सोशल मीडिया कितना सोशल ?
1.आभासी सुबह और खोई हुई हर्बल चाय की चुस्की
मानव सभ्यता के इतिहास में सुबह की परिभाषा ब्रह्म मुहूर्त की परिभाषा हमेशा से बहुत नैसर्गिक रही है। चिड़ियों का चहचहाना, पूरब में सूरज की लालिमा, बड़ों का आशीर्वाद और रसोई से आती ताज़ा चाय की महक — यही हमारी सुबह की पहचान थी। लेकिन इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में सुबह का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। आज जब हमारी आँखें खुलती हैं, तो हम उगते हुए सूरज को नहीं देखते, बल्कि हमारे हाथ सिरहाने रखे स्मार्टफोन की तरफ बढ़ते हैं। आँखों की पुतलियाँ अभी पूरी तरह खुली भी नहीं होतीं कि स्क्रीन की नीली रोशनी हमारी चेतना पर हावी हो जाती है।
हम अपनों का चेहरा देखने से पहले दुनिया भर के नोटिफिकेशन देखते हैं। किसने हमारी तस्वीर को लाइक किया? किसने हमारी पोस्ट पर क्या टिप्पणी की? देश-दुनिया में कहाँ क्या घटित हुआ? इन सब आभासी जानकारियों के बीच वह वास्तविक सुबह कहीं खो जाती है। माँ की बनाई हुई चाय मेज पर रखी-रखी ठंडी हो जाती है, क्योंकि हम इंस्टाग्राम की रील्स स्क्रॉल करने या व्हाट्सएप पर आए 'गुड मॉर्निंग' के सैकड़ों कृत्रिम संदेशों का उत्तर देने में व्यस्त होते हैं।
यह दृश्य किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि आज की वैश्विक मानव आबादी का सामूहिक यथार्थ है। सोशल मीडिया ने हमें एक ऐसी दुनिया में धकेल दिया है जहाँ हम भौतिक रूप से तो उपस्थित हैं, लेकिन मानसिक रूप से कहीं दूर भटक रहे हैं। इसे तकनीकी भाषा में 'कनेक्टिविटी' कहा जा सकता है, लेकिन मानवीय भाषा में यह 'अलगाव' (Alienation) की शुरुआत है। जो हमारे सबसे पास बैठे हैं, हम उनसे मीलों दूर हो चुके हैं और जो मीलों दूर हैं, उन्हें अपनी स्क्रीन पर समेटने की कोशिश कर रहे हैं। यह विरोधाभास ही इस निबंध का मुख्य प्रश्न है — जो मीडिया खुद को 'सोशल' (सामाजिक) कहता है, वह हमें कितना सामाजिक बना रहा है और कितना एकाकी?
2.'लाइक' की भूख और खोता हुआ वजूद
मनोविज्ञान में एक सिद्धांत है जिसे 'बाहरी प्रमाणीकरण' (External Validation) कहा जाता है। इसका अर्थ है कि मनुष्य को अपने वजूद, अपनी सुंदरता और अपनी योग्यताओं को स्वीकार करने के लिए दूसरों की सहमति की आवश्यकता होती है। सोशल मीडिया ने इस मनोवैज्ञानिक कमजोरी को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। आज हमारा आत्मसम्मान, हमारी मानसिक शांति और हमारा मूड इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी नई तस्वीर या पोस्ट पर कितने 'लाइक्स' आए हैं।
यदि किसी पोस्ट पर उम्मीद से कम लाइक्स आएं, तो व्यक्ति आत्म-संदेह से घिर जाता है। उसे लगने लगता है कि शायद वह सुंदर नहीं दिख रहा है, या उसकी बातें समाज के लिए महत्वहीन हैं। इसके विपरीत, यदि लाइक्स की संख्या बढ़ जाए, तो एक झूठा और क्षणिक अहंकार जन्म लेता है। न्यूरोसाइंस (मस्तिष्क विज्ञान) के अनुसार, जब भी हमें कोई लाइक, कमेंट या शेयर मिलता है, तो हमारे मस्तिष्क में डोपामाइन (Dopamine) नामक न्यूरोट्रांसमीटर रिलीज होता है। यह वही केमिकल है जो किसी भी लत (जैसे जुआ या नशा) के समय मस्तिष्क को पल भर की खुशी देता है।
इस डोपामाइन की भूख ने हमें 'दिखावे का गुलाम' बना दिया है। हम वास्तव में खुश होने के लिए नहीं जी रहे हैं, बल्कि दूसरों को यह दिखाने के लिए जी रहे हैं कि हम खुश हैं। हम किसी खूबसूरत वादी में घूमने जाते हैं, तो वहाँ की ताज़ी हवा को फेफड़ों में भरने के बजाय, पहला काम कैमरे से 'परफेक्ट शॉट' लेने का करते हैं ताकि उसे तुरंत स्टोरी पर पोस्ट किया जा सके। हम बादलों की खूबसूरती को अपनी आँखों से नहीं, बल्कि स्क्रीन के लेंस से देखते हैं। जब जीवन का हर अनुभव केवल एक 'कंटेंट' (सामग्री) बनकर रह जाए, तो आत्मा का खोखला होना तय है।
3.स्क्रीन की चमचमाती दीवारें और सूने बैठकखाने
किसी भी समाज की प्राथमिक इकाई उसका परिवार होता है। पुराने समय में घरों के 'बैठकखाने' या 'ड्रॉइंग रूम' वह जगह होते थे जहाँ दिन भर की थकान के बाद पूरा परिवार बैठता था। सुख-दुख साझा किए जाते थे, ठहाके गूंजते थे और रिश्तों में गर्माहट बनी रहती थी। लेकिन आज इन बैठकखानों में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहता है। यदि आप किसी आधुनिक परिवार के लिविंग रूम का अवलोकन करें, तो आपको चार लोग बैठे दिखेंगे, लेकिन चारों के सिर नीचे झुके होंगे और उंगलियाँ अपनी-अपनी स्क्रीन पर दौड़ रही होंगी।
स्क्रीन की इन चमचमाती दीवारों ने परिवारों के बीच अदृश्य लेकिन बेहद मजबूत दीवारें खड़ी कर दी हैं। पति-पत्नी एक ही बिस्तर पर लेटे होने के बावजूद एक-दूसरे से बात करने के बजाय अपने-अपने फोन में दुनिया ढूंढ रहे होते हैं। बच्चे माता-पिता से संवाद करने के बजाय ऑनलाइन गेमिंग या चैटिंग में व्यस्त हैं। संवादहीनता का यह संकट परिवारों को भीतर से कमजोर कर रहा है।
अब माता-पिता को बच्चों को डांटने या बुलाने के लिए भी व्हाट्सएप मैसेज का सहारा लेना पड़ता है। रिश्तों की जो गर्माहट स्पर्श, आंखों के संपर्क (Eye Contact) और आमने-सामने की बातचीत से आती थी, उसे अब 'इमोजी' (Emojis) ने रिप्लेस कर दिया है। हम दुख जताने के लिए रोने वाला इमोजी भेज देते हैं और खुशी के लिए हंसने वाला, लेकिन दिल के भीतर की संवेदनशीलता धीरे-धीरे मर रही है। रिश्ते अब गहरे नहीं रहे, वे केवल स्क्रीन पर दिखने वाले स्टेटस बनकर रह गए हैं।
4.'फॉलोअर्स' की भीड़ में अकेला इंसान
फेसबुक पर हमारे पाँच हजार 'फ्रेंड्स' हो सकते हैं, इंस्टाग्राम पर हमारे हजारों 'फॉलोअर्स' हो सकते हैं और लिनक्डइन पर लंबा-चौड़ा नेटवर्क हो सकता है। पहली नज़र में यह आभास होता है कि हम दुनिया के सबसे लोकप्रिय और सामाजिक व्यक्ति हैं। लेकिन इस विशाल भीड़ का दूसरा पहलू बेहद डरावना है। ब्रिटिश नृवंशविज्ञानी रॉबिन डुनबर ने एक सिद्धांत दिया था, जिसे डुनबर नंबर (Dunbar's Number) कहा जाता है। इसके अनुसार, कोई भी मनुष्य अधिकतम 150 सार्थक सामाजिक संबंध ही बनाए रख सकता है।
सोशल मीडिया ने 'मित्रता' और 'संबंध' जैसे पवित्र शब्दों की परिभाषा को बेहद सतही और सस्ता बना दिया है। पहले किसी को दोस्त बनाने के लिए सालों का वक्त देना पड़ता था, उनके सुख-दुख में शारीरिक रूप से खड़ा होना पड़ता था, भरोसे की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता था। आज सिर्फ एक नीले रंग का 'फॉलो' या 'ऐड फ्रेंड' बटन दबाकर दोस्ती हो जाती है।
यही कारण है कि जब रात के सन्नाटे में इंसान का मन उदास होता है, जब वह किसी गहरे अवसाद या संकट से गुजर रहा होता है, तो वह अपनी उंगलियों से स्क्रीन को घंटों स्क्रॉल करता है, लेकिन उसे पाँच हजार की उस सूची में एक भी ऐसा नाम नहीं मिलता जिसे वह बिना झिझक रात के दो बजे फोन करके रो सके। यह 'हाइपर-कनेक्टिविटी' (Hyper-connectivity) के दौर का सबसे बड़ा झूठ है। हम जितने ज्यादा ऑनलाइन जुड़े हुए हैं, भीतर से उतने ही अकेले और अलग-थलग होते जा रहे हैं।
5.रील (Reels) संस्कृति और घटता धैर्य (Attention Span)
सोशल मीडिया के स्वरूप में पिछले कुछ वर्षों में एक क्रांतिकारी और विनाशकारी बदलाव आया है — वह है शॉर्ट वीडियो या 'रील्स' (Reels) की संस्कृति। टिकटॉक से शुरू होकर इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स तक फैली इस बीमारी ने मानव मस्तिष्क की काम करने की शैली को बदल दिया है। 15 से 30 सेकंड के ये वीडियो हमारे मस्तिष्क को लगातार और तेजी से डोपामाइन के झटके देते हैं।
एक रील में कोई नाच रहा है, अगली रील में कोई रो रहा है, तीसरी में कोई ज्ञान की बात बता रहा है और चौथी में कोई प्रैंक कर रहा है। मात्र दो मिनट के भीतर हमारा मस्तिष्क पाँच अलग-अलग तरह की तीव्र भावनाओं से गुजरता है। इसका सीधा परिणाम यह हुआ है कि मनुष्य का अटेंशन स्पैन (धैर्य या एकाग्रता की अवधि) घटकर एक सुनहरी मछली (Goldfish) से भी कम हो गया है। आज का युवा वर्ग किसी गंभीर विषय पर 10 मिनट का वीडियो देखने या 5 पेज का कोई लेख पढ़ने का धैर्य खो चुका है।
इस मानसिक चंचलता ने हमारी सोचने-समझने और गहराई से विश्लेषण करने की क्षमता को नष्ट कर दिया है। छात्र किताबों से दूर हो रहे हैं क्योंकि किताबों में रील्स की तरह तुरंत बदलने वाला आकर्षण नहीं होता। कार्यस्थलों पर लोग एकाग्रता से काम नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि हर दो मिनट बाद उनका हाथ फोन की स्क्रीन को स्वाइप करने के लिए मचलने लगता है। यह 'शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट' हमें मानसिक रूप से उथला और वैचारिक रूप से अपंग बना रहा है।
6.ट्रॉल्स, नफरत और खोती हुई संवेदनशीलता
सोशल मीडिया का एक और स्याह और वीभत्स चेहरा है — डिजिटल एनोनिमिटी (Anonymity/अनामिकता)। स्क्रीन के पीछे छिपकर, एक फर्जी नाम और डीपी (Display Picture) लगाकर कोई भी व्यक्ति किसी के बारे में कुछ भी लिख सकता है। इस सुविधा ने समाज के भीतर छिपी नफरत, कुंठा और ईर्ष्या को एक बहुत बड़ा मंच दे दिया है। आज 'ट्रॉलिंग' (Trolling) और 'साइबर बुलिंग' (Cyber Bullying) एक वैश्विक महामारी बन चुके हैं।
किसी की शारीरिक बनावट का मज़ाक उड़ाना (Body Shaming), किसी के विचारों के लिए उसे भद्दी गालियाँ देना, और यहाँ तक कि जान से मारने की धमकियाँ देना सोशल मीडिया पर बेहद आम बात हो चुकी है। इंटरनेट पर सहानुभूति (Empathy) और करुणा जैसी मानवीय भावनाएँ दम तोड़ रही हैं। लोग किसी दुर्घटना के समय पीड़ित की मदद करने के बजाय, उसका वीडियो बनाकर 'लाइक और व्यूज' बटोरने की होड़ में लग जाते हैं।
इस वर्चुअल नफरत का असर सीधे तौर पर युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। डिप्रेशन, एंग्जायटी (घबराहट) और आत्महत्या की प्रवृत्तियों में पिछले एक दशक में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। सोशल मीडिया जो कभी लोगों को जोड़ने का माध्यम माना गया था, आज नफरत फैलाने, अफवाहों को हवा देने और समाज को सांप्रदायिक व राजनीतिक आधार पर बांटने का सबसे बड़ा औजार बन चुका है।
7.क्या सब कुछ कृत्रिम है? कुछ सकारात्मक पहलू
इस गहन विमर्श के बीच यदि हम सोशल मीडिया के केवल नकारात्मक पक्षों को ही देखें, तो यह इस तकनीक के साथ अन्याय होगा। सोशल मीडिया अपने आप में कोई जीवित शत्रु नहीं है, यह एक माध्यम है, एक साधन है। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग कौन और किस प्रकार कर रहा है। इस आभासी दुनिया ने समाज को कई बेहतरीन सौगातें भी दी हैं।
- लोकतांत्रीकरण (Democratization of Talent): पहले किसी कलाकार, लेखक या संगीतकार को अपनी कला दिखाने के लिए बड़े स्टूडियो या प्रकाशकों के चक्कर काटने पड़ते थे। आज एक सुदूर गाँव में बैठा हुआ युवा भी यूट्यूब या इंस्टाग्राम के माध्यम से अपनी प्रतिभा पूरी दुनिया के सामने रख सकता है।
- सामाजिक क्रांतियाँ और न्याय: निर्भया आंदोलन से लेकर दुनिया भर के विभिन्न सामाजिक अभियानों तक, सोशल मीडिया ने आम जनता की आवाज़ को सरकार तक पहुँचाने में एक बड़े उत्प्रेरक (Catalyst) की भूमिका निभाई है। संकट के समय (जैसे महामारी या बाढ़) में इसी सोशल मीडिया के जरिए लोगों ने एक-दूसरे तक ऑक्सीजन, दवाइयाँ और भोजन पहुँचाया है।
- ज्ञान का प्रसार: शिक्षा आज किसी क्लासरूम तक सीमित नहीं है। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर्स के व्याख्यान आज इंटरनेट पर मुफ्त उपलब्ध हैं, जिससे कोई भी जिज्ञासु व्यक्ति ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
समस्या तकनीक में नहीं है; समस्या हमारी अति और निर्भरता में है। आग से खाना भी पकाया जा सकता है और घर को जलाया भी जा सकता है। चुनाव हमेशा मनुष्य का होता है।
8.डिजिटल डिटॉक्स और खुद की तलाश (Conclusion)
हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सोशल मीडिया 'सोशल' होने का एक बहुत बड़ा भ्रम (Illusion) पैदा करता है, लेकिन वास्तव में यह हमें एकाकीपन के गहरे दलदल में धकेलता है। यह हमें पूरी दुनिया की खबरें देता है, लेकिन हमारे भीतर चल रहे शोर को सुनने का समय छीन लेता है।
अब समय आ गया है कि हम अपनी जिंदगी का रिमोट कंट्रोल इस एल्गोरिदम (Algorithm) के हाथों से वापस अपने हाथ में लें। इसके लिए 'डिजिटल डिटॉक्स' (Digital Detox) की अत्यंत आवश्यकता है। हमें सचेत रूप से कुछ कड़े नियम बनाने होंगे:
- दिन का कम से कम एक घंटा 'नो स्क्रीन टाइम' होना चाहिए, जहाँ हम सिर्फ खुद से, किताबों से या प्रकृति से जुड़ें।
- पारिवारिक भोजन के समय फोन को मेज से दूर रखा जाए।
- 'वर्चुअल लाइक्स' के बजाय वास्तविक जीवन के संबंधों में समय और ऊर्जा का निवेश किया जाए।
हजारों फॉलोअर्स की उस बेजान भीड़ से बेहतर है कि हमारे पास दो ऐसे सच्चे दोस्त हों जो हमारे रोने पर स्क्रीन पर 'Sad Emoji' भेजने के बजाय हमारे कंधे पर अपना हाथ रख सकें। तकनीक का स्वागत जरूर कीजिए, लेकिन उसे अपनी मानवीय संवेदनाओं पर हावी मत होने दीजिए। कभी-कभी फोन की स्क्रीन को बंद करके खिड़की से बाहर देखना, चिड़ियों की चहचहाहट सुनना और अपनों के साथ हर्बल चाय की वास्तविक चुस्की लेना ही असली अर्थों में 'सोशल' होना है।
No comments:
Post a Comment