Sunday, October 18, 2026

'India in Korea' पुस्तक JNU के मित्र अनिल चौधरी को भेंट

 'India in Korea' पुस्तक JNU के मित्र अनिल चौधरी को भेंट









बहुत दिनों से सोच रहा था कि अनिल चौधरी से मिलने जाना है। अस्वस्थ भी हो गया था वो। और 18 अक्टूबर 2026 को वो सुअवसर प्राप्त हुआ। मालूम हुआ कि वो घर पर है और मैं पहुंच गया उससे मिलने।


अनिल चौधरी मेरे साथ जेएनयू (JNU) में था। हम लोग JNU के School of Social Sciences के‌ Centre for the Study of Social Systems यानी Sociology के छात्र थे। हमलोग अस्सी के दशक में जेएनयू के छात्र थे। अनिल हमसे एक साल जूनियर था। और संयोग से हमलोग एक ही छात्रावास सतलज में थे। उसके साथ जो उस समय मित्रता हुई, घनिष्ठता हुई वो‌ आज भी यथावत है। वस्तुत: अनिल मेरे छोटे भाई की तरह है और हमारा संबंध लगता है जनम-जनम का है।

अनिल UPSC से चयनित Indian Trade Service का एक उच्च अधिकारी रहा है - सेवानिवृत्ति से पूर्व वो गुजरात का Development Commissioner रहा है यानी अगर केंद्र में होता तो Additional Secretary रैंक का अधिकारी। पर पूरी इमानदारी और निष्ठा से उसने देश की सेवा की - बड़े-बड़े राजनीतिक दबाव के बाद भी। और स्वभाव वही सहज, सरल निश्छल - अहंकार रहित।

चलते चलते मैंने उसको अपनी एक पुस्तक भी भेंट की -
India in Korea . बहुत प्रसन्न हुआ मेरी पुस्तक पाकर ।

Book : India in Korea
(Influence of Buddhism in Korea)
Author: Dr. Ajay Kumar Ojha
Publisher: Anuradha Prakashan, Delhi
Available on Amazon

संयोग से इस पुस्तक का पहला लोकार्पण SouthKorea में हुआ था - सौजन्य डॉ. अखिलेश अरूण। और संयोग से डाॅ अखिलेश अरूण भी JNU के छात्र रहे हैं।












सनातन धर्म में मां सिद्धिदात्री का प्रतीकात्मक महत्त्व

           सनातन धर्म में मां सिद्धिदात्री  का प्रतीकात्मक महत्त्व 




सनातन धर्म में मां सिद्धिदात्री नवदुर्गा का नौवां और अंतिम स्वरूप हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के अंतिम दिन (महानवमी) की जाती है। आध्यात्मिक, दार्शनिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से उनका स्वरूप पूर्णता, असीमित ज्ञान और सभी मानवीय व ब्रह्मांडीय क्षमताओं की प्राप्ति का परम प्रतीक है।
मां सिद्धिदात्री का प्रतीकात्मक महत्त्व निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
1. नाम का रहस्य: पूर्णता और सिद्धियों की प्रदाता
'सिद्धिदात्री' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— सिद्धि + दात्री।
  • सिद्धि (Perfection/Powers): 'सिद्धि' का अर्थ है पूर्णता, सफलता, अलौकिक शक्तियां और सर्वोच्च ज्ञान।
  • दात्री (Giver): 'दात्री' का अर्थ है देने वाली।
  • प्रतीक: मां सिद्धिदात्री ब्रह्मांड की सभी भौतिक और आध्यात्मिक सिद्धियों की अंतिम स्रोत हैं। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, वे आठ मुख्य सिद्धियों की स्वामिनी हैं: अणिमा (अत्यंत सूक्ष्म हो जाना), महिमा (विशाल हो जाना), गरिमा (अत्यंत भारी हो जाना), लघिमा (हल्का हो जाना), प्राप्ति (इच्छित वस्तु पाना), प्राकाम्य (इच्छाओं की पूर्ति), ईशित्व (ऐश्वर्य और प्रभुत्व), और वशित्व (सबको वश में करना)।
  • सीख: यह स्वरूप दर्शाता है कि जब कोई व्यक्ति जीवन में कड़ी मेहनत, तप और ईमानदारी के अंतिम पड़ाव पर पहुंचता है, तो उसे सफलता (सिद्धि) अवश्य मिलती है।
2. चार भुजाएं: ब्रह्मांडीय संतुलन और ऐश्वर्य
मां सिद्धिदात्री चतुर्भुज (चार हाथों वाली) हैं और उनके हाथों के प्रतीक मनुष्य के मानसिक और आध्यात्मिक ऐश्वर्य को दर्शाते हैं:
  • चक्र और गदा: ये ब्रह्मांड के न्याय, नियम, अनुशासन और सुरक्षा के प्रतीक हैं। यह साधक को बुराइयों से लड़ने की शक्ति प्रदान करते हैं।
  • शंख: शंख की ध्वनि ब्रह्मांडीय नाद और पवित्रता की प्रतीक है। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर कर मन में सकारात्मकता का संचार करती है।
  • कमल का फूल: यह कीचड़ में खिलकर भी अछूता रहने वाला पुष्प है, जो संसार की सभी सिद्धियों और सुखों को भोगते हुए भी अनासक्ति (Detachment) और पवित्रता बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
3. कमल के आसन पर वास: स्थिरता और ज्ञान
हालांकि मां सिद्धिदात्री का वाहन सिंह (शेर) है, लेकिन वे मुख्य रूप से कमल के पुष्प पर आसीन (पद्मासना) दिखाई देती हैं।
  • प्रतीक: कमल का आसन सर्वोच्च ज्ञान, शांति और मानसिक स्थिरता का प्रतीक है। सिंह शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है। माँ का इन दोनों से संबंध यह सिखाता है कि एक पूर्ण और सफल व्यक्ति के भीतर पराक्रम (साहस) और ज्ञान (शांति) दोनों का अद्भुत संतुलन होना चाहिए।
4. अर्धनारीश्वर रूप का आधार
पौराणिक इतिहास के अनुसार, भगवान शिव ने भी सभी प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए मां सिद्धिदात्री की ही कठोर तपस्या की थी। माँ की कृपा से ही शिव जी का आधा शरीर देवी का हुआ और वे संसार में 'अर्धनारीश्वर' कहलाए।
  • दार्शनिक महत्त्व: यह प्रतीक यह प्रतिपादित करता है कि संपूर्ण ब्रह्मांड शिव (पुरुषत्व/चेतना) और शक्ति (नारीत्व/ऊर्जा) के मिलन से ही पूर्ण होता है। पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।
5. केतु ग्रह से संबंध
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां सिद्धिदात्री केतु ग्रह को नियंत्रित करती हैं।
  • केतु को मोक्ष, वैराग्य, अध्यात्म और अंतर्ज्ञान (Intuition) का कारक माना जाता है। माँ की आराधना करने से केतु के नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं, मानसिक भ्रम मिटता है और व्यक्ति को मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है।
6. नवमी तिथि और साधना की पूर्णता

नवरात्रि के नौ दिनों की यात्रा मां शैलपुत्री (दृढ़ संकल्प) से शुरू होकर मां सिद्धिदात्री (पूर्णता) पर समाप्त होती है। यह मनुष्य के आत्मिक विकास की यात्रा है। जो साधक अपने भीतर की नौ शक्तियों को जाग्रत कर लेता है, वह अंततः जीवन के परम सत्य और परम आनंद को प्राप्त कर लेता है।

सनातन धर्म के पुराणों (विशेषकर देवी पुराण, शिव पुराण और मार्कंडेय पुराण) के अनुसार, मां सिद्धिदात्री का इतिहास सृष्टि के निर्माण, देवताओं की शक्तियों के उदय और स्वयं भगवान शिव की पूर्णता से जुड़ा हुआ है। नवदुर्गा की अंतिम और नौवीं शक्ति होने के नाते, इनका इतिहास ब्रह्मांड के शून्यता से पूर्णता की ओर आने का इतिहास है ।
पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, मां सिद्धिदात्री की उत्पत्ति और इतिहास की मुख्य कथाएँ इस प्रकार हैं:
1. सृष्टि का प्रारंभ और त्रिदेवों की उत्पत्ति
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के आरंभ से पहले जब इस ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं था, चारों ओर केवल घोर अंधकार और शून्यता थी। उस समय उस अंधकार को चीरते हुए एक दिव्य प्रकाश की किरण प्रकट हुई, जिसने धीरे-धीरे एक भव्य नारी का आकार ले लिया। वे साक्षात मां आदि-पराशक्ति (सर्वोच्च शक्ति) थीं ।
प्रकट होने के बाद, मां ने संसार के संचालन के लिए अपने ही अंश से तीन सर्वोच्च देवताओं—ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) को जन्म दिया। माँ ने तीनों देवताओं को उनके कर्त्तव्य सौंपे—ब्रह्मा जी को सृष्टि की रचना, विष्णु जी को पालन, और शिव जी को संहार का दायित्व दिया गया ।
2. भगवान शिव की घोर तपस्या और सिद्धियों की प्राप्ति
सृष्टि के निर्माण और उसके सुचारू संचालन के लिए दिव्य शक्तियों और योग्यताओं की आवश्यकता थी। इसके लिए भगवान शिव ने माता आदि-पराशक्ति की हज़ारों वर्षों तक अत्यंत कठिन और कठोर तपस्या की ।
शिव जी की अटूट साधना से प्रसन्न होकर, माता पराशक्ति ने अपने परम शांत, दिव्य और ऐश्वर्यमयी रूप में अवतार लिया, जिसे मां सिद्धिदात्री कहा गया। माँ ने अपनी कृपा से भगवान शिव को आठ मुख्य सिद्धियाँ (अष्ट-सिद्धि) और भगवान कृष्ण के अनुसार 10 अन्य गौण सिद्धियों सहित कुल 18 प्रकार की सिद्धियाँ और परिपूर्णताएँ वरदान में प्रदान कीं। इन्हीं सिद्धियों के बल पर भगवान शिव को ब्रह्मांड के सर्वोच्च और असीमित नियंत्रक की शक्तियां प्राप्त हुईं ।
3. अर्धनारीश्वर रूप का प्राकट्य
मां सिद्धिदात्री के इतिहास की सबसे अद्भुत घटना भगवान शिव के अर्धनारीश्वर (आधा पुरुष और आधा नारी) रूप से जुड़ी है ।
  • जब ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना कर रहे थे, तब उन्होंने पाया कि केवल पुरुषों की रचना से सृष्टि का चक्र आगे नहीं बढ़ पा रहा है (वंश वृद्धि नहीं हो पा रही थी)।
  • इस समस्या के समाधान के लिए जब भगवान शिव ने मां सिद्धिदात्री का ध्यान किया, तो माता सिद्धिदात्री भगवान शिव के दाएं भाग से अलग होकर उनके बाएं हिस्से में समाहित हो गईं ।
  • माँ की इस परम अनुकंपा से भगवान शिव का आधा शरीर साक्षात देवी का हो गया। इसी स्वरूप के कारण शिव जी को पूरे ब्रह्मांड में 'अर्धनारीश्वर' के नाम से पूजा गया, जो यह संदेश देता है कि सृष्टि की पूर्णता में पुरुष और प्रकृति (नारी) दोनों का समान अंश है ।
4. महिषासुर वध में देवताओं को तेज प्रदान करना
एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, जब क्रूर राक्षस महिषासुर ने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं को बंदी बना लिया, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश के क्रोध तथा सभी देवताओं की संयुक्त ऊर्जा (तेज) से एक दिव्य शक्ति पुंज का निर्माण हुआ। मां सिद्धिदात्री ने उस तेज को अपनी सर्वोच्च सिद्धियों और अस्त्र-शस्त्रों से पूर्ण किया। देवताओं, गंधर्वों और यक्षों द्वारा पूजित होकर माँ ने महिषासुर की दानवी सेना का समूल नाश किया और तीनों लोकों को उसके भय से मुक्ति दिलाई ।
नंदा पर्वत पर ऐतिहासिक तीर्थ
भौतिक और भौगोलिक इतिहास की दृष्टि से, उत्तराखंड के हिमालय क्षेत्र में स्थित नंदा पर्वत  को मां सिद्धिदात्री का प्रसिद्ध और अत्यंत पावन तीर्थ स्थल माना जाता है। मान्यता है कि माँ का मुख्य निवास यहीं है और आज भी कई सिद्ध पुरुष, योगी और साधक अदृश्य रूप से यहाँ माँ की आराधना करते हैं।











Saturday, October 17, 2026

कश्मीर पर प्रकाशित हमारी तीन पुस्तकें मूल कश्मीरी को भेंट

 कश्मीर पर प्रकाशित हमारी तीन पुस्तकें मूल कश्मीरी को भेंट






कश्मीर पर अब तक हमारी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।


1. Lalitaditya Muktapida the Great
(The Alexander of North India)
Author: Dr. Ajay Kumar Ojha
Publisher: Anuradha Prakashan, Delhi
Available on Amazon

2. Sikandar: The Idol Breaker
(The Annihilator of Hindu Kashmir)
Author: Dr. Ajay Kumar Ojha
Publisher: Anuradha Prakashan,Delhi
Available on Amazon

3. कश्यपमीर
(ऋषि कश्यप की धरती तो सदियों से सनातनी है)
लेखक: डाॅ. अजय कुमार ओझा
प्रकाशक: लोकमित्र, दिल्ली
अमेज़न पर उपलब्ध।

कश्मीर के मूल निवासी श्री गिरीश कौल को कश्मीर पर आधारित तीनों पुस्तकें भेंट करते हुए। साथ में भाभी जी भी हैं।























'कश्यपमीर' पुस्तक कश्मीर के गिरीश कौल को भेंट

 'कश्यपमीर' पुस्तक कश्मीर के गिरीश कौल  को भेंट 






कश्मीर पर सद्य प्रकाशित हमारी पुस्तक "कश्यपमीर" का प्राक्कथन मूल रूप से कश्मीर के अनंतनाग जिले के #वेरीनाग से विस्थापित दिल्ली में निवास करनेवाले श्री गिरीश कौल ने लिखा है।


पवित्र नदी वितास्ता का उद्गम स्थल वेरीनाग है। वितास्ता को झेलम नदी से जाना जाता है।

उनके आवास पर भाभी जी के साथ गिरीश कौल जी को 'कश्यपमीर' की एक प्रति भेंट करते हुए।

पुस्तक: कश्यपमीर (कॉफी टेबल बुक)
लेखक: डाॅ. अजय कुमार ओझा
प्रकाशक: लोकमित्र, दिल्ली

यह पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।















सनातन धर्म में मां महागौरी का प्रतीकात्मक महत्त्व

 सनातन धर्म में मां महागौरी का प्रतीकात्मक महत्त्व 








सनातन धर्म में मां महागौरी नवदुर्गा का आठवां स्वरूप हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के आठवें दिन (महाअष्टमी) की जाती है। आध्यात्मिक, मानसिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से उनका स्वरूप परम पवित्रता, शांति, करुणा और आंतरिक कायाकल्प (Transformation) का सबसे बड़ा प्रतीक है।

मां महागौरी का प्रतीकात्मक महत्त्व निम्नलिखित प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:

1. नाम का रहस्य: पूर्ण पवित्रता और उज्जवल चेतना

'महागौरी' शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है— महा + गौरी।
  • पूर्ण गौर वर्ण (श्वेत आभा): पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए माता पार्वती ने हज़ारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी, जिससे उनका शरीर धूल-मिट्टी और धूप के कारण पूरी तरह काला पड़ गया था। जब भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उनके शरीर पर गंगाजल डाला, तो वे बिजली की तरह अत्यंत गौरवर्ण (गोरी) और चमकीली हो गईं।
  • प्रतीक: मां का यह अत्यंत गोरा रूप (शंख, चमेली और चंद्रमा के समान श्वेत) मनुष्य की शुद्ध और उज्जवल चेतना (Pure Consciousness) का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि कठिन साधना, तप और आत्म-नियंत्रण के बाद आत्मा के सारे मैल (पाप, वासना, क्रोध) धुल जाते हैं और वह अपनी मूल पवित्र स्थिति को प्राप्त कर लेती है।

2. चार भुजाएं: अभय, कल्याण और सादगी का संतुलन

मां महागौरी अत्यंत शांत और करुणामयी मुद्रा में दिखाई देती हैं। उनकी चार भुजाएं जीवन में संतुलन और सुरक्षा का संदेश देती हैं:
  • दाहिनी ओर की ऊपर वाली भुजा: यह अभय मुद्रा में है, जो भक्तों को संसार के सभी भयों और अनिश्चितताओं से मुक्ति दिलाती है।
  • दाहिनी ओर की नीचे वाली भुजा: इसमें मां त्रिशूल धारण करती हैं। यह त्रिशूल केवल शत्रुओं के विनाश का नहीं, बल्कि मनुष्य के तीन कष्टों—दैहिक (शारीरिक), दैविक (प्राकृतिक आपदाएं), और भौतिक (मानसिक दुख)—के अंत का प्रतीक है।
  • बाईं ओर की ऊपर वाली भुजा: इसमें मां डमरू धारण करती हैं। डमरू का नाद ब्रह्मांड के निरंतर सृजन, संगीत और आनंद का प्रतीक है।
  • बाईं ओर की नीचे वाली भुजा: यह वरमुद्रा में है, जो भक्तों की सभी सात्विक इच्छाओं को पूरा करने और आशीर्वाद देने का प्रतीक है।

3. वृषभ (बैल) की सवारी: धर्म और स्थिरता

मां महागौरी वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं, जिसके कारण इन्हें 'वृषारूढ़ा' भी कहा जाता है।
  • प्रतीक: सनातन परंपरा में वृषभ को 'धर्म' का प्रतीक माना गया है। बैल अत्यधिक परिश्रमी, शांत और स्थिर स्वभाव का जीव है। मां का इस पर सवारी करना यह दर्शाता है कि जो व्यक्ति धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है और जिसमें मानसिक स्थिरता होती है, मां सदैव उसके जीवन को संचालित और सुरक्षित करती हैं।

4. श्वेत वस्त्र और आभूषण: सात्विकता और वैराग्य

महागौरी के वस्त्र और आभूषण पूरी तरह से श्वेत (सफेद) रंग के हैं।
  • प्रतीक: सफेद रंग सात्विकता, शांति, सत्य और निश्छल प्रेम का प्रतीक है। मां का यह रूप सिखाता है कि बाहरी तामझाम और आडंबरों के बिना भी जीवन में परम गरिमा और सुंदरता हासिल की जा सकती है। यह मन को शांत रखने और नकारात्मक विचारों से दूर रहने की प्रेरणा देता है।

5. महागौरी और राहु ग्रह का संबंध

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मां महागौरी राहु ग्रह को नियंत्रित करती हैं।
  • राहु को भ्रम, मानसिक अशांति, अचानक आने वाली बाधाओं और भ्रमित बुद्धि का कारक माना जाता है। मां महागौरी की उपासना करने से राहु के सभी बुरे प्रभाव समाप्त हो जाते हैं, व्यक्ति को मानसिक स्पष्टता मिलती है और उसका भ्रम दूर होता है।

6. सामाजिक एवं व्यावहारिक संदेश: क्षमा और करुणा

मां महागौरी का रूप हमें क्षमा (Forgiveness) और करुणा की शक्ति सिखाता है। वे बहुत जल्दी प्रसन्न होने वाली देवी हैं। यह स्वरूप संदेश देता है कि चाहे किसी व्यक्ति से अतीत में कितनी भी गलतियाँ या पाप क्यों न हुए हों, यदि वह सच्चे मन से प्रायश्चित करे और खुद को सुधारने का संकल्प ले, तो उसका आंतरिक कायाकल्प (Transformation) निश्चित है।

सनातन धर्म के पुराणों (विशेषकर शिव पुराण और देवी भागवत पुराण) के अनुसार, मां महागौरी  का इतिहास और उनकी उत्पत्ति की कथा कठिन साधना, परम भक्ति, दैवीय शुद्धिकरण और संसार से राक्षसों के अंत से जुड़ी हुई है।  धार्मिक इतिहास में इनसे जुड़ी दो मुख्य कथाएँ सबसे अधिक प्रचलित हैं :

1. भगवान शिव को पति रूप में पाने की कठोर तपस्या

पौराणिक इतिहास के अनुसार, माता पार्वती (जो पूर्व जन्म में सती थीं) ने भगवान शिव को पुनः पति के रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन और घोर तपस्या करने का संकल्प लिया। 

काया का क्षीण और शाम होना: हज़ारों वर्षों तक चली इस कठोर साधना के दौरान माता ने अन्न-जल का पूरी तरह परित्याग कर दिया था।  वे कड़कती ठंड, भीषण गर्मी और मूसलाधार बारिश को सहते हुए एक ही स्थान पर अडिग बैठी रहीं।  इस कारण उनका शरीर बहुत कमजोर (जीर्ण) हो गया और धूप, धूल तथा मिट्टी की परतों के जम जाने के कारण उनकी काया पूरी तरह काली (श्याम वर्ण) पड़ गई। 

शिव जी का गंगाजल से स्नान कराना: माता की अटूट भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान शिव प्रकट हुए, तो उन्होंने माता की इस जर्जर स्थिति को देखा।  भोलेनाथ ने उनके प्रेम को स्वीकार किया और आदरपूर्वक अपनी जटाओं से बहने वाली पावन गंगा के पवित्र जल से माता पार्वती के पूरे शरीर को नहलाया। 

'महागौरी' नामकरण: जैसे ही गंगाजल ने माता के शरीर का स्पर्श किया, उनके शरीर की सारी धूल-मिट्टी धुल गई और उनका रंग बिजली के समान चमकता हुआ, अत्यंत कांतिमान और दूध जैसा श्वेत (गोरा) हो गया।  उनकी आभा शंख और चंद्रमा की तरह उज्जवल हो उठी।  माता के इसी परम दिव्य और गौर वर्ण वाले रूप के कारण भगवान शिव और देवताओं ने उनका नाम 'महागौरी' रखा। 

2 . देवासुर संग्राम और देवी कौशिकी का प्राकट्य (दुर्गा सप्तशती के अनुसार)

दुर्गा सप्तशती के इतिहास के अनुसार, एक अन्य कथा भी मां महागौरी के रंग और उनके पराक्रम को दर्शाती है।
  • जब शुंभ-निशुंभ नाम के राक्षसों ने तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था, तब देवताओं की प्रार्थना पर माता पार्वती ने अपने शरीर से एक परम शक्तिशाली रूप को प्रकट किया। 
  • जैसे ही माता के भीतर से काली त्वचा (तामसिक अंश) बाहर निकली, वह देवी कौशिकी कहलाईं, जिन्होंने आगे चलकर शुंभ-निशुंभ का वध किया। 
  • अपने भीतर से उस श्याम वर्ण के अलग होने के बाद, माता पार्वती का मूल स्वरूप एक बार फिर चंद्रमा की भांति पूरी तरह से उज्जवल, श्वेत और दिव्य हो गया।  इस वजह से भी उन्हें सृष्टि में 'महागौरी' के नाम से पूजा गया। 

3 . भूखे सिंह की ऐतिहासिक कथा

मां महागौरी के इतिहास के साथ एक बेहद करुणामयी कथा भी जुड़ी हुई है।  माना जाता है कि जब माता पार्वती हिमालय पर तपस्या में लीन थीं, तब एक सिंह (शेर) बहुत दिनों से भूखा होने के कारण भोजन की तलाश में वहां पहुंचा। 

माता को देखकर वह उन पर झपटने ही वाला था कि अचानक वह वहीं रुक गया। माँ की तपस्या का ऐसा प्रभाव था कि वह भूखा सिंह भी शांत होकर वहीं चुपचाप बैठ गया और माता की तपस्या पूरी होने का इंतजार करने लगा। 

जब भगवान शिव ने प्रकट होकर माता को गौरवर्ण प्रदान किया, तब माँ पार्वती ने देखा कि यह सिंह भी उनके साथ वर्षों तक भूखा-प्यासा रहकर तपस्या का साक्षी बना रहा है। माँ ने उसे अपनी तपस्या के फल का भागीदार बनाया और उसे सदैव के लिए अपने साथ (सवारी के रूप में) स्वीकार कर लिया।  इसी कारण कई चित्रों में मां महागौरी सिंह पर भी विराजमान दिखाई देती हैं। 

सनातन धर्म में महाष्टमी  और महानवमी के दिन किए जाने वाले कन्या पूजन (कंजक पूजन) का विशेष महत्त्व है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, छोटी कन्याओं को साक्षात मां दुर्गा का स्वरूप माना जाता है। इस पावन परंपरा की शुरुआत और इसके धार्मिक महत्त्व से जुड़ी दो प्राचीन पौराणिक कथाएँ सबसे प्रमुख हैं :

कथा  1 : मां दुर्गा के अनन्य भक्त पंडित श्रीधर और माता वैष्णो देवी की कथा

यह कन्या पूजन से जुड़ी सबसे लोकप्रिय और प्राचीन कथा मानी जाती है, जिसका संबंध साक्षात माता वैष्णो देवी और कटरा के पंडित श्रीधर से है। 

श्रीधर की निर्धनता और भक्ति: बहुत समय पहले जम्मू के कटरा के पास हंसाली गांव में पंडित श्रीधर नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। वे बहुत ही निर्धन थे और उनकी कोई संतान नहीं थी, लेकिन वे मां दुर्गा के परम भक्त थे और नियमित रूप से कन्याओं का पूजन करते थे। 

रहस्यमयी कन्या का आगमन: एक बार नवरात्रि के दौरान, उनके घर एक छोटी और अत्यंत सुंदर दिव्य कन्या आई। उस कन्या ने श्रीधर से कहा कि वह अगले दिन उनके नाम पर पूरे गांव के लिए एक विशाल भंडारे (महाभोज) का आयोजन करें। श्रीधर अचंभित थे क्योंकि उनके पास स्वयं खाने के लिए अनाज नहीं था, लेकिन कन्या के अलौकिक प्रभाव में आकर उन्होंने पूरे गांव और साधु-संतों को आमंत्रण दे दिया। 

चमत्कारी भंडारा: अगले दिन जब पूरा गांव, ऋषि-मुनि और भैरवनाथ पंडित श्रीधर की कुटिया पर पहुंचे, तो वह छोटी सी कुटिया चमत्कारी रूप से एक विशाल महल जैसी बन गई। उस कन्या ने एक दिव्य बर्तन से सभी को उनकी पसंद का स्वादिष्ट भोजन परोसना शुरू किया, जो कभी खत्म ही नहीं हो रहा था। 

मां दुर्गा का वरदान: जब भैरवनाथ ने उस कन्या की शक्ति को परखना चाहा और उन पर झपटने की कोशिश की, तो वह कन्या त्रिकूट पर्वत की ओर अंतर्ध्यान हो गई (जो बाद में माता वैष्णो देवी कहलाईं)। जाने से पहले मां दुर्गा ने बाल कन्या के रूप में श्रीधर को दर्शन दिए और कहा— "श्रीधर, तुमने निश्छल मन से मेरा आदेश पूरा किया। संसार में कन्या पूजन ही मेरी सबसे श्रेष्ठ पूजा है। जो भक्त कन्याओं को तृप्त करेगा, उसके घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं होगी।" मां ने उन्हें संतान प्राप्ति का वरदान भी दिया और उसी दिन से पूरे भारत में नवरात्रि में विशेष रूप से कन्या पूजन की यह अटूट परंपरा शुरू हो गई। 

कथा  2 : इंद्रदेव और भगवान ब्रह्मा की पौराणिक कथा

यह कथा ब्रह्मांडीय स्तर पर कन्या पूजन के महत्त्व को स्थापित करती है, जिसका उल्लेख प्राचीन पुराणों में मिलता है :

  • देवताओं का संकट: एक बार देवासुर संग्राम के दौरान राक्षसों के अत्याचार बहुत बढ़ गए और इंद्रदेव समेत सभी देवताओं की शक्तियां क्षीण होने लगीं। मां आदिशक्ति को प्रसन्न करने का कोई उपाय न पाकर इंद्रदेव व्याकुल होकर सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे।
  • ब्रह्मा जी का उपदेश: इंद्रदेव की व्यथा सुनकर ब्रह्मा जी ने उन्हें समझाया कि यदि वे साक्षात महाशक्ति की कृपा बहुत शीघ्र पाना चाहते हैं, तो उसका सबसे सरल और अचूक मार्ग 'कन्या पूजन' है। ब्रह्मा जी ने कहा कि 2  से 10  वर्ष तक की आयु की कुमारिकाएं (कन्याएं) साक्षात नवदुर्गा के नौ रूपों की जीवंत प्रतीक हैं।
  • माँ का वरदान: ब्रह्मा जी के निर्देशानुसार, इंद्रदेव ने पृथ्वी पर आकर पूर्ण विधि-विधान से नवरात्रि के अंत में पवित्र कुवांरी कन्याओं के पैर धोए, उन्हें तिलक लगाया और हलवा-पूरी का भोग लगाकर उनका आशीर्वाद लिया। इंद्र के इस सत्कार और आदर से मां दुर्गा अत्यंत प्रसन्न हुईं और उन्होंने देवताओं को अजेय होने का वरदान दिया, जिससे उन्होंने राक्षसों पर विजय प्राप्त की। 
कन्या पूजन के व्यावहारिक और आध्यात्मिक नियम (आयु के अनुसार प्रतीक)

शास्त्रों में कन्याओं की आयु के अनुसार उनके दिव्य रूपों का वर्गीकरण किया गया है, जिन्हें पूजने से अलग-अलग फल मिलते हैं :

  1. 2  वर्ष की कन्या (कुमारी): इसकी पूजा से दुख और दरिद्रता का नाश होता है।
  2. 3  वर्ष की कन्या (त्रिमूर्ति): इसकी पूजा से घर में धन-धान्य और सुख-समृद्धि आती है।
  3. 4  वर्ष की कन्या (कल्याणी): इसकी पूजा से जीवन में सुख और विद्या की प्राप्ति होती है।
  4. 5  वर्ष की कन्या (रोहिणी): इसके पूजन से रोगी को आरोग्यता मिलती है।
  5. 6  वर्ष की कन्या (कालिका): यह विद्या, विजय और राजयोग प्रदान करती है।
  6. 7  वर्ष की कन्या (चंडिका): ऐश्वर्य और धन की प्राप्ति के लिए इनका पूजन होता है।
  7. 8  वर्ष की कन्या (शांभवी): वाद-विवाद और दुखों पर विजय दिलाती है।
  8. 9  वर्ष की कन्या (दुर्गा): शत्रुओं का नाश और कठिन कार्य सिद्ध करती है।
  9. 10  वर्ष की कन्या (सुभद्रा):मोक्ष और सभी मनोरथों को पूर्ण करती है।

नोट: कन्या पूजन के साथ एक छोटे बालक को भी 'बटुक भैरव' या 'लांगुरा' के रूप में बिठाने का नियम है, क्योंकि भैरव के बिना मां दुर्गा की पूजा अधूरी मानी जाती है।