सनातन धर्म : शाश्वत जीवनदर्शन
डॉ. अजय कुमार ओझा
भारतभूमि आदिकाल से ही अध्यात्म, दर्शन और संस्कृति की पवित्र भूमि रही है। यहाँ के ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन के परम रहस्य की खोज की और जो सत्य अनुभव किया, वही शास्त्रों में अभिव्यक्त हुआ। इसी शाश्वत परंपरा को “सनातन धर्म” कहा जाता है। सनातन का अर्थ है जो कभी न समाप्त हो, जो नित्य, अविनाशी और अनादि हो। धर्म का तात्पर्य केवल पूजा-विधि या कर्मकांड तक सीमित नहीं है, अपितु यह जीवन की संपूर्ण व्यवस्था है, जो मनुष्य को आत्मानुशासन, सदाचार और परोपकार की ओर ले जाती है।
सनातन धर्म का मूलाधार वेद हैं। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में निहित मंत्र केवल स्तुतिगान नहीं, बल्कि प्रकृति और पुरुष, आत्मा और परमात्मा, जीव और जगत के रहस्यों का गहन ज्ञान भी प्रदान करते हैं। उपनिषदों ने इसी ज्ञान को और विस्तार दिया। “अहं ब्रह्मास्मि” तथा “तत्त्वमसि” जैसे महावाक्य यह उद्घोष करते हैं कि मनुष्य सीमित शरीर और मन से कहीं अधिक है; वह स्वयं ब्रह्म का अंश है। यही शिक्षा जीवन को उच्चतम शिखर तक पहुँचाती है।
महाभारत का गीता उपदेश सनातन धर्म का व्यावहारिक स्वरूप है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि “स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः।” अर्थात् अपने कर्तव्य-कर्म (स्वधर्म) का पालन करते हुए मृत्यु को प्राप्त होना बेहतर है । प्रत्येक मनुष्य को अपना कर्तव्य ही श्रेष्ठ मानना चाहिए। यही दृष्टि समाज को संतुलित रखती है और प्रत्येक व्यक्ति को आत्मसम्मान तथा आत्मविश्वास प्रदान करती है। गीता का कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग आज भी जीवन की दिशा दिखाते हैं।
सनातन धर्म केवल ग्रंथों तक सीमित नहीं है। यह हमारे जीवन के प्रत्येक अंग में व्याप्त है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, दया, क्षमा, शौच, संतोष और तपस्या जैसे मूल्य मनुष्य को पवित्र और परिष्कृत बनाते हैं। यही कारण है कि इसे किसी विशेष पंथ या जाति का धर्म न मानकर सार्वभौम धर्म कहा जाता है। इसमें करुणा केवल मनुष्य तक नहीं, बल्कि समस्त प्राणिमात्र तक विस्तृत है। वृक्ष, जल, वायु, पशु-पक्षी, पर्वत और नदी सबका सम्मान करना इसी धर्म का अंग है।
यदि हम इतिहास की ओर देखें तो पाते हैं कि विदेशी आक्रमणों, संघर्षों और दीर्घकालीन गुलामी के बाद भी भारत की आत्मा जीवित रही। इसका कारण यही सनातन मूल्य-प्रणाली है। जब-जब संकट आया, धर्म ने समाज को नया जीवन दिया। गुरुकुल परंपरा, भक्ति आंदोलन, संतों और आचार्यों की वाणी - सबने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। यही कारण है कि आज भी भारत की पहचान अध्यात्म और संस्कृति से होती है।
सनातन धर्म ने विश्व को योग और ध्यान जैसी अमूल्य विधाएँ दीं। पतंजलि के योगसूत्रों ने स्पष्ट कहा - “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।” योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन की साधना है। प्राणायाम से श्वास पर नियंत्रण, ध्यान से मन की स्थिरता और आसनों से शरीर की सुदृढ़ता प्राप्त होती है। आज विश्वभर में योग अपनाया जा रहा है और यह सनातन धर्म की सर्वमान्य देन है।
आयुर्वेद भी इसी परंपरा का अभिन्न अंग है। यह केवल औषधि का विज्ञान नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है। इसमें आहार, विहार और दिनचर्या के नियम बताए गए हैं। दोष, धातु और मल की संतुलित स्थिति ही स्वास्थ्य है। ऋषियों ने पंचकर्म, औषधियों और जड़ी-बूटियों के माध्यम से रोगनिवारण का अद्भुत विज्ञान दिया। आज जब आधुनिक चिकित्सा अनेक सीमाओं से जूझ रही है, तब आयुर्वेद पुनः प्रासंगिक हो रहा है।
सनातन धर्म केवल साधना या दार्शनिक चिंतन नहीं, बल्कि उत्सवमय जीवन भी है। दीपावली, होली, रक्षाबंधन, नवरात्र, जन्माष्टमी, रामनवमी आदि पर्व समाज को एकसूत्र में बाँधते हैं। ये उत्सव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक शिक्षा के माध्यम हैं। दीपावली हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का संदेश देती है, होली सामाजिक समरसता का प्रतीक है, रक्षाबंधन भाई-बहन के पवित्र संबंध का उत्सव है।
सनातन धर्म की एक विशेषता यह भी है कि उसने प्रकृति को देवत्व का रूप माना। नदियाँ मातृस्वरूपा हैं, वृक्षों को पूजनीय माना गया, पर्वत और वन उपास्य माने गए। यही कारण है कि इस परंपरा में पर्यावरण-संरक्षण का विचार सहज ही विद्यमान है। आधुनिक युग में जब प्रदूषण और जलवायु-संकट गंभीर समस्या बन गए हैं, तब सनातन धर्म की यह शिक्षाएँ और भी प्रासंगिक हो उठी हैं।
आज का युग भौतिकता, उपभोक्तावाद और प्रतिस्पर्धा से भरा हुआ है। मनुष्य बाहरी सुखों के पीछे दौड़ रहा है और परिणामस्वरूप अशांति, तनाव और असंतोष बढ़ रहा है। ऐसे समय में सनातन धर्म पुनः स्मरण कराता है कि जीवन का उद्देश्य केवल धन और ऐश्वर्य नहीं, अपितु आत्मिक उन्नति और लोककल्याण है। यदि व्यक्ति योग, ध्यान, सेवा और साधना को अपनाए तो वह न केवल स्वयं को शांति देगा, बल्कि समाज में भी करुणा और सद्भाव का प्रसार करेगा।
सनातन धर्म केवल भारत का नहीं, अपितु संपूर्ण मानवता का जीवनदर्शन है। यह न तो किसी एक जाति का है, न किसी एक काल का। यह अनादि है और अनंत है। इसकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही सार्थक हैं जितनी सहस्रों वर्ष पूर्व थीं। यह हमें सिखाता है कि आत्मा अमर है, सत्य अनंत है और करुणा ही वास्तविक बल है। जो व्यक्ति इन मूल्यों को अपनाता है, उसका जीवन पवित्र और उदात्त बन जाता है।
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