Tuesday, August 4, 2026

'अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच' की ऑनलाइन मासिक अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी (क्रम संख्या 13)





 'अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच' के द्वितीय सत्र की ऑनलाइन मासिक अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी (क्रम संख्या 13) मंगलवार दिनांक 4 अगस्त 2026 को संध्या 7 बजे से गूगल मीट द्वारा संचालित हुई। 🙏




✍️ कार्यक्रम अध्यक्ष - डॉ अनु मेहता - प्राचार्य, वरिष्ठ साहित्यकार, प्रेरक वक्ता (आनंद, गुजरात)


✍️ मुख्य अतिथि - डॉ श्वेता - वरिष्ठ कवयित्री एवं सम्पादक (बाँका, बिहार)


✍️ विशिष्ट अतिथि -  डॉ ऋतु ननंन पांडे - विश्वविख्यात हिन्दी सेवी एवं साहित्यकार (नीदरलैंड)


✍️ स्वागत वक्तव्य - डॉ सुशीला ओझा (संरक्षिका)

✍️ संचालिका - श्रीमती प्रणति ठाकुर (महामंत्री)

✍️ सरस्वती वंदना - श्रीमती नीलम मिश्रा

✍️ धन्यवाद ज्ञापन - श्रीमती शुभ्रा मिश्रा (महासचिव)


✍️ रचनात्मक सहभागिता :-

   1. सुरेन्द्र सिंह - वरिष्ठ शिक्षक, कवि एवं लेखक (बक्सर, बिहार)

2. हरेन्द्र सिन्हा - वरिष्ठ कवि एवं सम्पादक (भोजपुर, बिहार)

3. नीलम मिश्रा - बहुभाषी कवयित्री एवं नृत्यांगना (हावड़ा, प० बंगाल)

   4. भारती रंजन कुमारी - शिक्षिका एवं कवयित्री (दरभंगा, बिहार) 

5. अर्पणा वर्मा - शिक्षिका एवं नवोदित कवयित्री (चम्पारण, बिहार)

   6. सौमी मजूमदार - शिक्षिका एवं नवोदित रचनाकार (झाड़ग्राम, प० बंगाल)

7 . डॉ. अजय कुमार ओझा 

8 . प्रणति ठाकुर 

9 . विनय जयसवाल 

10. सुमन झा 

  


'अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच'

संरक्षिका - डॉ सुशीला ओझा 

संस्थापिका एवं संयोजक - डॉ शिप्रा मिश्रा 

महासचिव - श्रीमती शुभ्रा मिश्रा 

अध्यक्ष - श्रीमती सुमन झा 

सभापति एवं मीडिया प्रभारी - डॉ अजय कुमार ओझा

महामंत्री एवं संचालक - श्रीमती प्रणति ठाकुर 

मुख्य सलाहकार - श्री कमल पुरोहित 'अपरिचित'


इस मासिक अंतरराष्ट्रीय  काव्य गोष्ठी में देश-विदेश से भी कई साहित्य प्रेमी जुड़े रहे जिनमें प्रमुख हैं :

श्री नन्द कुमार मिश्र 

सोनू  कुमार पत्रकार 

पुनीता शुक्ला 

चन्दन कुमार झा 

















Wildlife Protection : With Special Reference to Black Buck Poaching Case

                                   

पर्यावरण एवं वन्य जीव संरक्षण 

(Environment & Wildlife Protection)

(पर्यावरण और वन्य जीव संरक्षक श्री ललित कुमार बोरा से गहन साक्षात्कार)


(An Exclusive & Intensive Interview with Environment & Wildlife Conservationist Shri Lalit Bora by Dr. Ajay Kumar Ojha )



7 दिसंबर 2025 

जयपुर,राजस्थान 






डॉ. अजय कुमार ओझा : मुझे कहने में बहुत ख़ुशी हो रही है कि मैं जिस व्यक्ति के साथ आज बैठा  हूँ, बातचीत कर रहा हूँ उनका नाम है श्री ललित कुमार बोरा।  श्री ललित बोरा जी ने Wildlife Conservation के लिए काफी काम किया है और आज भी कर रहे हैं।  पर्यावरण संरक्षण के लिए काफी काम किया है और आज भी कर रहे हैं।  और सबसे बड़ी बात कि अब Wind Energy और Solar Energy पर भी काम कर रहे हैं।  तो कुल मिलाकर ये कहना चाहिए कि ये एक अनुपम व्यक्तित्व हैं जो पर्यावरण संरक्षण के लिए पूरी तरह से समर्पित हैं। 


तो पहले मैं  ललित बोरा जी आपसे जानना चाहूंगा कि ‘पर्यावरण’ को आम बोलचाल की भाषा में कैसे परिभाषित किया जा सकता है ? 


ललित कुमार बोरा : नमस्कार डॉक्टर अजय जी।  ये आपने बहुत ही बड़े शब्दों में मेरा परिचय दे दिया है।  मैं इस लायक तो नहीं हूँ लेकिन फिर भी ये जरूर है  कि मेरा Interest रहा है इसमें और मेरा Job  भी इसी में था  और मन में था ही,  इसलिए पर्यावरण के प्रति झुकाव हो गया। पर्यावरण यानी  परि  आवरण -  जो हमारे चारो तरफ का आवरण है जिसमें पेड़-पौधे भी आएंगे।  वायु भी आएगी।  जल भी आएगा।  मिट्टी-पत्थर ये सभी आएंगे।  क्योंकि पृथ्वी की जब उत्पत्ति हुई तो उसमें ये सारी  चीजें सम्मिलित थीं जिसको हम पंच तत्व बोलते हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, गगन, वायु  - ये सारा मिला के पर्यावरण में आता है - क्षिति (पृथ्वी), जल पावक गगन समीरा। हाँ तो वो जो पाँचों तत्व जो इसमें आ रहे हैं उसके हिसाब से देखते हुए पर्यावरण हुआ और मुख्य रूप से इसमें जो रोल था - जिस तरह से बताते हैं कि इन सबका एनिमल्स (Animals) आदि का Evolution  हुआ तो उसमें पर्यावरण का बड़ा ही महत्वपूर्ण रोल (Role) यानी भूमिका रही। पृथ्वी ठंडी हुई और इसके बाद धीरे-धीरे अमीबा से डेवेलप (Develop) होते होते आदमी या मनुष्य के विकास की तरफ आए।

  

तो मेरा इंटरेस्ट (Interest) इसमें जगा कि पर्यावरण को संरक्षित करना आज हमारी जिम्मेवारी है और यह एक इस तरह की चीज है कि यही हमारे भविष्य को निर्धारित करता है।  तो मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि पर्यावरण यानी हमारे चारो तरफ की चीज चाहे आप वो मिट्टी देखो, पत्थर देखो, पानी देखो वो जो भी चीजें उसके अंदर जो भी उससे सम्बंधित - जैसे मनुष्य है, जानवर है, पेड़-पौधे हैं, जल है, जल के जीव हैं वो सारे उसमे आते हैं। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : जब आप जीव की बात कर रहे हैं तो मेरे मन में ये खयाल आता है कि वन और वन्य जीव या प्राणी के संरक्षण के लिए भी आपने काफी काम किया है।  इसके बारे में कुछ बताना चाहेंगे आप ?


ललित कुमार बोरा: मैं यह बताना चाहूंगा कि  मैंने जब सरकारी सेवा RFS ( Rajasthan Forest Service)  ज्वाइन किया।  मेरे दिमाग में शुरू से ही था।  ये जो पृथ्वी, वातावरण, पर्यावरण वगैरह जो भी है - उससे मिला-जुला, उससे मिलता-जुलता ही कुछ काम किया जाएगा। हालांकि मैंने अभियांत्रिकी में किया है मास्टर ऑफ इंजीनियरिंग।  


अच्छा हाँ।  लेकिन उसमें क्या है कि एक सीमित दायरा रहता है।  आपको सिर्फ ऐसी चीज करनी है जैसे कोई कंस्ट्रक्शन कर दिया, डिस्ट्रक्शन कर दिया।  है कुछ नहीं।  मतलब आपको बनाना तोड़ना है।  इसके अलावा मेरी राय नहीं है।  कई लोगों की अलग राय हो सकती है क्योंकि अभियांत्रिकी के बिना भी विकास संभव नहीं है।  


उस समय के उम्र के हिसाब से मेरे दिमाग में यही चल रहा था।  यही लग रहा था कि मेरे लिए ये ज्यादा ठीक है।  मेरा मन भी संतुष्ट रहेगा।  इससे मन में संतुष्टि रहेगी तो मैंने इसको अपने करियर का पॉइंट चुना और मेरा RFS में चयन हुआ और मेरा पद-स्थापन फॉरेस्ट डिपार्टमेंट में हुआ।  सबसे पहले ही मुझे क्या हुआ कि मेरी पोस्टिंग एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट में कर दिया गया।  ट्रेनिंग पूरा करके जब आया तो मुझे कृषि विभाग में पोस्ट कर दिया  गया जिससे मेरा कोई नाता ही नहीं था। 


पद-स्थापन, पोस्टिंग और प्रमोशन वगैरह ये सारे  सरकारी सिस्टम के पार्ट हैं।  कोई उसमें कुछ कह नहीं सकता कि भाई मुझे कहाँ लगा रहे हो, क्यों लगा रहे हो ? तो स्वतः ही एक अधिकारी थे उन्होंने मुझसे कहा भाई यहाँ तुमको एक डेढ़ साल हो गया है।  यहाँ  तुम बोर नहीं हो रहे हो क्या ? तो मैंने कहा सर बोर होने की क्या बात है ? मैं निकलूंगा कैसे पर्यावरण के काम करने  के लिए ? तब उन्होंने कहा कि हम आपको बुला  लेते हैं।  उन्होंने हमें बूंदी में पोस्टिंग दिलवा दी।  बूंदी जिला है राजस्थान का।


वहां पर जाते ही मैंने Actually देखा कि पर्यावरण होता क्या है ? जंगल के अंदर कल कल करते  बहते हुए  झरने जैसे नाले और ऊँचे ऊँचे पेड़, आम के पेड़ - जैसे अभी भी मुझे एक नाम याद है बूंदी जिले में ‘आमारोह’  मतलब  आम की रोह जैसी जगह, तरह तरह के जीवों को अपनी आँखों से देखकर रोमांचित हो उठा  और सोचने लगा कि अब तो इनको रखना ही है कुछ भी कर लें लेकिन अब क्योंकि विभाग में रहना है तो सुरक्षा भी करना है, संरक्षण भी करना है, ऑफिस का कार्य भी करना है और प्रशासनिक कार्य भी करना है - तो कहने का मतलब है कि  मिला जुला कर  आपके पास जो भी समय है ये सारी चीजें करनी हैं। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : एक प्रश्न मेरे दिमाग में आ रहा है कि जो वन्य जीव संरक्षण है उसका पर्यावरण संरक्षण में क्या महत्व है - कैसे जुड़ा हुआ है ये ?


ललित कुमार बोरा: जैसा कि  मैंने आपको पहले बताया था कि यह सब इसके पार्ट हैं क्योंकि जैसे हम देखते हैं कि ट्रॉफिक लेवल जिसको एनर्जी लेवल बोलते हैं - इसमें सबसे नीचे आती है घास या पेड़-पौधे।  उसको खाकर जिन्दा रहनेवाले आते हैं शाकाहारी।  शाकाहारी वालों को खा के आते हैं मांसाहारी।  तो जिस जंगल में मांसाहारी मिलता है जिसको कि Top Carnivore  कहा जाता है या वो जो पिरामिड बनता है - एक्चुअली इसको हम साइंस में  ही समझें कि  एक पिरामिड है - ऊपर जो है इंचार्ज  लायन या टाइगर होता है उसके नीचे आपको मिलेंगे जो मिडिल लेवल पर लेपर्ड हो गया।  भेड़िया हो गया।  उसके नीचे जो ग्रास ईटर्स जो हैं जैसे हिरण हो गया, खरगोश हो गया और उसके नीचे आता है घास।  अगर नीचे वाली चीज नहीं बचेगी तो ऊपर वाली चीज भी नहीं बच पाएगी।  ये सर्वविदित है।  पिरामिड उल्टा नहीं रह सकता - वह स्थिर हो ही नहीं पाएगा। 


तो पृथ्वी पर भी हम चाहें कि स्थायित्व रहे, संतुलन बना रहे, पर्यावरण का संतुलन बना रहे तो ट्रॉफिक लेवल या एनर्जी लेवल को पूर्ण रूप से संतुलित रहना चाहिए। जब नीचे ही पर्याप्त या पूरा नहीं रहेगा तो कैसा होगा ? पर्यावरण की जब बात हुई तो मैंने बेस यानी आधार से शुरू किया।  जब बेस को बचाएंगे तो आप अपने आप ऊपर के लेवल को भी सुरक्षित रख सकते हैं, संरक्षित रख सकते हैं. अगर बेस ही नहीं रहेगा, आधार ही नहीं रहेगा तो आप क्या कर पाएंगे ? किसी जंगल को पूरा काट दिया तो अब वहां कब तक जंगल आएगा ? और जंगल नहीं रहेगा तो वन्य जीव भी कहाँ जाएंगे ? क्योंकि उनको वो लेवल मिलेगा नहीं - ट्रॉफिक लेवल। 


तो इसका जो मैं संबंध बताना चाह  रहा था वह  यही बताना चाह रहा था कि वन्य जीवों का संबंध पर्यावरण से है क्योंकि ये सारी वनस्पतियां, आस पास के नदी-नाले जहाँ से ये लोग पानी पीते हैं और कई जानवर तो ऐसे होते हैं जो बिल खोद के उसमें रहते हैं तो इसका मतलब आप खुद समझ रहे हैं - मुझे लग रहा है कि आप अति उत्साहित हैं इसके लिए और आपका खुद का, मुझे लग रहा है ऐसा कि आप इसमें बहुत ज्यादा रुचि लेते हैं और मैं बड़ा ही सौभाग्यशाली हूँ कि किसी ने इस तरह से मुझसे पूछा - बाकी  आज की तारीख  में सब ऊपर ही ऊपर पूछ के चले जाते हैं।  इतने उत्साह से, इतनी गंभीरता से - जो पर्यावरण को इतना महत्व देता हो, उस पर जानकारी लेता हो - लोगों को बताने के लिए - ऐसा बहुत कम होता है। मुझे बहुत खुशी है कि आपने इस समस्या की गंभीरता को पहचाना। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : मेरे मस्तिष्क में एक और प्रश्न आ रहा है।  राजस्थान में काले हिरण या कृष्ण मृग या ब्लैक बक की बहुत चर्चा हो रही है - कुछ विशेष कारणों से जिससे आप अवगत हैं। काला हिरण एक रेयर वन्य जीव है - लुप्तप्राय संकटग्रस्त प्राणी।  तो वन्य जीव संरक्षण से संबंधित क्या अधिनियम है और काले हिरण के संरक्षण के लिए क्या कुछ किया जा रहा है ?


ललित कुमार बोरा: 




भारतीय वन अधिनियम 1927 जो है उसमें Specifically दे रखा है कि वनों की कटाई नहीं करना, खदान नहीं खोदना, वनों से चीजें नहीं उठाना। पर अब  वन्य जीव के लिए एक पूरा सेपरेट एक्ट बना के दे दिया गया है।  इसमें वन्य जीवों को बचाना है।  वन्य जीव बचेंगे तो हमारा अस्तित्व भी रहेगा, उसमें संभावना रहेगी कि आगे इवोल्यूशन हमारा हो सके।  तो ये पूरा एक्ट  भारत सरकार ने पारित किया था 1972 में।  इसके अंतर्गत काला हिरण या ब्लैक बक एक अनुसूचित जानवर है जिसको पूर्ण रूप से सुरक्षा प्रदान की गई है इसके शिकार करने में अगर कोई लिप्त पाया जाता है या प्रूफ होता है तो उसको सात  वर्ष तक की सजा का प्रावधान है और यही एक ऐसी चीज है जिसमें मिनिमम सजा का भी प्रावधान है।  मिनिमम सजा का प्रावधान होने से उसको जमानत भी नहीं मिलती जब तक कि ऑन द  कोंटरेरी (On the contrary)  साबित नहीं हो।  तो उसको सजा होने के बाद, और अपराधी का दोष सिद्ध होने के बाद उसको मिनिमम एक साल जेल में रहना ही पड़ता है।  वो छूट नहीं सकता।  तो इसके लिए विशेष रूप से एक अलग से ही एक्ट बन गया है - वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (यह कानून जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों की सुरक्षा, उनके आवासों के प्रबंधन तथा उनके अवैध शिकार और व्यापार को रोकने के लिए बनाया गया है )। 


तो मेरे कहने का मतलब ब्लैक बक जैसे मामलों में चर्चित कौन सी चीज रहती है जो फेमस हो अन्यथा कोई चर्चा नहीं होती।  ये भी दुर्भाग्य है कि लोग हिरण और काले हिरण में भी फर्क नहीं कर पाते। लोगों के लिए राजस्थान में काले हिरण के शिकार वाली घटना से ज्यादा उस व्यक्ति की चर्चा है जो एक्टर है, उसके लिए लोग पागल हैं। एक जानवर के लिए लोगों में कोई संवेदना नहीं रहती। लोग चिड़िया घर जाएंगे तो जानवरों पर पत्थर मारेंगे।  


डॉ. अजय कुमार ओझा : अच्छा ये बताइए एक ऐसा समाज है जो ब्लैक बक या काले हिरण को अपने बच्चे की तरह देखता है, अपने बच्चे की तरह उसका पालन-पोषण करता है।  इस समाज की महिलाएं अपने बच्चे की तरह दूध पिलाती है।  इतना संवेदनशील और घनिष्ठ संबंध है इस समाज और काले हिरण में।  तो वो कौन सा समाज है और उस समाज का इस काले हिरण से इतना गहरा रिश्ता क्यों है ?


ललित कुमार बोरा : ये चीज इसलिए है कि बिश्नोई  समाज है।  बिश्नोई समाज इसके प्रति इतना समर्पित है, उसके संरक्षण के प्रति।  इसमें शायद आपको भी मालूम होगा क्योंकि आपको भी पूरी तरह से जानकारी है इसकी - बीस और नोई वाला जो है - 20 और 9 । बिश्नोई समाज के 29 नियमों में से एक ये भी है कि आपको पर्यावरण और वन्य जीवों की सुरक्षा करनी है।  जहाँ पर ये लोग रहते हैं उसको ‘ढाणी’ बोलते हैं। (बिश्नोई समाज के निवास स्थान या बस्तियों को विशेषतौर पर ढाणी कहा जाता है जहाँ वे अपने खेतों और प्रकृति के पास निवास करते हैं।) अपने चारो तरफ ये जानवरों को इतनी सुरक्षा प्रदान करते हैं कि इनके यहाँ ब्लैक बक, चिंकारा बेखौफ निर्भय  घूमते रहते हैं।  उनका बिश्नोई समाज के साथ एक बोंडिंग जिसे आप बोल रहे हैं ना भावनात्मक जुड़ाव हो जाता है।  मतलब उनको ये लगता नहीं कि मेरा बच्चा है या चिंकारा का बच्चा है या ब्लैक बक यानी काले हिरण का बच्चा है।  तो वो इनके पास ऐसा घूमता है बचपन से ही कि उनको ऐसा लगता है जैसे मैं अपने घर पर ही हूँ।  बिश्नोई लोगों के जब बच्चे बड़े होते हैं तो उनको भी लगता है कि  कितना अच्छा है कि  ये जानवर हमारे साथ रहते हैं। तो बचपन से ही उनका ये प्रयास हो जाता है जब वो बड़े होते हैं तो अपने पुरखो की इस प्रथा को आगे बढ़ाते चले जाते हैं। 


कई  सालों पहले से ये प्रथा चली आ रही है बिश्नोई समाज में - वन सुरक्षा की, वन्य जीवों के संरक्षण की। अठारहवीं  शताब्दी में चूना और कोयला बनाने के लिए राजा ने पेड़ों को काटने के लिए आदेश दिया था जिसका अमृता देवी बिश्नोई ने विरोध किया था।  खेजड़ी के पेड़ों की  रक्षा के लिए अपने गाँव की अन्य महिलाओं के साथ पेड़ों से चिपक गईं थीं। भारत का यह पहला पर्यावरण विद्रोह था, जिसमें 363 लोगों ने वृक्षों को बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया, जिससे चिपको जैसे भविष्य के संरक्षण प्रयासों को प्रेरणा मिली । तो इस तरह से  राजस्थान के बिश्नोई समुदाय ने सबसे पहले दर्ज पर्यावरण आंदोलनों में से एक की शुरुआत की। 


वास्तव में इस चिपको आंदोलन की कभी चर्चा ही नहीं की गई  क्योंकि ऐसे गाँव में ढाणी में उस समय कौन जाया करता था - कोई नहीं जाता था - ना हि उस समय संसाधन था कि इन चीजों को कोई प्रकाश में ले आए - उस दौर में प्रिंटिंग प्रेस, डिजिटल मीडिया, या व्यापक प्रचार के साधन नहीं हुआ करते थे।


हम भी जब उधर किसी काम से जाते थे, पेट्रोलिंग में जाते थे तो काले हिरण या चिंकारा हमसे भी दूर दूर भाग जाते थे पर उनको पास बुलाना होता था  तो बिश्नोई महिला या पुरुष टक टक करते थे तो वो बिलकुल पास में आ जाते थे। मतलब  यहाँ तक कि जो पालतू कुत्ते होते हैं वो भी ऐसा नहीं करते। कहने का तात्पर्य ये है कि बिश्नोई समाज के साथ काले हिरण या चिंकारा का बहुत  लगाव है।  शाम के वक्त ये जानवर अपने आप ही इनके पास आ जाते हैं।  


तो कुल मिलाकर ये हुआ एक तो इनका 20 और 9 यानी 29 नियम बचा के रखना है और दूसरा ये कि ब्लैक बक-चिंकारा के अंदर की भावना - जैसे उनको लग रहा था कि जैसे बिश्नोई महिलाएं  उनकी माँ  ही हैं - तो यह संबंध एक पवित्र माँ और बच्चे का ही संबंध है, इतना लगाव, इतना जुड़ाव।  माँ को मालूम पड़ ही जाता है कि भाई अब इस बच्चे को मुझे दूध पिलाना है, इनको दाने डालना है, इनको खाना खिलाना है।  और हाँ, ये ब्लैक बक और चिंकारा स्वच्छंद होकर खेतों में और ढाणी के आस पास घूमते रहते हैं। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : बच्चे की तरह देखा जाता है इनको इस समाज में ।  बच्चे की तरह पाला-पोसा जाता है और इनके साथ ‘शिकार’ की घटना घट गई। एक एक्टर, नहीं नहीं कई  एक्टर्स या फिल्मी कलाकार  - उन लोगों ने  ऐसा कुकृत्य किया, मैं कहूँगा हत्या कर दी ब्लक बक या काले हिरण की - जैसे कि बिश्नोई समाज के किसी बच्चे की हत्या कर दी गई हो - इस तरह से किया गया।  इस केस से भी आप जुड़े रहे हैं - है ना ? तो इस विषय में भी कुछ जानकारी देंगे तो अच्छा रहेगा ?


ललित कुमार बोरा : हाँ जरूर।  देखिए कुछ दायरे में ही रह कर मैं इसकी जानकारी दे सकता हूँ। 

बिलकुल सही फरमाया आपने कि हत्या की इसकी। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : इसलिए हत्या कह रहा हूँ और कहूंगा क्योंकि बिश्नोई समाज उसको बच्चे की तरह पालते हैं।  मैं नहीं जानता कि कौन क्या है नहीं है - पर कई  चित्रों  में  हम देखते हैं कि  एक साइड में बिश्नोई महिला अपने बच्चे को दूध पिला रही होती है और वहीं  दूसरे साइड  में ब्लैक बक के बच्चे को।  तो इसका मतलब  यही है ना कि बिश्नोई महिला ब्लैक बक को अपने बच्चे की तरह ही मानती है, प्यार करती है, पालती है।  और इस तरह के पवित्र संबंध में जब कुछ होता है, निर्दयता होती है, उसका शिकार किया जाता है - तो वो एक तरह से हत्या ही है ना ? 


ललित कुमार बोरा : बिलकुल सही है।  बिलकुल आपकी बात सही है।  और मुझे तो आश्चर्य हो रहा है कि  अब तो आप हमसे भी एक कदम आगे जा रहे हैं, पर्यावरणविद बनते जा रहे हैं - खुद ही सारी की सारी चीजों  की आपको  जानकारी है और इस क्षेत्र में इस दिशा में आप हमेशा से सराहनीय कार्य कर रहे हैं। 


तो मेरा ये कहना है कि अभी यहाँ तक, आज तक स्थिति ये है कि पाँच साल की सजा हुई है सलमान खान को और मुख्य बात तो यही था इसमें कि  शूट  इसी ने किया था।  अब तो खैर सब लोगों को मालूम पड़ ही गया है कि ये लोग जिप्सी में जाते थे - शिकार इसने किया था, ये दूसरे वाले भी इसको उकसाते थे फिर चिंकारा का शिकार भी इसने किया था।  


डॉ. अजय कुमार ओझा : अच्छा सन्दर्भ आ ही गया है तो ये भी बता दीजिए कि ब्लैक बक और चिंकारा में क्या अंतर है, क्या फर्क है ? 


 ललित कुमार बोरा : फर्क है सर चिंकारा और ब्लैक बक में।  यूँ तो देखा जाए तो दोनों बोविड (Bovidae) हैं - मतलब इसका एक बायोलॉजिकल फैमिली जो होती है उसको बोविड बोलते हैं।  चिंकारा के छोटे छोटे सींग होते हैं और हाइट जो है इसकी ऊपर से ब्राउन होती है। 


  



ब्लैक बक जो है ऊपर से बिलकुल काला होगा  - उसकी चमड़ी और सींग जो है स्पाइरल और पीछे की तरफ गए हुए होंगे। इस तरह से मतलब  बॉडी के बाहर की तरफ से निकले हुए होंगे और स्पाइरल शेप में होंगे। 




चिंकारा के सींग बिलकुल छोटे से होते हैं और ब्राउन कलर की उसकी ऊपर की चमड़ी होती है। 


इन दोनों में  मुख्य रूप से ये फिजिकल डिफरेंस होगा।  बाकी तो सभी एनाटॉमी  वगैरह तो सब एक जैसा ही होता है।  इसमें दोनों में कोई फर्क नहीं होता।  नेचर खाने का वही है - रहने का वही है। 

यह बात जरूर है कि ब्लैक बक जो हैं ना चिंकारा से कम देखा जाता है तो Obviously उसको संकटग्रस्त प्राणियों की श्रेणी में रखा गया है। और चिंकारा तो आपको फिर भी मिल जाएंगे लेकिन ब्लैक बक का दिखना बहुत मुश्किल होता है। 


एक बात और।  जो ब्लैक बक सलमान ने मारे थे वो मेल (Male) थे और फुल्ली डेवलप्ड (Fully Developed) या कहिए पूरी तरह से Mature थे  और सामान्यतः ऐसा रहता है कि खूब सारे जो ब्लैक बक होते हैं उनमें Female ही ज्यादा  रहती हैं और उनमें दो-तीन ही Male Black Buck  होते हैं।  ऐसा भी नहीं होता कि चिंकारा की तरह ब्लैक बक चारो ओर फैले हुए हैं। जहाँ तक मैंने देखा है ब्लैक बक के झुंड में पूरी तरह Female Black Buck हैं तो उस झुंड में ज्यादा से ज्यादा सिर्फ  दो से तीन Male Black Buck  दिखाई देते हैं।  ऐसा नहीं है कि  आप जाओगे तो जगह-जगह ब्लैक बक दिखाई देंगे।  बाकी सिस्टम जो इनका होता है - ब्लैक बक और चिंकारा का -  शाकाहारियों वाला ही होता है।  घास खाएंगे, उसके बाद Ruminate करेंगे।  बाकी दौड़ लगाना, कुलाचे भरना  भी इनकी प्रकृति में शामिल है। 


इस केस में किसी डॉक्टर ने पोस्टमॉर्टेम में लिख दिया था कि जो Cause of death है वो Overeating और Jumping है।  तो ये एक बड़ी विचित्र बात है। हमने इसके खिलाफ रिपोर्ट भी लिखवाई थी।  अरे भाई ये तो कुलाचे भरते ही हैं।  ब्लैक बक और  चिंकारा तो कुलाचे भर के ही दौड़ते हैं। जानवर की जहाँ तक बात है - एक साधारण इंसान भी सोच सकता है - जानवर कभी भी Overeating नहीं करेगा।  उसको जितना भी खाना खाना होगा खाएगा बाद में Ruminate  करता रहेगा  - जिस तरह से गाय-भैंस जुगाली करते हैं  वैसा भले ही बाद में करता रहे।  


डॉ. अजय कुमार ओझा : अभी तक क्या स्थिति है केस की ?


ललित कुमार बोरा :  आपने परिचय में  पहले बता दिया  - ऐसा  बड़ा पर्यावरणविद वगैरह मैं नहीं हूँ।  लेकिन ये बात जरूर है कि मुझमें ऐसी रूचि थी और इसमें भगवान ने मुझे अवसर भी दिया - पर्यावरण पर काम करने का।  तो उसके बाद मैं ऊर्जा क्षेत्र में आ गया।  ऊर्जा में भी इस तरह से आया कि कोल या थर्मल एनर्जी में नहीं गया - मैं गया विंड एनर्जी में।  विंड एनर्जी में सिंपल है।  बिलकुल हवा से ही बिजली बन रही है।  उसमें ना तो कोई चीज जलानी है न कुछ ज्यादा करना है।  उसके बाद मैं अभी वर्तमान में सोलर एनर्जी पर काम कर रहा हूँ। 


तो अभी मैं उस खयाल से - जहां पर ये केस चल रहा है वहां से पूरी तरह से कटा हुआ हूँ।  लेकिन जब कभी भी वहां जाता हूँ वहां पर यानी जोधपुर - तो अभी जो लेटेस्ट जानकारी  मुझको मिली कि भाई इसको पांच साल की सजा हुई है और इसके साथ जो थे, जो इसकी टीम थी - उसके अंदर जो नीलम, तब्बू , सोनाली, सैफ अली - इन सबको बरी कर दिया गया था। 


तो अभी गवर्नमेंट ऑफ राजस्थान गई आगे कि वो लोग जो सलमान के साथ थे उनको सजा क्यों नहीं मिली ? किसी को सजा क्यों नहीं मिली ? इसके आगे का केस काफी वर्षों से लटका पड़ा है। 


मैंने बात की थी पब्लिक प्रासीक्यूटर से कि  भाई  क्या प्रॉब्लम हो रही है ? सरकार से बाहर निकलने के बाद यदि मैं इस केस के पीछे लग कर पता करूँगा तो ऐसा लगेगा कि मैं पर्सनलाइज कर रहा हूँ - तो मैं इसको परस्यू नहीं  कर रहा पर फिर भी जब कभी अनौपचारिक बातचीत होती है तो कुछ न कुछ पता चल ही जाता है।  चिंकारा और ब्लैक बक के बारे में आपने पढ़ा होगा या सुना होगा या कभी मेरी  चर्चा में भी आया होगा - ब्लैक बक तो इसने मारा था 2 अक्टूबर 1998 को जबकि चिंकारा इसने मार दिए थे 26 और 28 सितम्बर 1998 को।  वो तो जब हमने बयान  लिया था ब्लैक बक केस में इसको अरेस्ट करने के बाद तब मालूम पड़ा कि इसने 26 और 28  सितम्बर को चिंकारा भी मारे थे। 


हमने तो  एक ही घटनाक्रम बना लिया पर जब जांच हुई, जांच के बाद हमने दोनों घटना को अलग अलग दे दिया।  उस समय चिंकारा की जांच पुलिस ने हमसे ले ली थी - वह सब उच्च स्तर पर एक निर्णय था कि भाई इसके आगे की  जांच पुलिस को दे दी जाए।  दो जो चिंकारा की जांच थी वो पुलिस को दे दी गई थी और ब्लैक बक वाली जांच हमारे पास रह गई।  तो अब ये हुआ है कि उन्होंने उसको एक मान लिया है।  ब्लैक बक का केस और चिंकारा का केस दोनों एक हैं और वो उसको  हाई कोर्ट में ले गए।  पूरा बयान हो गया है लेकिन सजा अभी तक नहीं हुई है। इसमें सजा पक्का मिलेगी इसको। अभी भी मेरा मन कह रहा है उसको सजा मिलेगी क्योंकि इस समय मुझे याद आ रहा है कि उस समय मैंने सलमान को  कहा था कि तुझे हाय लगेगी -  मूक जानवर ब्लैक बक यानी काले हिरण की। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : हालांकि कि सलमान वैसा लगता नहीं है पर जवानी में आदमी होश खो बैठता है - और आदमी अगर थोड़ी प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है तो दिमाग और खराब हो जाता है।


ललित कुमार बोरा : सही, बिलकुल सही। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : लेकिन कांड तो हुआ है और जघन्य अपराध हुआ है।  


ललित कुमार बोरा : आपकी बात सही है।  उस समय जोश भी था।  उस समय वो अपनी बुलंदियों पर था -   आ रहा था या चढ़ रहा था या लोग उसको पहचानने लगे थे।  और Obviously इस तरह के लोग जब ऊँचाई पर चढ़ते हैं तो वो फिर अपने होश में नहीं रहते। वो अपने को हीरो समझने लगते है - जैसे कुछ भी कर सकते है - कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। और हमलोग जो Actually हीरो हैं उनको लोग भूल जाते हैं। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : हाँ।  रियल हीरो को लोग भूल जाते हैं।  रील या फिल्म के नकली हीरो को याद रखते हैं।  रियल हीरो तो बिश्नोई समाज है - पर्यावरण प्रेमी, वन्य जीव प्रेमी, रियल हीरो तो आप हैं जिनको Rajasthan Forest Service की प्रतिष्ठित नौकरी छोड़नी पड़ी, संघर्ष करना पड़ा पर अपने मूल्यों से आपने समझौता नहीं किया। और पर्यावरण और वन्य जीवों के  संरक्षण के लिए गंभीरता से काम किया  और आज भी प्रयास रत हैं। 


ललित कुमार बोरा : और आज कल की देखी जाए तो लोगों को वन्य जीव संरक्षण या पर्यावरण संरक्षण में ज्यादा रूचि भी नहीं है। वन्य जीव के साथ और वो भी संकटग्रस्त जीव के साथ कुछ हो जाए तो कोई बात नहीं पर वही  फिल्म के हीरो या हीरोइन के साथ कुछ हो जाए तो सारे टीवी चैनल उसको दिखाएंगे और 

लोग भी उसको उत्सुकता से देखेंगे। दो-तीन  जानवर मर जाए या मार दिया जाए तो यह समाचार का हेडलाइन नहीं बनेगा।  पब्लिक में रूचि तो है ही नहीं, जागरूकता भी नहीं है। 


डॉ. अजय कुमार ओझा : वैसे कुछ होता है तो बहुत सारे वाइल्डलाइफ कंजर्वेशनिस्ट पूरा हंगामा कर देते हैं, सोशल मीडिया पर बाढ़ आ जाती है।  लेकिन ब्लैक बक या काले हिरण  के शिकार प्रकरण के विरुद्ध कोई अभियान नहीं छेड़ा गया, टीवी चैनल पर भी कोई खास प्रभावकारी चर्चा नहीं छेड़ी गई, न हि सोशल मीडिया पर  कोई अभियान छेड़ा गया। 

 

हाँ बिश्नोई समाज अवश्य इसके लिए लड़ रहा है , संघर्ष कर रहा है।  आप अपनी तरफ से जो कर सकते थे आपने किया। 


ललित कुमार बोरा : मैं तो ये कहना चाहूंगा कि बिश्नोई समाज के कारण से ही यह केस चला, आगे बढ़ा।  अगर इन लोगों का साथ नहीं मिलता, ना  तो ब्लैक बक दिखता ना  चिंकारा। क्योंकि ये पग-पग पर पूछते रहे हैं - जनता का अधिकार तो है ना सरकार से पूछने का  - कि भाई अब आप क्या कर रहे हो ? ये पग-पग पर हमसे पूछते रहे भाई क्या हो रहा है ? अब जब सजा मिल गई है उसको पांच साल की तो वो अब थोड़े निश्चिन्त हैं।  जो समझदार लोग हैं या उसमें जो एडवोकेट जैसे लोग हैं उनको तो मालूम है कि अभी ये चीज होगी लेकिन फिर भी उनलोगों को इतनी संतुष्टि है कि नहीं भाई कुछ तो सजा मिली।  उससे भी ज्यादा उनको ये है - एक तो ऐसे आदमी को उन्होंने सजा दिलवाई - न्याय एक तरह से मिला है - न्यायपालिका यहाँ तक पहुंची, दबाव में नहीं आई। दूसरी चीज - एक जानवर, काला हिरण को मारने पर या आपके शब्दों में उसकी हत्या करने पर सजा दी गई।  


 तो मेरा ये सोचना था - जो मैं सोच के आया था इस सर्विस में कि  पर्यावरण संरक्षण का होगा। लेकिन जब मेरी पोस्टिंग हुई थी उसके पहले ये फारेस्ट एक्ट का था -  जैसे ट्रक पकड़ना, लकड़ी काटने वालों को पकड़ना , जैसे गोंद आ रहा है पेड़ पर तो गोंद की तस्करी करने वालों को पकड़ना, आंवले का तेल ले जाने वालों को पकड़ना, अवैध खनन करनेवालों को पकड़ना  - यहाँ तक सीमित था।  ये जो 1972 का जो स्पेसिफिक एक्ट है उसमें वन्यजीव संरक्षण से संबंधित इतने प्रावधान हैं - ये ध्यान में नहीं था।  लेकिन मेरे लिए ऐसा मौका पड़ गया -  ठीक है मेरा संयोग था ऐसा कि मेरी पोस्टिंग वाइल्डलाइफ में थी - मुझे पोस्टिंग मिली जू यानी चिड़ियाघर में।  जोधपुर के चिड़ियाघर में।  तब मुझे ध्यान आया कि वास्तव में जानवरों के लिए इस तरह की सुरक्षा बहुत जरुरी है।  और विशेषतौर पर जोधपुर जैसी जगह में जहाँ बिश्नोई बेचारे शिकायत करने आते थे कि साहब देखो वहां पर हमारे हिरण मार दिए।  पहले तो मुझे विश्वास नहीं हुआ कि ‘हमारे हिरण मार दिए’ क्या होता है।  तो फिर जब जा के देखने लगा तो बड़ा आश्चर्य हुआ और पता चला कि इन हिरणों से ये लोग कितना ज्यादा लगाव रखते हैं।  फिर धीरे धीरे हमारे ऑफिस में भी हमारे Flying Squad में दो-तीन बिश्नोई भी थे। तो उनसे भी मैं थोड़ा बहुत पूछा करता था।  हालांकि Basically मैं Engineering का विद्यार्थी रहा था - Biologically या Anatomically मुझे इतना ज्ञान नहीं था। लेकिन इतना तो आदमी देख ही सकता है, अनुभव कर ही सकता है, समझ ही सकता है कि हिरण और बिश्नोई समाज की सोशल बॉन्डिंग कितनी जबरदस्त है। और ये भी मुझे लगा कि अगर इनको कुछ हो जाए तो ये मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं।  इनके सामने अगर किसी ने काले हिरण  या चिंकारा को मार दिया और ये दो-तीन उसको पकड़ लें तो जो मारनेवाला है ना, मुझे नहीं लगता कि वो बच पाए।  इतना इनको उस समय गुस्सा आ जाता है और ये क्योंकि उनका बच्चा है , उन लोगों का बच्चा है।  आपके बच्चे को कोई इस तरह से करे तो आप बर्दाश्त कर पाएंगे क्या ? 


डॉ. अजय कुमार ओझा : तो हमलोगों को बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। पर्यावरण में कोई भी असंतुलन की घटना  होती है या वन्यजीव संरक्षण के विरुद्ध  कोई घटना होती है - संरक्षण नहीं  हो रहा है - संकटग्रस्त प्राणियों का संरक्षण तो अति आवश्यक है  नहीं तो कुछ समय के बाद वो भी लुप्त हो जाएंगे और फिर से उनको पुनर्जीवित करना अत्यंत कठिन हो जाएगा।  


आपने ये भी बताया कि यह जो जीवन चक्र है और जो प्रकृति का चक्र है उसमें सबका अपना अपना महत्व है - सबकी अपनी अपनी भूमिका है।  इसलिए सबका अस्तित्व में होना बहुत जरुरी है, और इसलिए इनका संरक्षण बहुत जरुरी है।  आप तो सोलर एनर्जी  के माध्यम से ऊर्जा का संरक्षण कर रहे हैं, विंड (हवा, वायु) एनर्जी के माध्यम से भी ऊर्जा संरक्षण कर रहे है - यही नहीं वन्यजीव संरक्षण के लिए आपने बहुत कुछ किया है । और आज भी कर रहे हैं। अपनी बात से, विचार से, व्यवहार से। 


अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आपका आभार, अनेक अनेक धन्यवाद। 


Sunday, August 2, 2026

डॉ. अजय कुमार ओझा की पुस्तक 'एक घोटक की कहानी : उसी की जुबानी'

 

एक घोटक की कहानी : उसी की जुबानी

(Ek Ghotak Ki Kahani : Usi ki Jubani) 

(आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के रोचक निबंधों का रुचिकर संग्रह)


पुनर्सृजन एवं प्रस्तुति : डॉ. अजय कुमार ओझा की पुस्तक 

                                     (Dr. Ajay Kumar Ojha)


अनुराधा प्रकाशन दिल्ली से प्रकशित यह पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है। 


22 जुलाई 2026 

नगरी लिपि परिषद के केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में एक घोटक की कहानी : उसी की जुबानी पुस्तक का लोकार्पण। 




















डॉ. अजय कुमार ओझा का भोजपुरी संक्षिप्त वाल्मीकीयरामायण कथासार

 

डॉ. अजय कुमार ओझा 
का 
भोजपुरी  संक्षिप्त वाल्मीकीयरामायण कथासार 
(Bhojpuri Sankshipt Valmikiyaramayan Kathasar by Dr. Ajay Kumar Ojha)

22 जुलाई 2026 




नागरी लिपि परिषद के केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में डॉ. अजय कुमार ओझा की पुस्तक भोजपुरी संक्षिप्त वाल्मीकीयरामायण कथासार का लोकार्पण। 






















Tuesday, June 30, 2026

Prof. Avinash Kumar Singh's Foreword in the Book "The Tharus of West Champaran" by Dr. Ajay Kumar Ojha

                                                       

Prof. Avinash Kumar Singh's Foreword in the Book "The Tharus of West Champaran" by Dr. Ajay Kumar Ojha 






                                                          FOREWORD








This book by Dr. Ajay Kumar Ojha is an outcome of around five decades of his constant engagements with a tribal community called ‘The Tharus’ based primarily on participant observation research technique of field work  in the most inhospitable terrain of West Champaran district of  Bihar (India) bordering Nepal, infamous as ‘Mini Chambal’ and ‘Lal Salam Region’ in the 20th Century. 


Dr Ojha has been active in mobilizing the Tharus of this region to fight for their cause and rights that support their culture protection, habitat protection including that of forest and land. The Tharus of West Champaran, devoid for decades, became a Schedule Tribe in 2003, and in this endeavour, the persistent persuasive efforts  of Dr Ojha can never be overlooked, ignored or underestimated.


This rare book on the Tharus of West Champaran is one of its kind in social science research which not only  documents various facets of the Tharu society very essential before  they are diluted by the rapid process of globalization but also encapsulates their  journey spanning over four decades delineating the pattern of changes and developments in this erstwhile most neglected and ignored  tribal society. 



Apart from being a seasoned broadcaster as he has served in India’s Public Service Broadcaster Doordarshan for around three decades  as an officer of Indian Broadcasting Service, Dr. Ajay Kumar Ojha has been sincere and committed public intellectual engaged in highlighting the problems of the disadvantaged groups and this book would certainly not only stimulate the social scientists, intellectuals, students, even a common man  but serve as a manual, a guide, an enchiridion to the planners and policy makers.






Prof. Avinash Kumar Singh

Former Dean & Head, Department of Educational Policy

National Institute of Educational Planning & Administration

Sri Aurobindo Marg, New Delhi: 110016











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Friday, June 26, 2026

Dr. Jitendra Khatait (Tharu Tribe) on Dr. Ajay Kumar Ojha's Book "The Tharus of West Champaran"


Dr. Jitendra Khatait (Tharu Tribe) on Dr. Ajay Kumar Ojha's Book "The Tharus of West Champaran"




 “Dr. Ajay kumar Ojha’s first book,  “From Pasturization to Pauperization of the Tharus”, second book “Wonderful Tharu Tribe, Alluring Tharuhat and Charming Champaran”, third book, “Demystifying the Origin of Tharus”, and now this comprehensive book on Social System and Culture of the Tharus of West Champaran -  one of its kind in social science research and outcome of decades of dedication and commitment of the author. Now let me confess I belong to the Tharu community of West Champaran  but it seems Dr. Ajay Ojha knows more than me about the Tharus.”



Dr. Jitendra Khatait

Associate Professor

Indian Institute of Technology

New Delhi












Dr. Ajay Kumar Ojha with Dr. Jitendra Khatait (Tharu Tribe) in IIT Delhi Campus





Dr. Avijit Pathak on Dr. Ajay Kumar Ojha's Book "The Tharus of West Champaran"

 

Dr. Avijit Pathak on Dr. Ajay Kumar Ojha's Book "The Tharus of West Champaran"



“Dr. Ajay Kumar Ojha's anthropological gaze, sociological critique and humanistic sensibilities are bound to make every alert reader reflect on the Tharus of West Champaran - from the social and cultural profile of this tribal community to the tales of their eventual disempowerment. Indeed, this rigorously researched book awakens us, and makes us see the way the Tharus eventually lost their fertile land with the process of 'pasturization' after 1947. As government officials and greedy traders exploited this innocent community, and acquired their land, it led to the process of 'pauperization' of the Tharus. This insightful book ought to be read by all those who feel that a democratic society must resist the colonization of the tribal community by 'educated outsiders'.”


DR. AVIJIT PATHAK

Former Professor & Chairman

Centre for the Study of Social System

Jawaharlal Nehru University

New Delhi : 110067