Thursday, April 9, 2026

LTM to Offer MIT Open Learning's Universal AI to its Workforce in Cooperation with upGrad Enterprise

 LTM to Offer MIT Open Learning's Universal AI to its Workforce in Cooperation with upGrad Enterprise




 LTM, the Business Creativity partner to the world’s largest enterprises, announced  on April 6,2026 in Mumbai that Universal AI, a dynamic online learning experience by Massachusetts Institute of Technology (MIT) Open Learning will be made available to its workforce. The programme is being delivered in cooperation with upGrad Enterprise as part of LTM’s commitment to institutionalizing foundational AI reasoning across its talent pool.

 

 

LTM is focused on empowering its employees, across both tech and non-tech functions, to make informed, logic-driven decisions that drive client growth by preparing its workforce with scientific thinking and first-principles reasoning skills essential for success in an AI-driven economy and long-term career development. MIT Open Learning’s Universal AI programme focuses on how AI systems work, the technologies that power them, and the ethical considerations surrounding their deployment. It is a self-paced learning experience designed by MIT Open Learning faculty, covering 16 foundational modules and vertical-specific modules, suitable for all skill levels, with no coding required.

 

 

"With AI advancing rapidly, the importance of human intervention in AI solutions is crucial for effective functioning and optimized outcomes. Strategic workforce upskilling is essential to building impactful AI-led solutions. Deploying this cutting-edge MIT Open Learning programme through our upGrad partnership will strengthen our AI expertise that will define the next era of innovation,” said Gururaj Deshpande, Chief Delivery Officer, LTM.  

 

 

“Providing upskilling opportunities in AI to employees in turn bridges capability gaps with the speed, scale, and precision. It builds a future-ready workforce that can develop innovative AI-led solutions for diverse industries, with social and economic impact in mind. At upGrad Enterprise, we bring our deep expertise in outcome-driven workforce development to build a powerful global skilled workforce, and we are very excited to partner with LTM to implement this,” said Ronnie Screwvala, Chairperson & Co-Founder, upGrad.

 

 

Delivered in cooperation with upGrad Enterprise, the programme serves as the gateway for LTM employees to access MIT-tier expertise. upGrad Enterprise facilitates the deployment of these modules, enabling LTM to institutionalize AI fluency and build its organizational AI muscle at scale.

 

Upon completion, LTM employees will receive credentials from MIT Open Learning, certifying their recognized level of AI readiness and understanding of its first principles. 


(Based on inputs from Press Release)

Tuesday, March 31, 2026

अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच द्वारा आयोजित एकादश मासिक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन गोष्ठी

 अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच 

द्वारा आयोजित 

एकादश मासिक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन  गोष्ठी 


31 मार्च 2026 को अनामिका  साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच द्वारा आयोजित एकादश मासिक अंतरराष्ट्रीय ऑनलाइन  गोष्ठी का सफलता पूर्वक आयोजन किया गया। 


स्वागत वक्तव्य : डॉ. सुशीला ओझा (संरक्षिका)

संचालिका : श्रीमती प्रणति ठाकुर 

सरस्वती वंदना : मानस कुमार 

धन्यवाद ज्ञापन : डॉ. अजय कुमार ओझा 


गणमान्य प्रतिभागिता :

रचना सरन : (कार्यक्रम अध्यक्ष ) प्रख्यात साहित्यकार, रंगकर्मी, नृत्यांगना (कोलकाता)

डॉ. दिनेश प्रसाद सिन्हा : निदेशक, टेल्नोटिका लिमिटेड (अफ्रीका)

ब्रजेश कुमार त्रिपाठी : मुख्य सतर्कता अधिकारी, कोल इंडिया लिमिटेड, कोलकाता 

डॉ. ऋतु शर्मा नन्नन पांडे : पत्रकार, लेखिका, संपादक (नीदरलैंड्स)

चित्र रॉय श्रीकृष्णवी : अध्यक्ष, हिंदी साहित्य अकादमी (कोलकाता)

शिव शंकर सुमीत : कवि, पत्रकार, संपादक (खिदिरपुर, प. बंगाल )

महेंद्र भट्ट : सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार (ग्वालियर)

इन्द्र कुमार दीक्षित : पूर्व मंत्री,  नागरी प्रचारिणी सभा एवं स्तरीय पदाधिकारी (देवरिया)

सिपाली  गुप्ता : साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी (24 परगना, प. बंगाल )

मानस कुमार : नवोदित रचनाकार (भागलपुर, बिहार)

डॉ. अजय कुमार ओझा : दिल्ली 

श्रीमती प्रणति ठाकुर : सुप्रसिद्ध कवयित्री व साहित्यकार (कोलकाता)

कमल पुरोहित 'अपरिचित' : सुप्रसिद्ध कवि  व साहित्यकार (कोलकाता)


इसके अतिरिक्त और भी साहित्यकार एवं रचनाकार इस आभासी (ऑनलाइन ) गोष्ठी से जुड़े रहे जिसमें उल्लेखनीय हैं जाने-माने वयोवृद्ध कवि-रचनाकार श्री नंदकुमार मिश्र जी  एवं सुषमा मल्होत्रा जी, और इनका  स्नेहाशीष  गोष्ठी के दौरान बराबर  मिलता रहा। 

निश्चित रूप से यह गोष्ठी अत्यंत रोचक रही, तभी तो प्रायः सभी प्रतिभागी  दो घंटे से अधिक के कार्यक्रम से आद्योपांत जुड़े रहे, और सब तरह से अनुशासित व सफल भी । 


अनामिका  साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच 

 संरक्षिका : डॉ. सुशीला ओझा 

संस्थापिका व संयोजिका : डॉ. शिप्रा मिश्रा 

महासचिव : श्रीमती शुभ्रा मिश्रा 

अध्यक्ष : श्रीमती सुमन झा 

सभापति एवं मीडिया प्रभारी : डॉ. अजय कुमार ओझा 

महामंत्री एवं संचालिका : श्रीमती प्रणति ठाकुर 

मुख्य सलाहकार : श्री कमल पुरोहित 'अपरिचित'


डॉ. सुशीला ओझा का स्वागत वक्तव्य :

अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच पर आज की इस एकादश, विशिष्ट एवं अंतरराष्ट्रीय काव्य गोष्ठी में मैं सुशीला ओझा आप सभी का हार्दिक वन्दन, अभिनन्दन करती हूँ। जैसा कि आपको ज्ञात है, यह मंच समीक्षक, आलोचक, शिक्षाविद्, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी, प्रोफेसर डॉ बलराम मिश्र जी को समर्पित है। उन्होंने अपनी समृद्ध पुस्तकालय का नाम अनामिका रखा था। छायावादी रचनाकारों के प्रति उनका आकर्षण सर्वविदित है। उन्हें स्मरण करना मुझे हर बार एक नई ऊर्जा सहित प्रोत्साहित करता है। आज का यह विशिष्ट कार्यक्रम आप सभी की उपस्थिति से अति विशिष्ट हो गया है। वैसे तो अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच की काव्य गोष्ठी हर बार की तरह महीने के पहले मंगलवार को अर्थात 7 अप्रैल को संचालित होनी थी। किन्तु कुछ अपरिहार्य कारणों एवं विशेष परिस्थितिवश इसे आज 31 मार्च को ही संचालित करना पड़ रहा है। अप्रैल माह अनेक हिन्दी साहित्य सेवियों को स्मरण और नमन करता है। इसमें केदारनाथ अग्रवाल, निर्मल वर्मा, मन्नू भंडारी, माखनलाल चतुर्वेदी, जिगर मुरादाबादी, राहुल सांकृत्यायन, सफदर हाशमी, कुमार अंबुज, अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जैसे अनेक-अनेक हिन्दी साहित्य के प्रखर पुंज, उद्भट विद्वानों, हिन्दी सेवियों की जयंतियाँ और जन्मदिवस हैं, वहीं कैलास वाजपेई, सच्चिदानन्द हीरानंद वात्सायन अज्ञेय, फणीश्वरनाथ रेणु, विष्णु प्रभाकर, राहुल सांकृत्यायन, गोपाल सिंह नेपाली, रामधारी सिंह दिनकर, शैलेश मटियानी, बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे माँ सरस्वती के अनेक वरद पुत्र-पुत्रियों की पुण्यतिथियाँ भी हैं। आज की इस विशिष्ट काव्य गोष्ठी में शक्ति की आराधक शक्तिपुंज भूमि से आज के कार्यक्रम की अध्यक्ष, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी सेवा के लिए प्रतिबद्ध साहित्यकार, लेखिका, समीक्षक, कुशल मंच संचालक, पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी की सदस्य, प्रशिक्षित नृत्यांगना, रंगकर्मी रचना सरन जी, हिन्दी साहित्य अकादमी के बंगाल कोलकाता संभाग की अध्यक्ष, स्टेट प्रेसिडेंट ऑफ अखिल भारतीय सनातन परिषद और रक्षक परिषद की सशक्त प्रतिनिधित्व करने वाली चित्रा राय श्रीकृष्णवी जी, निष्णात शिक्षिका, समर्पित हिन्दी सेवी, संस्कृतिकर्मी, अंतरराष्ट्रीय महिला काव्य मंच नैहाटी इकाई की अध्यक्ष, नैहाटी कल्चर सोसायटी की सदस्य सिपाली गुप्ता जी, भारत की बेटी सूरीनाम की बहू, पत्रकार, लेखिका समीक्षक सम्पादक, अनुवादक नीदरलैंड टाउन हॉल आसन की परामर्श समिति की सदस्य, पूर्व समाचार वाचिका, कार्यक्रम संचालिका, अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में सक्रिय, सामाजिक कार्यकर्ता डॉ ऋतु शर्मा ननन पांडे जी, मध्य प्रदेश के प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत और अभिसिंचित स्वनामधन्य कवि,लेखक, विख्यात व्यंग्यकार महेंद्र भट्ट जी, हरि का आयन एवं गीता के उपदेश से संतृप्त भूमि, धर्मक्षेत्र हरियाणा से सहायक आचार्य, काव्य गरिमा हिन्दी साहित्य मंच की संस्थापक अध्यक्ष, लेखिका कवयित्री लघुकथाकार, कहानीकार, गजलकार डॉ गरिमा भाटी गौरी जी, उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से नागरी प्रचारिणी सभा के पूर्व मंत्री, प्रख्यात साहित्यकार, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के सक्रिय प्रस्तोता इंद्र कुमार दीक्षित जी, बिहार की बौद्धिक भूमि से पेशे से इंजीनियर, इंड टीवी बिहार के एडिटर इन चीफ, भोजपुरी अकादमी के अंतरराष्ट्रीय कोर्डिनेटर, महात्मा गांधी विचार मंच साउथ अफ्रीका के कोर्डिनेटर, एनाईसीएल के निदेशक डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा जी, कोल इंडिया लिमिटेड कोलकाता में सतर्कता अधिकारी, पूर्व मंडल रेलवे प्रबंधक, मातृभाषा का सशक्त प्रतिनिधित्व करने वाले ब्रजेश कुमार त्रिपाठी जी, कल्पतरु के अध्यक्ष, भारतीय वाङ्मय पीठ के मंत्री, चेतना जागृति संस्थान के मंत्री, सम्पादक, स्तंभकार, प्राध्यापक, कवि, लेखक पत्रकार शिवशंकर सिंह सुमित जी, आईटी सेक्टर में कार्यरत, नवोदित किन्तु अपनी सशक्त उपस्थिति से प्रभावित करने वाले रचनाकार मानस कुमार जी, आप सभी की सर्जनात्मक उपस्थिति को मैं नमन करती हूँ। महिला सशक्तिकरण की सार्थक परिभाषा गढ़ रही अध्यक्ष सुमन झा और इस मंच के सभापति बहुमुखी प्रतिभासंपन्न डॉ अजय कुमार ओझा का मैं हृदय से स्वागत करती हूँ। इस ऑनलाइन काव्य गोष्ठी के सूत्रधार सहृद कवि, गीतकार, ग़ज़लकार, प्रबुद्ध हिन्दी सेवी कमल अपरिचित जी और नवगीतकार, कोकिल कंठी, प्रणति ठाकुर की निष्ठा, समर्पण एवं सेवा भावना को नमन करती हूँ। आप सभी अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ हैं। आप सभी के सुझाव, सहयोग और मार्गदर्शन के बिना इस मंच की कल्पना निराधार है। आप सभी को समक्ष देखकर, सुनकर मैं अत्यंत गौरवान्वित होती रही हूँ। आज के इस विशिष्ट वार्षिक कार्यक्रम के सभी अति विशिष्ट अतिथियों का मैं पुनः पुनः अभिनन्दन करती हूँ और आपकी अनुमति के बाद आगे के संचालन का दायित्व भार यशस्विनी प्रणति ठाकुर को देती हूँ। आप सभी का बारम्बार स्वागत है 🙏



कार्यक्रम अध्यक्ष आदरणीया रचना सरन जी की कार्यक्रम समीक्षा :

सादर नमस्कार सभी को 🙏 

 अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच की एकादश काव्यगोष्ठी स्तरीय आयोजन की उदहारण है । आदरणीया @Didi 1 आंटी के संरक्षण, @Gudia दी के संयोजन और @Pranati Thakur दी के संचालन में आयोजित इस कार्यक्रम ने प्रारम्भ से ही बॉंधकर रखा । मानस कुमार जी द्वारा प्रस्तुत मॉं वीणापाणि की वंदना ने प्रभावित किया।  नीदरलैंड्स से जुड़ीं डॉ ऋतु शर्मा जी ने अपनी कविता "जीत" के माध्यम से युद्धग्रस्त विश्व की मार्मिक स्थिति का बखान करते हुए निर्माण और करुणा का सुंदर संदेश दिया। देवरिया से आदरणीय इंद्र कुमार दीक्षित जी का  सुंदर गीत" कैसे रिश्ते कैसे नाते, फूल झड़ गए रह गए कांटे"  बहुत पसंद आया । सिपाली गुप्ता जी ने  युद्ध पर अपनी  कविता के माध्यम से इंसान की विनाशकारी प्रवृत्ति पर नाराज़गी जताई,जो जायज़ थी। आदरणीय चित्र राय कृष्णाबाई जी ने अपने गीत में जो प्रेम का प्रमाण मांगा_ बहुत सुंदर लगा। आदरणीय महेन्द्र भट्ट सर मैं अपनी इकलौती बीवी के प्रति जो भक्ति भाव जाताया, उससे, हमें पूरा विश्वास है ,सभी को अवश्य ही प्रेरणा मिली होगी 😊 और आपकी चुटकियों ने माहौल को गुंजायमान किये रखा। वहीं आदरणीय शिव शंकर सुमित सर ने  टमाटरों का मोल बताते हुए अपनी श्रीमती जी पर शानदार रचना रखी। डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा जी के बेहतरीन  अशआर/ग़ज़लें (भोजपुरी) , मानस कुमार जी की शानदार व्यंजनात्मक शब्द संयोजन से अलंकृत सारगर्भित कविताएं, कमल पुरोहित 'अपरिचित'जी के मुक्तक और ग़ज़ल "रिश्तो में तल्ख़ियां रखें.." डॉ अजय कुमार ओझा जी द्वारा प्रस्तुत "आना मेघ आना " _एक अद्भुत शब्द संयोजन और अप्रतिम भावाभिव्यक्ति की बानगी प्रस्तुत कर रहे थे। डॉ बृजेश कुमार त्रिपाठी जी  ने भ्रष्टाचार पर व्यंग्य और अंतरात्मा की आवाज़ सुनने की बात बहुत सुंदर तरीके से बताइ। कार्यक्रम की संचालिका के दोनों गीत , कवियत्री की अलहदा कल्पना शक्ति और सुरीली आवाज मंत्र मुक्त कर गई।

इस अद्भुत आयोजन का हिस्सा बनने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ;  इसके लिए हम हृदय से आयोजन मण्डल के, मुख्य रूप से डॉक्टर शिप्रा मिश्रा दीदी के आभारी हैं !धन्यवाद 🙏

 हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं आप सभी को! 💐














 































Sunday, March 29, 2026

नागरी लिपि के विकास में विदेशी विद्वानों का योगदान

 

नागरी लिपि परिषद्: एक वैचारिक और व्यावहारिक क्रांति

नागरी लिपि परिषद् केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक आंदोलन है जिसका जन्म भारतीय भाषाओं के बीच की दूरी को पाटने और देवनागरी को एक 'संपर्क लिपि' (Link Script) के रूप में स्थापित करने के लिए हुआ था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और स्थापना (1975)
  • विनोबा भावे की प्रेरणा: इस परिषद् की स्थापना के मूल में गांधीवादी विचारक आचार्य विनोबा भावे का चिंतन था। उनका प्रसिद्ध नारा था— "नागरी लोकलिपि बने"। उनका मानना था कि यदि भारत की सभी प्रादेशिक भाषाएँ (जैसे तमिल, तेलुगु, कन्नड़, बांग्ला) अपनी मूल लिपि के साथ-साथ नागरी लिपि में भी लिखी जाएँ, तो देश की भावनात्मक एकता मजबूत होगी।
  • मुख्य संस्थापक: परिषद् को मूर्त रूप देने में काकासाहेबे कालेलकर जैसे मनीषियों का प्रमुख योगदान रहा। 1975 में नई दिल्ली में इसकी औपचारिक शुरुआत हुई।
 परिषद् के मुख्य उद्देश्य (Core Objectives)
  1. संपर्क लिपि का विकास: भारत की विभिन्न भाषाओं के साहित्य को एक-दूसरे के करीब लाना।
  2. मानकीकरण (Standardization): देवनागरी के वर्णों के लेखन में एकरूपता लाना ताकि भ्रम की स्थिति न रहे (जैसे 'ख' और 'र्र' के बीच का अंतर स्पष्ट करना)।
  3. तकनीकी अनुकूलन: लिपि को टाइपिंग, शॉर्टहैंड और कंप्यूटर सॉफ्टवेयर के अनुकूल बनाना।
  4. संशोधित नागरी: अन्य भाषाओं की विशिष्ट ध्वनियों (जैसे उर्दू के 'क़, ख़, ग़' या दक्षिण भारतीय भाषाओं के विशिष्ट स्वर) को व्यक्त करने के लिए नागरी में विशेष चिह्नों (नुक्ता आदि) का समावेश करना।
 'नागरी संगम': शोध और वैचारिकता का मंच
परिषद् द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका 'नागरी संगम' इस आंदोलन की रीढ़ है।
  • सामग्री: इसमें न केवल लिपि सुधार पर शोध पत्र छपते हैं, बल्कि विश्व की अन्य लिपियों के साथ नागरी का तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया जाता है।
  • प्रभाव: इस पत्रिका ने यह सिद्ध करने में बड़ी भूमिका निभाई है कि नागरी लिपि केवल हिंदी की नहीं, बल्कि 'संपूर्ण भारत की' और 'विश्व की' वैज्ञानिक लिपि बनने की क्षमता रखती है।
 विशिष्ट उपलब्धियाँ (Key Achievements)
  • लिपि सुधार: परिषद् ने देवनागरी के भ्रामक वर्णों को सुधारने और मात्राओं के स्थान को लेकर वैज्ञानिक सुझाव दिए, जिन्हें शिक्षा मंत्रालय और मानकीकरण संस्थानों ने स्वीकार किया।
  • बहुभाषी कोश: परिषद् ने ऐसे शब्दकोशों और पुस्तकों के निर्माण को प्रोत्साहित किया जहाँ एक ही पृष्ठ पर मूल भाषा और उसका नागरी लिप्यंतरण (Transliteration) मौजूद हो। इससे गैर-हिंदी भाषी लोगों के लिए हिंदी और हिंदी भाषियों के लिए अन्य भाषाएँ सीखना सरल हुआ।
  • डिजिटल उपस्थिति: परिषद् के निरंतर प्रयासों का ही परिणाम है कि आज 'यूनिकोड' (Unicode) के माध्यम से देवनागरी इंटरनेट पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुकी है।
2.5 'एक लिपि विस्तार' का सपना
परिषद् का दीर्घकालिक लक्ष्य "एक लिपि विस्तार परिषद्" के रूप में कार्य करना है। इसका अर्थ है कि लिपि किसी भाषा को मिटाती नहीं, बल्कि उसे विस्तार देती है। यदि कोई विदेशी विद्वान या दक्षिण भारतीय पाठक नागरी जानता है, तो वह नागरी में लिखी गई तमिल कविता का आनंद भी ले सकता है।

तकनीकी युग में नागरी और परिषद् के प्रयास
आधुनिक युग सूचना प्रौद्योगिकी (IT) का युग है। नागरी लिपि परिषद् ने यह अनुभव किया कि यदि देवनागरी को जीवित और प्रासंगिक रखना है, तो इसे कंप्यूटर, इंटरनेट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के अनुकूल बनाना अनिवार्य है।
मानकीकरण और की-बोर्ड (Standardization & Keyboards)
  • एक रूपता: परिषद् ने भारत सरकार के 'राजभाषा विभाग' और 'मानकीकरण संस्थान' के साथ मिलकर देवनागरी के मानक रूप को निर्धारित करने में मदद की। इससे विभिन्न फोंट्स (Fonts) के बीच आने वाली समस्याओं को दूर किया गया।
  • इनस्क्रिप्ट की-बोर्ड (InScript): परिषद् ने ऐसे की-बोर्ड लेआउट का समर्थन किया जो सभी भारतीय भाषाओं के लिए समान हो, ताकि नागरी जानने वाला व्यक्ति आसानी से अन्य भारतीय भाषाओं में भी टाइप कर सके।
यूनिकोड और वैश्विक उपस्थिति (Unicode Revolution)
  • डिजिटल पहचान: परिषद् के निरंतर वैचारिक दबाव और शोध का परिणाम है कि आज 'यूनिकोड' के माध्यम से देवनागरी इंटरनेट पर अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा चुकी है। अब गूगल, फेसबुक और व्हाट्सएप जैसे वैश्विक मंचों पर नागरी का प्रयोग अत्यंत सरल हो गया है।
  • वेबसाइट्स और ब्लॉग्स: परिषद् ने लेखकों को नागरी लिपि में ब्लॉगिंग और वेबसाइट निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया, जिससे वैश्विक स्तर पर लिपि का प्रसार हुआ।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नागरी (AI & Nagari)
  • Natural Language Processing (NLP): विदेशी विद्वानों और परिषद् के विशेषज्ञों ने यह सिद्ध किया है कि नागरी लिपि 'फोनेटिक' (ध्वन्यात्मक) होने के कारण वॉयस टाइपिंग (Voice Typing) और टेक्स्ट-टू-स्पीच (Text-to-Speech) तकनीकों के लिए विश्व की सबसे सटीक लिपि है।
  • कोडिंग की संभावना: शोधकर्ताओं का मानना है कि भविष्य में नागरी आधारित प्रोग्रामिंग भाषाएँ बनाना अधिक तार्किक होगा क्योंकि इसमें भ्रम (Ambiguity) की गुंजाइश शून्य है।

नागरी लिपि के विकास में विदेशी विद्वानों का योगदान
  1. नागरी लिपि (देवनागरी) की वैज्ञानिकता को वैश्विक पहचान दिलाने में पश्चिमी विद्वानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। जहाँ भारतीय विद्वानों ने इसे अपनी सांस्कृतिक विरासत माना, वहीं विदेशी विद्वानों ने इसे 'ध्वनि विज्ञान' (Phonetics) और 'तर्कशास्त्र' (Logic) की दृष्टि से परखा।
     प्रारंभिक अन्वेषण: सर विलियम जोन्स (Sir William Jones)
    18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, एशियाटिक सोसाइटी के संस्थापक सर विलियम जोन्स ने संस्कृत और उसकी लिपि देवनागरी का गहन अध्ययन किया।
    • वैज्ञानिकता का स्वीकार: जोन्स ने घोषणा की कि देवनागरी की वर्णमाला दुनिया की सबसे पूर्ण और व्यवस्थित लिपि है।
    • तुलनात्मक अध्ययन: उन्होंने पाया कि रोमन लिपि की तुलना में नागरी लिपि में प्रत्येक ध्वनि के लिए एक विशिष्ट चिह्न है, जिससे उच्चारण में कोई भ्रम नहीं रहता। उनके इस शोध ने यूरोप के अन्य विद्वानों का ध्यान नागरी की ओर खींचा।
    मुद्रण और मानकीकरण: चार्ल्स विल्किन्स (Charles Wilkins)
    देवनागरी को हस्तलिखित पाण्डुलिपियों से निकालकर आधुनिक 'टाइप' (Printing) के सांचे में ढालने का श्रेय चार्ल्स विल्किन्स को जाता है।
    • प्रथम टाइपोग्राफी: विल्किन्स ने स्वयं नागरी के अक्षरों के सांचे (Matrix) तैयार किए।
    • प्रसार: उनकी इस उपलब्धि से नागरी लिपि में पुस्तकों का प्रकाशन सरल हुआ, जिससे यह लिपि वैश्विक अकादमिक जगत में सुलभ हो गई।
     भाषाई शुद्धता के पैरोकार: मैक्स मूलर (Friedrich Max Müller)
    जर्मन विद्वान मैक्स मूलर ने ऋग्वेद का संपादन करते हुए देवनागरी के प्रति अपनी गहरी श्रद्धा और वैज्ञानिक रुचि प्रकट की।
    • अक्षरों का क्रम: मूलर ने तर्क दिया कि नागरी लिपि का वर्गीकरण (कंठ्य, तालव्य, मूर्धन्य आदि) मानव शरीर के वाक-यंत्र (Vocal Organs) के अनुकूल है।
    • वैश्विक प्रतिष्ठा: उन्होंने इसे "मानवता की सबसे महान खोज" में से एक माना, जिसने नागरी को केवल 'हिंदू लिपि' से ऊपर उठाकर एक 'विश्व लिपि' का दर्जा दिलाने में मदद की।
    आधुनिक युग और आइजैक पिटमैन (Isaac Pitman)
    शॉर्टहैंड (आशुलिपि) के आविष्कारक सर आइजैक पिटमैन ने देवनागरी की मुक्त कंठ से प्रशंसा की थी।
    • रोमन लिपि की सीमाएँ: पिटमैन ने बताया कि अंग्रेजी (रोमन) में एक ही अक्षर 'A' के कई उच्चारण होते हैं, जबकि नागरी में 'अ' का उच्चारण हमेशा स्थिर रहता है।
    • सुझाव: उन्होंने सुझाव दिया था कि यदि दुनिया को एक आदर्श लिपि अपनानी हो, तो वह देवनागरी के सिद्धांतों पर आधारित होनी चाहिए।
     रूसी और अमेरिकी विद्वानों का दृष्टिकोण (Modern NLP Perspective)
    20वीं और 21वीं सदी में विदेशी विद्वानों का ध्यान नागरी की 'कंप्यूटेशनल' क्षमता पर गया है।
    • शून्य संदिग्धता (Zero Ambiguity): आधुनिक भाषाविदों का मानना है कि नागरी लिपि में 'जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है', इसलिए यह Artificial Intelligence (AI) और Natural Language Processing (NLP) के लिए सबसे उपयुक्त लिपि है।
    • रूसी विद्वान: बारान्निकोव जैसे रूसी विद्वानों ने नागरी के माध्यम से भारतीय साहित्य का अनुवाद करते हुए इसकी लेखन-सुलभता की सराहना की है।
    • निष्कर्ष (Conclusion)
      नागरी लिपि परिषद् की यात्रा और विदेशी विद्वानों के योगदान का विश्लेषण करने के पश्चात हम निम्नलिखित निष्कर्षों पर पहुँचते हैं:
      1. वैज्ञानिक श्रेष्ठता: देवनागरी केवल एक पारंपरिक लिपि नहीं है, बल्कि यह मानव उच्चारण विज्ञान (Human Phonetics) का सबसे शुद्ध रूप है, जिसे सर विलियम जोन्स से लेकर आधुनिक भाषाविदों तक ने स्वीकार किया है।
      2. सांस्कृतिक एकता का सेतु: परिषद् ने विनोबा भावे के 'नागरी लोकलिपि' के स्वप्न को जीवित रखा है। यह लिपि उत्तर और दक्षिण भारत के साथ-साथ भारत और विदेशों (जैसे मॉरीशस, फिजी, नेपाल) के बीच एक सांस्कृतिक पुल का कार्य कर रही है।
      3. विदेशी विद्वानों की प्रासंगिकता: मैक्स मूलर और आइजैक पिटमैन जैसे विद्वानों के शोध ने नागरी को अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक जगत में सम्मान दिलाया, जिससे भारतीयों में अपनी लिपि के प्रति गर्व का भाव जागा।
      4. भविष्य की लिपि: डिजिटल क्रांति के इस दौर में नागरी लिपि परिषद् के प्रयास यह सुनिश्चित करते हैं कि देवनागरी न केवल प्राचीन ग्रंथों की रक्षक बनी रहे, बल्कि भविष्य की 'ग्लोबल कोडिंग' और 'एआई' की दुनिया में भी अग्रणी भूमिका निभाए।