Saturday, August 29, 2026

ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया द्वारा डॉ. अजय कुमार ओझा की तीन भाषाओं में तीन पुस्तक का लोकार्पण

 ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया द्वारा डॉ. अजय कुमार ओझा की तीन भाषाओं में तीन पुस्तक का लोकार्पण 







ऑथर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया (Authors Guild of India) द्वारा दिल्ली के पीजीडीएवी महाविद्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में डॉ. अजय कुमार ओझा (Dr. Ajay Kumar Ojha) की तीन भाषाओं में तीन पुस्तक का लोकार्पण देश के गणमान्य व्यक्तियों द्वारा किया गया। ये तीन पुस्तकें इस प्रकार हैं :

1. धोबिया जल बीच मरत पियासा  (हिंदी ) 

अनुराधा प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकशित यह पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है। 




2 . INDIA IN KOREA (English)

अनुराधा प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है। 






3.  संक्षिप्त वाल्मीकीयरामायण कथासार (भोजपुरी) 

यह पुस्तक "रामायण प्रसार परिशोध प्रतिष्ठान"  अम्बाला से प्रकाशित की गई है और निम्न पते पर संपर्क कर निशुल्क प्राप्त की जा सकती है। 

रामायण प्रसार परिशोध प्रतिष्ठान 

423/10 , प्रीत नगर

अम्बाला शहर - 134003 (भारत)

दूरभाष : 9467909649  






ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा विचार गोष्ठी एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन

         ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा विचार गोष्ठी 

एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन 





ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (Authors Guild of India) एवं पी जी डी ए वी महाविद्यालय (PGDAV College), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में "विचार गोष्ठी ('सोशल मीडिया : कितना सोशल') एवं काव्य गोष्ठी" का आयोजन दयानंद सभागार में किया गया। इस अवसर पर पी जी डी ए वी महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. मुकेश अग्रवाल मुख्य अतिथि थे।

         कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के महासचिव डॉ. शिवशंकर अवस्थी ने सर्वप्रथम सोशल मीडिया के वैश्विक इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा - “आज सिर्फ युवा ही नहीं बल्कि हर उम्र का व्यक्ति सोशल मीडिया के विभिन्न तंत्रों से जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया सदैव परिवर्तनशील रहा है और भविष्य में भी बदलाव होता रहेगा।" 

           दिलीप चौबे  जी ने अपने संबोधन में कहा - “आज हमारे समाज में सोशल मीडिया इस कदर हावी है कि कोई भी अछूता नहीं है। इसके सही और गलत दोनों पक्ष हैं।"

          डॉ.विमलेश कांति वर्मा ने कहा - “सोशल मीडिया पर असंवैधानिक सूचनाओं की भ्रामकता गुमराह करने वाली देखने को मिलती हैं। इस पर रोक लगनी चाहिए।”

          डॉ. राकेश पाण्डेय ने कहा - “हर नयी उत्पत्ति के गुण दोष होते हैं। इसका मूल्यांकन समय-समय पर होते रहना चाहिए। प्रिंट मीडिया में जवाबदेही होती है लेकिन सोशल मीडिया की कोई जवाबदेही तय नहीं है।"

          श्री  गोस्वामी जी ने कहा - “सोशल मीडिया नया नहीं है बल्कि बहुत पुराना है क्योंकि पहले सोशल मीडिया का माध्यम महिलाएं हुआ करतीं थीं। सोशल मीडिया का मतलब है चटपटी बातें। सोशल मीडिया के कोई मापदंड नहीं हैं। धार्मिक ग्रंथों का मूल्यांकन भी गलत हो रहा है।” उन्होंने कालिदास का उदाहरण देते हुए कहा - जो पुराना है वह हमेशा सच हो यह जरूरी नहीं है।" 

         नेशनल बुक ट्रस्ट से पधारे श्री राकेश यादव ने कहा - “सोशल मीडिया बाल्यावस्था में है।  अभी किशोरावस्था को भी प्राप्त नहीं हुआ है। भविष्य में ऐसी तकनीक आने वाली है उसकी खबरें छन कर आने लगी हैं। उन्हें पढ़कर-सुनकर लगता है कि तब शायद सोशल मीडिया किशोरावस्था में प्रवेश करेगा।”

         डॉ. अजय ओझा ने अपनी बात रखते हुए कहा - “विचार व्यक्त करने की आजादी हर व्यक्ति को घर बैठे मिल गई  है। इसके माध्यम से हमें बहुत पुराने संबंधों की जानकारी मिल जाती है, अनायास बहुत पुराने दोस्तों, संबंधियों, हितैषियों   से संपर्क स्थापित हो जाता है  जिन्हें   शायद हम भूल चुके हैं -  अब सोशल मीडिया के विभिन्न तंत्रों से हम एक दूसरे को जोड़ते और एक दूसरे से जुड़ते चले जा रहे हैं। "

        आचार्य अनमोल ने अपने वक्तव्य में कहा - "हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे अनुज सोशल मीडिया के दायित्व को समझें। सोशल मीडिया पर तर्क को कुतर्क के रूप में पूरे दावे के साथ पेश किया जा रहा है। सोशल मीडिया एक तलब के रूप में विकसित हो गया है।"

      श्री किशोर कुमार मालवीय जी ने कहा - “सोशल मीडिया एक अप्रत्यक्ष द्वंद्व  है क्योंकि यह अच्छे और बुरे दोनों तरह के पक्षों से भरा हुआ है। काटो या चाटो की रणनीति पर राजनीतिक यूट्यूब चैनल चल रहे हैं। डीपफेक वीडियो से बचना चाहिए।” 

        डॉ. हरिसिंह पाल ने कहा - “पहले जब कोई कविता या लेख छपता था तो उसमें अपना नाम दूसरे लोगों को दिखाकर खुश हुआ करते थे। लेकिन आश्चर्य का विषय है कि सोशल मीडिया का न तो कोई संपादक है। न कोई संचालक । सब कुछ आम आदमी के हाथों में पहुंच गया है। वे खुद संपादक हैं और संचालक हैं। हमने अपने बाप-दादाओं से सीखा है लेकिन आज की पीढ़ी हमसे नहीं बल्कि सोशल मीडिया से सीख रही है।" 

           डॉ. रेखा चौहान ने अपने उद्बोधन में कहा - "सिक्के के दो पहलू की तरह है सोशल मीडिया। अच्छी  बातें अपनाएं और बुरी आदतों को तिलांजलि दें तभी सोशल मीडिया सार्थक होगा।"

         श्री  पंकज जी ने अपने अनुभव के आधार पर कहा - "हमने दो सदियों को देखा है।  पहले के दौर में प्रिंट मीडिया सशक्त रहा है। प्रिंट मीडिया इतना प्रभावशाली रहा है कि सरकारों का पतन तक हो जाता था लेकिन अब सोशल मीडिया सरकार तो क्या एक पार्षद तक को नहीं हिला सकता। सोशल मीडिया पर दिख रहीं सूचनाओं की सत्यता प्रमाणित करने का कोई माध्यम नहीं है।”

         श्री शेखर जी ने अपनी बात रखते हुए कहा - “हम इंसान  हैं तो हम सोशल होंगे ही। हमारे देश में सोशल मीडिया यानी सामाजिक संचार का इतिहास सदियों पुराना है। अब इसका रूप बदल गया है। पहले भी गांव के व्यक्तियों से सोशल मीडिया संचालित होता था और आज भी गांव-शहर के हर घर से संचालित हो रहा है सोशल मीडिया।”

         मुख्य अतिथि डॉ. मुकेश अग्रवाल जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा - "प्रबुद्ध वक्ताओं ने सोशल मीडिया पर जिस तरह से प्रकाश डाला वो सराहनीय था। सोशल मीडिया को लेकर जागरूकता स्पष्ट दिखाई दे रही है। इसके सभी पहलुओं को लेकर प्रबुद्ध वर्ग सतर्क है। यह एक अच्छा संकेत है। 'सोशल मीडिया : कितना सोशल', यह एक ऐसा मुद्दा है कि इसे भारतीय परिवेश में ढालने की जरूरत है। विज्ञापनों का एक बड़ा माध्यम बन गया है सोशल मीडिया लेकिन इसमें कौन-सा विज्ञापन सही है कौन-सा गलत है ये तय कर पाना संभव नहीं है। एक और दुविधा एकल परिवार में घर कर रही है कि वो अपने छोटे बच्चों को मोबाइल से कैसे बचाएं ? इस वजह से छोटी उम्र के बच्चे सोशल मीडिया के आदी  हो चुके हैं।" 

          दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। काव्य गोष्ठी के पहले वरिष्ठ मीडियाकर्मी, एडवोकेट और रचनाकार डॉ. अजय कुमार ओझा की तीन भाषा में तीन पुस्तकों का लोकार्पण किया गया ।  ये पुस्तकें हैं  : हिंदी में " धोबिया जल बीच मरत पियासा", अंग्रेजी में  "INDIA IN KOREA" और भोजपुरी में "संक्षिप्त वाल्मीकीयरामायण कथासार" । 

काव्य गोष्ठी का संचालन श्री शेखर जी ने किया। आचार्य अनमोल ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर काव्य गोष्ठी का शुभारंभ किया। कवियों ने सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। 

           डॉ. हरीष अरोड़ा ने कविता के माध्यम से भाषा संवाद पर केंद्रित अपनी कविता सुनाई - " शब्दों से बाहर भी एक भाषा होती है…। 'बक्से में बंद एक लोटा' शीर्षक से भी एक कविता सुनाई।"

            डॉ. अजय कुमार ओझा ने भी एक कविता का पाठ किया  - “हम तो भाई विषपायी  हैं…।”

            डॉ. पन्ना लाल ने सुनाया - “आजादी का पर्व मना रहे सब है चंगा…”

            डॉ. रेखा चौहान अपनी कविता के माध्यम से सोशल मीडिया पर कटाक्ष करते हुए सुनाया - " समय बदल रहा है चेहरे बदल रहे हैं जेब से मोबाइल निकल रहे हैं…”

            श्री एस. के. भटनागर ने अपनी शब्दांजलि इस प्रकार पेश की - "सूरत दिल से उतरती नहीं, फिर क्यूं" 

           डॉ शिवशंकर अवस्थी ने अपनी कविता के माध्यम से बताया - “मेरी तमन्नाओं का शहर…सबका होता अपना मकान…" । 

           द्राक्षा  ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा - "दिलों के धागे टूट चुके हैं…। "

           आचार्य अनमोल ने सुनाया - “भाव कपट के…उठो आज दिखला दो अपने अंदर के शोले…" 

           श्री  शेखर जी ने अपनी गजल "हम नदी के रास्ते में बनाते हैं घर…” सुनाई। 

            अध्यक्षीय कविता पाठ करते हुए मुख्य अतिथि ने 'एक अनाथ बच्चा' शीर्षक से कविता पाठ किया - " मैंने सपने में मां को देखा…मां जैसी ही लगती थी।”

          समापन समारोह में सभी आमंत्रित वक्ताओं और श्रोताओं को  महासचिव डॉ. शिवशंकर अवस्थी ने धन्यवाद दिया। कार्यक्रम का विधिवत समापन राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम्' एवं राष्ट्र गान 'जन-गण-मन'  से हुआ।

Friday, August 28, 2026

सनातन धर्म में रक्षाबंधन: उद्भव और महत्त्व

 सनातन धर्म में रक्षाबंधन: उद्भव और महत्त्व






सनातन धर्म में त्योहार केवल आमोद-प्रमोद के साधन नहीं हैं। वे आध्यात्मिक, सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों के संवाहक हैं। इन्हीं में से एक अत्यंत पवित्र और व्यापक त्योहार है - रक्षाबंधन। प्रत्येक वर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम, त्याग और सुरक्षा के संकल्प का प्रतीक है। 'रक्षाबंधन' का शाब्दिक अर्थ है - 'रक्षा का बंधन' या 'ऐसा सूत्र जो सुरक्षा का दायित्व सौंपता है'। 

रक्षाबंधन का अर्थ और शास्त्रीय परिभाषा

रक्षाबंधन दो शब्दों के मेल से बना है: रक्षा (सुरक्षा/संरक्षण) और बंधन (बांधना)। सनातन वास्तुकला और शास्त्रों के अनुसार, रक्षासूत्र (जिसे बोलचाल में राखी कहते हैं) केवल सूत का धागा नहीं है। यह संकल्प, मंत्र और शुभाशीष से अभिमंत्रित एक सुरक्षा कवच है।
वैदिक काल में इसे 'रक्षा सूत्र' या 'मणिबंध' कहा जाता था। पुरोहित अपने यजमानों को, राजा अपने सैनिकों को, और गुरु अपने शिष्यों को रक्षा सूत्र बांधते थे। मंत्रोच्चार के साथ बंधा यह धागा व्यक्ति को आसुरी शक्तियों, रोगों और भय से मुक्त रखता था। 
पर्व की तिथि और ज्योतिषीय महत्त्व
रक्षाबंधन प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में इस तिथि का विशेष महत्त्व है:
  • चंद्रमा की पूर्णता: श्रावण पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपनी पूर्ण कलाओं के साथ उदित होता है। चंद्रमा को मन का कारक माना गया है। अतः इस दिन मन शांत, प्रसन्न और पवित्र होता है।
  • भद्रा का विचार: शास्त्रों के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन 'भद्रा काल' का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा को शनिदेव की बहन माना गया है, जिसके दौरान शुभ कार्य (जैसे राखी बांधना) वर्जित होते हैं। भद्रा की समाप्ति के बाद ही राखी बांधना शास्त्रसम्मत है।
  • श्रवण नक्षत्र: इस दिन प्रायः श्रवण नक्षत्र होता है, जो ज्ञान, शक्ति और पवित्रता का प्रतीक है। 

रक्षाबंधन का पौराणिक उद्भव
सनातन धर्म के पुराणों में रक्षाबंधन के उद्भव से जुड़ी कई दिव्य कथाएं मिलती हैं। ये कथाएं सिद्ध करती हैं कि यह पर्व मूलतः केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह संकट के समय रक्षा के संकल्प का प्रतीक था।
क) इंद्र और शची की कथा (भविष्य पुराण)
पौराणिक काल में देवों और असुरों के बीच 12  वर्षों तक भयंकर युद्ध चला। असुरों के राजा वृत्रासुर ने देवताओं को परास्त कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। देवराज इंद्र अत्यंत निराश और भयभीत होकर देवगुरु बृहस्पति के पास गए।
  • इंद्र की व्याकुलता देखकर इंद्राणी (शची) ने श्रावण पूर्णिमा के दिन एक रेशमी धागे को मंत्रों से अभिमंत्रित किया।
  • शची ने उस अभिमंत्रित धागे को इंद्र की कलाई पर बांधा।
  • इस रक्षासूत्र की शक्ति से इंद्र ने असुरों को पराजित किया और स्वर्ग वापस पा लिया।
  • सीख: यह कथा दर्शाती है कि रक्षासूत्र सबसे पहले एक पत्नी ने पति की विजय और सुरक्षा के लिए बांधा था।

ख) भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी (श्रीमद्भागवत पुराण)
राजा बलि ने सौ अश्वमेध यज्ञ पूरे कर स्वर्ग पर अधिकार करने का प्रयास किया। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर बलि से तीन पग भूमि मांगी और उसका अहंकार चूर किया। दानवीर बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर विष्णु जी ने उसे वरदान मांगने को कहा। बलि ने मांग की कि भगवान सदा उसके सामने (पाताल लोक में) रहें।
  • विष्णु जी के पाताल जाने से माता लक्ष्मी चिंतित हो गईं।
  • नारद जी की सलाह पर माता लक्ष्मी ने एक साधारण महिला का रूप धरा और राजा बलि के पास गईं।
  • श्रावण पूर्णिमा के दिन उन्होंने बलि की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा और उसे अपना भाई बनाया।
  • उपहार स्वरूप माता लक्ष्मी ने राजा बलि से भगवान विष्णु को वापस मांग लिया। बलि ने सहर्ष अपनी बहन की इच्छा पूरी की।
ग) भगवान कृष्ण और द्रौपदी (महाभारत)
महाभारत काल में शिशुपाल के वध के समय भगवान श्रीकृष्ण की उंगली कट गई और उससे रक्त बहने लगा। उपस्थित सभी लोग कपड़े की तलाश करने लगे।
  • तभी द्रौपदी ने बिना क्षण गंवाए अपनी कीमती रेशमी साड़ी का पल्लू फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया।
  • श्रीकृष्ण ने इस धागे को रक्षा सूत्र माना और द्रौपदी को वचन दिया कि वे संकट के समय उसकी रक्षा करेंगे।
  • जब दुःशासन ने भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब श्रीकृष्ण ने अद्भुत रूप से वस्त्र बढ़ाकर द्रौपदी की लाज बचाई।
घ) यमराज और यमुना की कथा
एक अन्य कथा के अनुसार, मृत्यु के देवता यमराज को उनकी बहन यमुना ने कई वर्षों तक मिलने के लिए बुलाया, लेकिन व्यस्तता के कारण वे नहीं जा सके। जब यमराज अपनी बहन से मिलने पहुंचे, तो यमुना ने उनका भव्य स्वागत किया, तिलक लगाया और हाथ में रक्षा सूत्र बांधा। प्रसन्न होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन से राखी बंधवाएगा और यमुना में स्नान करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा। 

ऐतिहासिक संदर्भ और राष्ट्र रक्षा
समय के साथ रक्षाबंधन का सामाजिक स्वरूप बदला और यह भाई-बहन के त्योहार के रूप में स्थापित हुआ। मध्यकालीन और आधुनिक इतिहास में इसके कई बड़े उदाहरण मिलते हैं:
  • सिकंदर और राजा पुरु (पोरस): जब सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया, तो उसकी पत्नी रेक्सोना (रोशनाक) राजा पोरस की वीरता से भयभीत थी। उसने पोरस को रक्षासूत्र भेजकर अपना भाई बनाया और युद्ध में सिकंदर को न मारने का वचन मांगा। पोरस ने युद्धभूमि में सिकंदर पर वार करने के लिए हाथ उठाया, लेकिन कलाई पर बंधी राखी देखकर रुक गए।
  • रानी कर्णावती और हुमायूं: चित्तौड़ की राजपूत रानी कर्णावती पर जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने आक्रमण किया, तो रानी ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेजी। हुमायूं ने राखी का मान रखा और अपनी सेना लेकर चित्तौड़ की रक्षा के लिए चल पड़ा।
  • रवींद्रनाथ टैगोर और बंग-भंग आंदोलन (1905): आधुनिक इतिहास में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने रक्षाबंधन का उपयोग एक राजनीतिक और सामाजिक अस्त्र के रूप में किया। अंग्रेजों ने जब बंगाल का विभाजन (हिंदू-मुस्लिम एकता तोड़ने के लिए) किया, तब टैगोर ने दोनों समुदायों के लोगों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधने का आह्वान किया। यह 'राष्ट्रीय रक्षाबंधन' एकता का प्रतीक बना। 
वैदिक और शास्त्रीय पूजा विधि
सनातन परंपरा के अनुसार, रक्षाबंधन की एक विशिष्ट शास्त्रीय विधि है, जिसका पालन करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है:
1.सामग्री संकलन: पूजा की थाली में राखी, रोली (कुमकुम), अक्षत (अखंडित चावल), दीपक, मिठाई, नारियल और गंगाजल होना चाहिए।
2.दिशा का चयन: राखी बांधते समय भाई का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। यह दिशाएं शुभ और सकारात्मक ऊर्जा वाली मानी जाती हैं। बहन का मुख पश्चिम की ओर होता है।
3.तिलक और अक्षत: सबसे पहले बहन भाई के माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाती है। अक्षत अखंडता और दीर्घायु का प्रतीक है।
4.आरती उतारना: बहन भाई की आरती उतारती है ताकि उसे किसी की बुरी नजर न लगे।
5.रक्षा सूत्र बांधना: भाई के दाहिने हाथ की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा जाता है। शास्त्रों में दाहिना हाथ कर्म और संकल्प का प्रतीक माना गया है।
6.रक्षा मंत्र का जाप: राखी बांधते समय निम्नलिखित वैदिक मंत्र का उच्चारण अत्यंत कल्याणकारी माना जाता है। 
"येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः।
तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल।।"
(अर्थ: जिस रक्षासूत्र से महादानी असुरराज राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधती हूँ। हे राखी! तुम अडिग रहना, अपने रक्षा के संकल्प से कभी विचलित न होना।)
 रक्षाबंधन का बहुआयामी महत्त्व
यह पर्व केवल एक पारिवारिक रस्म नहीं है, बल्कि इसके गहरे आध्यात्मिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और आर्थिक आयाम हैं।
क) आध्यात्मिक महत्त्व
सनातन दर्शन के अनुसार, धागा (सूत्र) ब्रह्म का प्रतीक है जो पूरी सृष्टि को एक साथ जोड़े हुए है। राखी बांधना इस बात का स्मरण कराता है कि हम सब ईश्वर के संरक्षण में हैं। यह आत्मा द्वारा परमात्मा के प्रति पूर्ण समर्पण का भी प्रतीक है।
ख) सामाजिक समरसता और समावेशन
रक्षाबंधन जाति, वर्ग और धर्म की दीवारों को तोड़ता है। कोई भी स्त्री किसी भी पुरुष को भाई मानकर राखी बांध सकती है। यह समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान, सुरक्षा और गरिमापूर्ण दृष्टिकोण विकसित करने का एक सशक्त माध्यम है।
ग) पारिवारिक सुदृढ़ता
आज के भागदौड़ भरे और एकल परिवारों (Nuclear Families) के युग में यह त्योहार बिखरते रिश्तों को जोड़ने का काम करता है। दूर रहने वाले भाई-बहन इस दिन एक साथ आते हैं, जिससे पारिवारिक ताना-बाना मजबूत होता है।
घ) मनोवैज्ञानिक सुरक्षा
कलाई पर बंधा धागा भाई को निरंतर उसके कर्तव्यों का बोध कराता है। यह बहन को एक मनोवैज्ञानिक संबल देता है कि संकट के समय उसका भाई उसके साथ खड़ा है। वहीं भाई के भीतर उत्तरदायित्व और पुरुषार्थ की भावना जागृत होती है। 

क्षेत्रवार विविधता: भारत के विभिन्न रूपों में रक्षाबंधन
भारत एक सांस्कृतिक विविधताओं का देश है। श्रावण पूर्णिमा को देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नामों और विधियों से मनाया जाता है:
क्षेत्र/राज्यपर्व का नामविशेषता और महत्त्व
उत्तर भारतरक्षाबंधन / राखीभाई-बहन का मुख्य त्योहार, कलाई पर धागा बांधना।
पश्चिमी घाट (महाराष्ट्र, गोवा)नराली पूर्णिमासमुद्र देवता (वरुण) को नारियल अर्पित करना ताकि मछुआरों की रक्षा हो।
दक्षिण भारत (तमिलनाडु, केरल)अवनी अवित्तमब्राह्मणों द्वारा पुराना जनेऊ (यज्ञोपवीत) बदलकर नया जनेऊ धारण करना।
मध्य भारत (मप्र, छत्तीसगढ़)कजरी पूर्णिमाखेतों में बोए गए गेहूं/जौ के पौधों की पूजा, अच्छी फसल की कामना।
ओडिशा और पश्चिम बंगालझूलन पूर्णिमाराधा-कृष्ण की मूर्तियों को झूले पर सजाकर उत्सव मनाना।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य और चुनौतियां
जैसे-जैसे समय बदल रहा है, रक्षाबंधन के स्वरूप में भी बदलाव आया है। आज इस त्योहार के सामने कुछ चुनौतियां और नए दृष्टिकोण हैं:
  • व्यावसायीकरण (Commercialization): आधुनिक समय में त्योहारों पर बाजार हावी हो गया है। राखी की सादगी की जगह महंगी और फैंसी राखियों ने ले ली है। उपहारों की कीमत से स्नेह को आंका जाने लगा है, जो इस पर्व की मूल आत्मा के विपरीत है।
  • डिजिटल रक्षाबंधन: वैश्वीकरण के कारण भाई-बहन अक्सर अलग-अलग देशों में रहते हैं। अब वीडियो कॉल पर राखी बांधना और ऑनलाइन बैंकिंग (UPI) के जरिए शगुन भेजना आम हो गया है। तकनीक ने दूरियां तो कम की हैं, लेकिन शारीरिक उपस्थिति का स्पर्श और भाव गायब हो रहा है।
  • पर्यावरण के अनुकूल (Eco-friendly) राखियां: हाल के वर्षों में एक सकारात्मक बदलाव आया है। प्लास्टिक और सिंथेटिक धागों के बजाय अब गाय के गोबर, बीज (Seed Rakhi), मिट्टी और सूती धागों से बनी राखियों का चलन बढ़ा है, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचातीं। 

रक्षाबंधन का विस्तारित सामाजिक संदेश (प्रकृति और समाज की रक्षा)
आज के संदर्भ में रक्षाबंधन के अर्थ को और अधिक व्यापक बनाने की आवश्यकता है:
  1. वृक्ष रक्षाबंधन: कई सामाजिक संगठन जंगलों और पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उन्हें राखी बांधते हैं। यह प्रकृति की रक्षा का संकल्प है।
  2. सैनिकों को राखी: देश की सीमाओं पर तैनात वीर जवानों को देश की करोड़ों बहनें राखियां भेजती हैं। यह राष्ट्र की सुरक्षा करने वालों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम है।
  3. गौ माता और जीव रक्षा: सनातन धर्म में गाय को माता माना गया है। कई स्थानों पर गायों और पालतू पशुओं को रक्षासूत्र बांधकर उनकी लंबी आयु की कामना की जाती है। 
सनातन धर्म में रक्षाबंधन केवल रेशम के धागों का आदान-प्रदान नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, वादों और पवित्रता का महापर्व है। यह पर्व सिखाता है कि शक्ति का असली उपयोग निर्बलों की रक्षा करना है, जैसा कि भगवान कृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाकर सिद्ध किया था।
आज जब समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है, रक्षाबंधन जैसे त्योहारों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि नारी का स्थान समाज में सर्वोच्च है और उसकी सुरक्षा व सम्मान हर नागरिक का परम कर्तव्य है। इस पावन पर्व के मूल दर्शन को संजोकर रखना और इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी का दायित्व है। 

रक्षाबंधन के पावन अवसर पर जानी-मानी साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी डॉ. सुशीला ओझा (Dr. Sushila Ojha) का अपने भाइयों को सन्देश :
"रक्षा बंधन की हार्दिक बधाई। भाई के दाहिनी कलाई पर रक्षासूत्र बांधना -  रोली, दही अक्षत का भाई के ललाट पर तिलक। सिन्दूरी तिलक भाई के माथे पर  सद्य:जात बालरवि  शौर्य, पराक्रम की परिकल्पना, अक्षत प्यार की अविछिन्नता, निरंतरता, शाश्वतता का प्रतीक और दधि  सारी विकृतियों का नाश कर प्रेम की एकाग्रता, निश्छलता, स्थिरता का सूचक है। 
आजकल परिवार के विघटन में संबंधों में दरारें  पड़ने लगी हैं। कहीं प्रेम स्वार्थ केन्द्रित बन गया है। प्रेम की पवित्रता को पैसे से तौला जाने लगा है । 
बहनों ने भाई की कलाई पर  आकाश से चाँद उतार कर बांँधा है। यह सूत्र  मत टूटने देना भईया। हम तुम्हारे दाहिने हाथ को भी पूजती हैं। तुम्हारै शौर्य, पराक्रम, ऐश्वर्य, आयुष्मान, कीर्तिमान की शुभाकांक्षाओं सहित ! भाई भी रक्षाबंधन के प्रतीक में आशीर्वाद से बहनों की झोली भरता है। यह प्रेम का आशीर्वाद है जो अडिग, अटूट रहता है।"