जी ने  श्री रामचरितमानस में अच्छे मित्र के गुणों पर प्रकाश डाला है 

जे   न   मित्र  दुख  होहिं  दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।।  

निज दुख गिरि सम रज करि जाना।  मित्रक दुख रज मेरु समाना।। 

कहने का तात्पर्य है कि जो लोग मित्र के दुःख से दुःखी नहीं होते , उन्हें देखने से ही भारी पाप लगता है। अपने पर्वत सदृश विकराल दुःख को धूल के कण के सदृश छोटा समझना पर मित्र के धूल के कण सदृश तुच्छ दुःख को भी सुमेरू पर्वत सदृश मानना ही सच्चे मित्र का लक्षण होता है। 

जिन्ह कें असि मति सहज न आई।  ते सठ कत हठि करत मिताई।।

कुपथ   निवारि   सुपंथ      चलावा।   गुन प्रगटै  अवगुनन्हि दुरावा।। 

जो लोग स्वभाव से मंदबुद्धि और मूर्ख होते हैं, ऐसे लोगों को आगे बढ़कर कभी भी किसी से मित्रता नहीं करनी चाहिए।  एक अच्छा मित्र होने के लिए बुद्धिमान और विवेकशील मनुष्य होना भी आवश्यक है।  इसका तात्पर्य यह है कि एक सच्चे मित्र का धर्म है कि वह अपने मित्र को अनुचित और अनैतिक कार्य करने से रोके, साथ ही उसे सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करे।  उसके सद्गुण प्रगट करे और अवगुणों को छिपाये।  


देत     लेत     मन    संक  न  धरई। बल  अनुमान  सदा  हित  करई।।

बिपति   काल  कर  सतगुन   नेहा।  श्रुति  कह  संत  मित्र  गुन  एहा।। 


किसी मनुष्य के पास अपरिमित धन-सम्पदा हो परन्तु यदि वह आवश्यकता के समय अपने मित्र के काम ना आए तो सब व्यर्थ है।  इसलिए अपनी क्षमतानुसार बुरे समय में विपत्ति में अपने मित्र की सहायता करनी चाहिए। एक अच्छे और सच्चे मित्र की यही पहचान है कि वह दुःख व विपत्ति के समय अपने मित्र की समुचित सहायता के लिए सदैव तत्पर रहे।  वेदों और शास्त्रों में कहा गया है कि विपत्ति के समय और अधिक स्नेह करनेवाला ही सच्चा मित्र होता है। 


आगें   कह    मृदु    बचन     बनाई।  पाछें   अनहित   मन  कुटिलाई।। 

जाकर   चित  अहि  गति सम भाई।  अस  कुमित्र  परिहरेहिं  भलाई।। 

 

वह मित्र जो प्रत्यक्ष में तो बनावटी मधुर वचन कहता है और परोक्ष में बुराई करता है, जिसका मन साँप की चाल के समान  वक्री हो अर्थात् जो आपके प्रति मन में कुटिल विचार व दुर्भावना रखता हो, हे भाई ! ऐसे कुमित्र का परित्याग करना ही श्रेयस्कर है। 



कुल नहीं, सदाचरण आपकी पहचान




कुल नहीं, सदाचरण आपकी पहचान  



न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति मे मतिः। 

  अन्तेष्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते।। 


ऊँचे कुल या नीचे कुल में जन्म लेने से मनुष्य की पहचान नहीं हो सकती। मनुष्य की पहचान उसके सत्कर्म से उसके सदाचार से उसके चरित्र से होती है, भले ही वह निम्न कुल में ही क्यों न उत्पन्न हुआ हो।  अपने आचरण से ही व्यक्ति समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। 

अतैव सदैव श्रेष्ठ आचरण ही करना चाहिए, जन्म का भी महत्त्व है पर आचरण - चरित्र सर्वोपरि है। 



स्वतंत्रता के लाभ

 स्वतंत्रता के लाभ 


स्वातन्त्र्यात्   सुखमाप्नोति 

स्वातन्त्र्यात् लभते परम्। 

स्वातन्त्र्यात् निर्वृत्तिं गच्छेत्

  स्वातन्त्र्यात्   परमं   पदम्। 


स्वतन्त्रता से मनुष्य सुख को प्राप्त करता है, स्वतन्त्रता से परम तत्व को प्राप्त करता है, स्वतन्त्रता से निर्वृत्ति यानी शान्ति को  प्राप्त करता है, स्वतन्त्रता से परम पद को प्राप्त करता है। 

संगति का परिणाम

 


संगति का परिणाम 



यदि सन्तं सेवति यद्य सन्तं

    तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।  

 वासो यथा रङ्गवशं प्रयाति 

      तथा स तेषां वशमभ्युपैति।।  



कपड़े को  जिस रंग में रंगा जाए उस पर वैसा ही रंग चढ़ जाता है।  ठीक इसी प्रकार सज्जन के साथ रहने पर उनकी सेवा करने पर सज्जनता, चोर के साथ रहने पर चोरी एवं तपस्वी  के साथ रहने पर तपश्चर्या का रंग चढ़ जाता है। 


"संसर्गजा दोषगुणा: भवन्ति।" 

अर्थात् संसर्ग से संगति से, किसी के साथ किसी के संग रहने से दोष या गुण  उत्पन्न होते हैं।  जैसा संग वैसा मन। 

 


गुणा गुणज्ञेषु गुणा भवन्ति
ते निर्गुणं प्राप्य भवन्ति दोषाः ।
सुस्वदुतोयाः प्रवहन्ति नद्यः
समुद्रमासाद्य भवन्त्यपेयाः ।।  

मूर्ख के लक्षण

 


मूर्ख के लक्षण 



मूर्खस्य पञ्चचिन्हानि 

गर्वो  दुर्वचनं  तथा। 

क्रोधश्च     दृढ़वादश्च 

    परवाक्येष्वनादरः।।  


मूर्खों के पाँच लक्षण होते हैं - गर्व, दुर्वचन अर्थात् अपशब्द, क्रोध, दृढ़वाद यानी हठ एवं दूसरों की बातों का विचारों का अनादर करना।   

Saturday, August 7, 2021

 "India builds world's highest motorable road 

in Union Territory Ladakh"


The Border Road Organisation (BRO) has constructed World's highest motorable road yet another milestone, and thus smashing the previous record that was held by Bolivia. The road has been built in eastern Ladakh at a staggering height of 19, 300 feet.





BRO has built a 52 Km black-top road across Umlinga Pass , breaking the previous record for a road in Bolivia linking to the volcano at 18,953 feet .

The road was built at a greater elevation than Mount Everest base camps, with the south base camp in Nepal being 17,598 feet and north base camp in Tibet being 16,900 feet .

Umlinga pass is now connected with a blacktop road to enhance socio-economic conditions and promote tourism in Ladakh. It will prove to be a boon to the local population as it offers an alternate direct route connecting Chisumle and Demchok from Leh .


India builds world's highest motorable road

This road was built at a considerably higher height than the Siachen Glacier that stands at 17,700 feet above sea level. The temperature drops to -40 degrees Celsius in the winter , and the oxygen level is about half of regular areas at this altitude which makes infrastructure development in such a severe and difficult environment, exceedingly arduous.