जय श्रीकृष्णा -
जन्माष्टमी क्यों ?
जय श्री कृष्णा ! श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सनातन हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण, पवित्र और हर्षोल्लास से मनाए जाने वाले पर्वों में से एक है। यह केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि भगवान विष्णु के आठवें पूर्ण अवतार, लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के इस पृथ्वी पर अवतरण का उत्सव है।
सनातन काल गणना के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर पाप, अत्याचार और अधर्म अपनी चरम सीमा को लांघ जाते हैं, तब-तब सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु धर्म की पुनः स्थापना के लिए मानव रूप में अवतरित होते हैं। द्वापर युग के अंत में भारतवर्ष की स्थिति कुछ ऐसी ही हो चुकी थी। मगध, मथुरा और उसके आस-पास के क्षेत्रों में शक्तिशाली राजाओं ने जनता का शोषण करना शुरू कर दिया था। सत्ता केवल भोग-विलास और दमन का साधन बन चुकी थी।
श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का यह श्लोक इसी शाश्वत सत्य को प्रमाणित करता है:
"यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥"
पृथ्वी गाय का रूप धारण कर देवताओं के पास रोती हुई पहुँची। उसने गुहार लगाई कि राजाओं के रूप में बैठे ये राक्षस उसका भार बढ़ा रहे हैं। तब क्षीरसागर में विराजमान भगवान नारायण ने देवताओं को आश्वस्त किया कि वे स्वयं यदुवंश में कंस के कारागार में जन्म लेंगे और इस धरा को अधर्म के बोझ से मुक्त करेंगे। कृष्ण का जन्म केवल एक बालक का जन्म नहीं था, वह ब्रह्मांडीय चेतना का अंधकार को मिटाने के लिए लिया गया संकल्प था।
मथुरा का राजा उग्रसेन एक न्यायप्रिय राजा था, लेकिन उसके दुष्ट पुत्र कंस ने उसे बलपूर्वक गद्दी से उतारकर स्वयं को राजा घोषित कर दिया। कंस का आतंक इतना बढ़ गया कि उसने संतों, ऋषियों और गौ-वंश पर अत्याचार करना अपनी नीति बना लिया। परंतु, उसी कंस का अपनी चचेरी बहन 'देवकी' से अगाध प्रेम था। जब देवकी का विवाह शूरसेन के पुत्र 'वासुदेव' से हुआ, तो कंस स्वयं रथ हांककर अपनी बहन को विदा करने चला।
तभी मार्ग में एक भयंकर और अलौकिक आकाशवाणी हुई: "हे मूर्ख कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरा काल बनेगी।"
इस आकाशवाणी ने कंस के भीतर के भय को जगा दिया। उसने तुरंत तलवार निकाल कर देवकी को मारना चाहा, लेकिन वासुदेव ने बीच में आकर वचन दिया कि वे अपनी प्रत्येक संतान को कंस को सौंप देंगे। कंस ने वासुदेव और देवकी को मथुरा के कालकोठरी (कारागार) में लोहे की मोटी जंजीरों से जकड़ कर बंद कर दिया। उसने एक-एक करके देवकी की छह संतानों की निर्मम हत्या कर दी। सातवें गर्भ में शेषनाग के अंश 'बलराम' थे, जिन्हें योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। अब प्रतीक्षा थी तो केवल आठवीं संतान की।
विक्रम संवत के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और बुधवार का दिन था। रात के ठीक बारह बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, बिजली कड़क रही थी और यमुना उफान पर थी। मथुरा के कारागार के चारों ओर कड़ा पहरा था। लेकिन नियति अपना खेल रच रही थी।
जैसे ही भगवान कृष्ण के अवतरण का क्षण आया, कालकोठरी में एक अलौकिक प्रकाश फैल गया। चतुर्भुज रूप में, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए साक्षात भगवान नारायण देवकी और वासुदेव के सामने प्रकट हुए। भगवान ने वासुदेव से कहा कि वे उन्हें तुरंत गोकुल में नंदबाबा के घर छोड़ आएं और वहाँ जन्मी कन्या (योगमाया) को मथुरा ले आएं।
इसके बाद जो हुआ, वह चमत्कार से कम नहीं था:
- कारागार के पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए।
- वासुदेव और देवकी के हाथों और पैरों में बंधी लोहे की जंजीरें स्वतः ही खुल गईं।
- कालकोठरी के विशाल लोहे के दरवाजे अपने आप खुलते चले गए।
वासुदेव ने नन्हे कृष्ण को एक सूत की टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठाकर आधी रात को ही मूसलाधार बारिश के बीच गोकुल की ओर चल पड़े। मार्ग में विशाल और उफनती हुई यमुना नदी थी। जल का स्तर लगातार बढ़ रहा था। लेकिन जैसे ही वासुदेव नदी में उतरे, भगवान शिव के स्वरूप शेषनाग ने अपने फनों से छत्र तानकर बालक कृष्ण को बारिश से बचाया।
यमुना नदी का जल लगातार ऊपर उठ रहा था क्योंकि वह अपने स्वामी के चरणों को स्पर्श करना चाहती थी। जैसे ही टोकरी के भीतर से बालक कृष्ण ने अपना नन्हा पैर नीचे लटकाया और यमुना के जल को छुआ, यमुना शांत हो गई और उसने वासुदेव को जाने के लिए मार्ग दे दिया। वासुदेव सुरक्षित गोकुल पहुँचे, जहाँ यशोदा के बगल में सो रही कन्या को लेकर वे वापस मथुरा आ गए। यह यात्रा दिखाती है कि जब ईश्वर आपके साथ हों, तो प्रकृति की सबसे विकट बाधाएँ भी आपका मार्ग नहीं रोक सकतीं।
हम जन्माष्टमी क्यों मनाते हैं, इसके पीछे गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक संदेश छिपे हैं:
- अंधकार पर प्रकाश की विजय: कृष्ण का जन्म भाद्रपद के 'कृष्ण पक्ष' (अंधेरी रात) में आधी रात को हुआ था। यह दर्शाता है कि जब अज्ञान, वासना और अहंकार का अंधकार मानव मन को घेर लेता है, तब कृष्ण रूपी ज्ञान का प्रकाश भीतर जन्म लेता है।
- बंधन से मुक्ति का पर्व: कारागार की जंजीरों का टूटना इस बात का प्रतीक है कि सांसारिक बंधनों और मोह-माया से मुक्ति केवल ईश्वर की शरणागति से ही संभव है।
- वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टिकोण: वर्षा ऋतु का यह समय नवजीवन का समय होता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय व्रत (उपवास) रखने से शरीर की जठराग्नि संतुलित होती है और वर्षा जनित बीमारियों से रक्षा होती है। अर्धरात्रि का शांत वातावरण ध्यान और आत्मचिंतन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
भगवान राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है क्योंकि उन्होंने मर्यादाओं के भीतर रहकर जीवन जिया। परंतु भगवान कृष्ण 'लीला पुरुषोत्तम' हैं। वे विष्णु के एकमात्र ऐसे अवतार हैं जिन्हें 'सोलह कला पूर्ण अवतार' माना गया है। कृष्ण का चरित्र अत्यंत व्यापक और विरोधाभासों से भरा है:
- वे जहाँ माखन चुराने वाले नटखट 'बालकृष्ण' हैं, वहीं पूतना और कालिया नाग का वध करने वाले महाबली भी हैं।
- वे गोपियों के साथ रास रचाने वाले 'राधाकृष्ण' हैं, तो रणभूमि में अस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा करने वाले 'योगेश्वर' भी हैं।
- वे सुदामा के फटे पैर धोने वाले 'दीनबंधु' हैं, तो जरासंध और शिशुपाल का न्याय करने वाले 'द्वारकाधीश' भी हैं।
कृष्ण जीवन के हर रंग को पूरी समग्रता से जीने का संदेश देते हैं। वे संन्यास की बात नहीं करते, वे संसार के भीतर रहकर अनासक्त भाव से कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देते हैं।
जन्माष्टमी मनाने का उद्देश्य तब तक पूरा नहीं होता जब तक हम कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को दिए गए श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान को न समझें। जब अर्जुन अपनों के मोह में फंसकर अस्त्र डालने लगा, तब कृष्ण ने उसे कायरता से जगाया।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"
कर्मयोग का सिद्धांत: कृष्ण का सबसे व्यावहारिक संदेश यही है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। परिणाम की चिंता में वर्तमान को नष्ट करना मूर्खता है। गीता का यह दर्शन आज के आधुनिक युग में तनाव (Stress), अवसाद (Depression) और असफलता के डर से जूझ रहे युवाओं के लिए सबसे बड़ी मानसिक औषधि है।
जन्माष्टमी पूरे भारत और विश्व भर में अलग-अलग सुंदर रूपों में मनाई जाती है:
- मथुरा और वृंदावन: यहाँ महीनों पहले से तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। 'छप्पन भोग' लगाए जाते हैं और मंदिरों को अभूतपूर्व रूप से सजाया जाता है।
- महाराष्ट्र की दही-हांडी: मुंबई और पुणे में गोविदाओं की टोलियाँ मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर बंधी दही-हांडी को तोड़ती हैं। इसका आध्यात्मिक मर्म यह है कि 'हांडी' हमारा अहंकार है और ईश्वर तक पहुँचने के लिए समाज के सभी वर्गों को मिलकर (एक-दूसरे का सहारा बनकर) ऊपर उठना पड़ता है।
- वैश्विक स्तर पर: इस्कॉन (ISKCON) के माध्यम से आज अमेरिका, लंदन, रूस और अफ्रीका तक में विदेशी नागरिक पीले वस्त्र धारण कर 'हरे कृष्णा हरे रामा' की धुन पर झूमते हैं, जो कृष्ण नाम की वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है।
आज के युग में माता-पिता बालकृष्ण के स्वरूप से 'बाल-मनोविज्ञान' (Child Psychology) सीख सकते हैं। कृष्ण का बचपन बंधनों में नहीं बीता; वे गाय चरवाते थे, माखन चुराते थे, प्रकृति के बीच रहते थे।
- सीख: यह दर्शन सिखाता है कि बच्चों के विकास के लिए उन्हें केवल किताबी कीड़ा न बनाकर प्रकृति, खेल और स्वतंत्रता के अवसर दिए जाने चाहिए।
- सच्ची मित्रता: सुदामा और कृष्ण की मित्रता ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाने का सबसे अनुपम उदाहरण है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल कैलेंडर की एक तारीख या उपवास रखकर रात को बारह बजे आरती गा लेने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जन्माष्टमी मनाने की वास्तविक सार्थकता तब है जब हम अपने भीतर छिपे 'कृष्णत्व' को जगाएं।
कृष्ण हमें सिखाते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों (उनका जन्म कारागार में हुआ, बचपन संकटों में बीता, युद्ध का सामना करना पड़ा), चेहरे पर हमेशा 'मंद मुस्कान' बनी रहनी चाहिए। जीवन को एक बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक 'उत्सव' (Celebration) की तरह जीना ही कृष्ण का वास्तविक दर्शन है।