सनातन धर्म में पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण हजारों वर्षों से जीवन जीने की पद्धति (धर्म)
डॉ. अजय कुमार ओझा
सनातन धर्म में पर्यावरण एवं वन्यजीव संरक्षण केवल एक आधुनिक सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से जीवन जीने की पद्धति (धर्म) का एक अभिन्न अंग रहा है। हमारे प्राचीन ग्रंथों और परंपराओं में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और सह-अस्तित्व की भावना को गहराई से पिरोया गया है।
1. पर्यावरण संरक्षण का वैचारिक आधार
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः: अथर्ववेद का यह पृथ्वी सूक्त भूमि को माता और मनुष्य को उसका पुत्र मानता है।
पंचमहाभूत की अवधारणा: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को जीवित तत्व मानकर पूजनीय बनाया गया है।
ईशावास्य उपनिषद: सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का वास (ईशावास्यमिदं सर्वं) मानकर सीमित उपभोग का संदेश दिया गया है।
ऋत (Cosmic Order): वेदों के अनुसार प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ना ब्रह्मांडीय नियमों का उल्लंघन है।
2. वृक्ष और वनस्पतियों का संरक्षण
देवताओं का वास: पीपल में विष्णु, बरगद में शिव और नीम में देवी का वास मानकर इन्हें काटने से रोका गया है।
वृक्षारोपण का पुण्य: पद्मपुराण के अनुसार पेड़ लगाना सीधे स्वर्ग या मोक्ष के मार्ग से जोड़ा गया है।
पवित्र उपवन (Sacred Groves): वन और जंगलों के कुछ हिस्सों को देवताओं को समर्पित कर शिकार और कटाई वर्जित रखी गई।
3. वन्यजीव एवं जीव संरक्षण
देवी-देवताओं के वाहन: बाघ (दुर्गा), मूषक (गणेश), गरुड़ (विष्णु) और नंदी (शिव) के माध्यम से जीवों को पूजनीय बनाया गया है।
अहिंसा परमो धर्मः: सनातन संस्कृति में हर जीव में एक ही आत्मा का वास माना गया है।
गौ संरक्षण: गाय को 'अघन्या' (न मारने योग्य) और कामधेनु मानकर हिंदू घरों में पालने और पूजने का विधान है।
दैनिक पंचमहायज्ञ: रोज़ चींटियों को आटा और पक्षियों को दाना (भूत यज्ञ) देना हर गृहस्थ का कर्तव्य है।
4. जल और वायु की शुद्धि
नदियों को माँ का दर्जा: गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियों को देवी मानकर उनके जल को प्रदूषित करना पाप माना गया है।
यज्ञ और अग्निहोत्र: वेदों के अनुसार यज्ञ से वायुमंडल शुद्ध होता है और वर्षा का चक्र सही रहता है।
पर्यावरण संरक्षण से हम अपने आप को वन्यजीव संरक्षण पर केंद्रित करते हैं। सनातन धर्म में देवी-देवताओं और उनकी सवारी (वाहन) का संबंध केवल आवागमन का साधन नहीं, बल्कि उनके स्वभाव, गुणों, और दार्शनिक संदेशों का प्रतीक है। वाहन ये बताते हैं कि देवता किस प्रकार की ऊर्जा या प्रकृति का नियंत्रण करते हैं। और यही कारण है कि हम वन्य जीवों से भी प्रेम करते हैं और उनकी सुरक्षा करने का संस्कार भी रखते हैं।
आइए जानते हैं प्रमुख देवी-देवता और उनके वाहन के बारे में :
भगवान शिव और नंदी (बैल): नंदी धर्म, पवित्रता, शक्ति और संयम का प्रतीक है।
शेर अदम्य साहस, ऊर्जा और क्रूरता पर विजय का प्रतीक है।
गणेश जी और मूषक (चूहा): चूहा अत्यधिक चंचलता और विचारों की गति का प्रतीक है, जिस पर बुद्धि नियंत्रण रखती है।
गरुड़ वेग, सतर्कता और भगवान के प्रति निष्ठा व कर्तव्यों का प्रतीक है।
सरस्वती जी और हंस: हंस विवेक और ज्ञान का प्रतीक है, जो दूध और पानी को अलग कर सकता है।
मोर सुंदरता और अहंकार पर नियंत्रण का प्रतीक है।
संबंध के मुख्य कारण
प्रतीकात्मक अर्थ: हर पशु देवता के विशेष गुणों या उस पर नियंत्रण को दर्शाता है।
प्रकृति और जीव संरक्षण: पशुओं को भगवान से जोड़कर समाज को यह संदेश दिया गया कि जीव-जंतुओं का भी सम्मान करें और हिंसा न करें।
मन और प्रवृत्तियों पर विजय: वाहन यह भी सिखाते हैं कि मनुष्य को अपनी पशुवत वृत्तियों (काम, क्रोध, लोभ) पर नियंत्रण पाना चाहिए।
काला हिरण (ब्लैकबक) भी हिंदू पौराणिक कथाओं में वायु देवता का वाहन माना जाता है। इसे संस्कृत में 'कृष्ण मृग' भी कहा जाता है। हिरण की तेजी से दौड़ने की क्षमता के कारण ही इसे हवा की गति के प्रतीक के रूप में वायु देव से जोड़ा गया है।
इसके साथ ही, कुछ विशेष पौराणिक संदर्भों में अन्य देवी-देवताओं के साथ भी हिरण का संबंध जुड़ा हुआ है:
प्रमुख देवता और हिरण का संबंध
वायु देव (पवन देव): वायु देव का मुख्य वाहन हिरण है। हिरण अपनी तीव्र गति और चंचलता के लिए जाना जाता है, जो हवा के वेग और स्वभाव को दर्शाता है।
चन्द्र देव: कई शास्त्रों में चन्द्र देव को भी हिरण पर सवार या हिरण के रथ पर चलते हुए दर्शाया गया है। चंद्रमा पर दिखने वाले दाग को भी 'मृग' (हिरण) का रूप माना जाता है, इसलिए उन्हें 'मृगांक' भी कहते हैं।
देवी दुर्गा: दक्षिण भारतीय परंपराओं और प्राचीन तमिल भजनों (जैसे थेवरा भजन) में देवी दुर्गा के एक रूप को हिरण की सवारी करते हुए (कलैयाथुरथी) वर्णित किया गया है।
शनि देव: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि देव के 9 वाहनों में से एक वाहन हिरण भी है। जब शनि देव हिरण पर सवार होते हैं, तो यह शांति का प्रतीक माना जाता है।
तो कहने का तात्पर्य यह है कि पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा करना सनातन धर्म के लिए कोई नया या आधुनिक विचार नहीं है, बल्कि यह हजारों वर्षों से हमारी जीवनशैली का हिस्सा रहा है। हमारे प्राचीन ग्रंथों और लोक-परंपराओं में प्रकृति के प्रति आदर, धन्यवाद और उसके साथ मिलकर शांति से रहने के संदेश साफ दिखाई देते हैं।
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