नागरी लिपि परिषद का इतिहास एवं उसकी उपादेयता
एक ऐसे विषय पर आपके समक्ष अपने विचार रखने का अवसर मिला है, जो हमारी भाषाई अस्मिता, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक गौरव से सीधा जुड़ा हुआ है।
संसार में भाषाएँ तो अनेक हैं, लेकिन उन भाषाओं को जीवंत रखने वाली लिपि ही उनकी असली रीढ़ होती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में, जहाँ कदम-कदम पर बोलियाँ और भाषाएँ बदलती हैं, वहाँ राष्ट्रीय एकता को सुदृढ़ करने के लिए एक सर्वमान्य लिपि की आवश्यकता हमेशा से महसूस की गई है। इसी स्वप्न को साकार करने का नाम है—नागरी लिपि परिषद्।
परिषद् का गौरवशाली इतिहास
साथियों, जब हम इतिहास के झरोखे से देखते हैं, तो पाते हैं कि देवनागरी या नागरी लिपि केवल हिंदी की नहीं, बल्कि भारत की एक सार्वदेशिक लिपि रही है, जिसका इतिहास सदियों पुराना है। परंतु आधुनिक युग में इसे एक सुसंगठित आंदोलन का रूप देने में महापुरुषों का बड़ा योगदान रहा।
शारदा चरण मित्र (लिपि विस्तार परिषद्): वर्ष 1905-1907 के आसपास कलकत्ता के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शारदा चरण मित्र ने पूरे भारत को एक लिपि के सूत्र में बाँधने के उद्देश्य से एक 'लिपि विस्तार परिषद्' की स्थापना की थी। इसे भी आधुनिक नागरी आंदोलन के शुरुआती वैचारिक बीजारोपण के रूप में देखा जाता है।
महात्मा गांधी और काका कालेलकर: विनोबा भावे से पहले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और उनके अनन्य सहयोगी काका कालेलकर ने भी विभिन्न मंचों (जैसे 1935 का हिंदी साहित्य सम्मेलन) के माध्यम से देश में एक सर्वमान्य लिपि और नागरी लिपि के सुधारों पर गहरा काम किया था, जिसने इस आंदोलन की ज़मीन तैयार की।
पर नागरी लिपि परिषद्, नई दिल्ली की विधिवत स्थापना वर्ष 17 अगस्त 1975 में परम पूज्य राष्ट्रसंत आचार्य विनोबा भावे के सत्प्रयासों और प्रेरणा से हुई थी। विनोबा जी का दृढ़ विश्वास था कि "यदि भारत की सभी भाषाएँ एक लिपि—यानी नागरी लिपि—में लिखी जाने लगें, तो देश की राष्ट्रीय एकता कई गुना अधिक मजबूत हो जाएगी"। महात्मा गांधी और काका कालेलकर जैसे मनीषियों के भाषाई चिंतन को आगे बढ़ाते हुए इस परिषद् को नई दिल्ली के गांधी स्मारक निधि (राजघाट) परिसर में स्थापित किया गया, जहाँ से यह आज भी निरंतर कार्य कर रही है।
नागरी लिपि का नामकरण
नागरी लिपि (जिसे देवनागरी भी कहते हैं) का नाम 'नगर' शब्द से बना है। यह लिपि सबसे पहले बड़े शहरों या नगरों में, तथा विद्वानों और नागरिकों द्वारा इस्तेमाल की जाती थी। इसलिए इसे नागरी लिपि कहा गया। बाद में जब इसमें धार्मिक और संस्कृत ग्रंथ लिखे जाने लगे, तब इसे 'देवनागरी' भी कहा जाने लगा।
नागरी नाम पड़ने के मुख्य कारण:
नगरों का प्रचलन: 'नगर' में रहने वाले सुशिक्षित और सुसंस्कृत लोग इस लिपि का उपयोग करते थे। नगर से जुड़ा होने के कारण इसे नागरी कहा गया।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, गुजरात के 'नागर' ब्राह्मणों ने इस लिपि का सबसे पहले प्रयोग किया था। इसलिए इसे नागरी लिपि नाम मिला।
देवनागरी नाम: जब इस लिपि में पवित्र ग्रंथ और संस्कृत के श्लोक लिखे जाने लगे, तब इसमें 'देव' शब्द जोड़कर इसे देवनागरी कहा गया
एक अन्य मत के अनुसार बाकी नगर सिर्फ नगर है परंतु काशी देवनगरी है, इसलिए काशी में प्रयुक्त लिपि का नाम देवनागरी पड़ा।
चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का व्यक्तिगत नाम देव था l इसलिए गुप्तों की राजधानी पटना को देवनगर भी कहा जाता होगा देव नगर की लिपि होने से उत्तर भारत की प्रमुख लिपि को बाद में देवनागरी नाम दिया गया होगा l
नागरी लिपि और परिषद् की उपादेयता
अब प्रश्न उठता है कि इस परिषद् और नागरी लिपि की आज के समय में उपादेयता (Utility) क्या है ?
वैज्ञानिकता और शुद्धता:
देवनागरी दुनिया की सबसे वैज्ञानिक लिपियों में से एक है। इसमें जैसा बोला जाता है, ठीक वैसा ही लिखा जाता है। इसमें अक्षरों और ध्वनियों का सटीक समन्वय है।
राष्ट्रीय एकता का सूत्र:
परिषद् का मुख्य उद्देश्य भारतीय भाषाओं को एक सूत्र में बांधना है। यदि तमिल, तेलुगु, बांग्ला, कन्नड़ या मराठी जैसी समृद्ध भाषाओं का साहित्य देवनागरी लिपि में भी उपलब्ध करा दिया जाए (भले ही भाषा मूल रहे), तो उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम का हर भारतीय एक-दूसरे के साहित्य को आसानी से पढ़ और समझ सकेगा।
लिपिहीन बोलियों को संरक्षण:
भारत में पूर्वोत्तर (North-East) और जनजातीय क्षेत्रों में ऐसी कई लोकबोलियाँ हैं, जिनकी अपनी कोई लिपि नहीं है। नागरी लिपि परिषद् ऐसी बोलियों को नागरी लिपि अपनाने के लिए प्रेरित करती है ताकि उनका लोक-साहित्य और समृद्ध संस्कृति हमेशा के लिए सुरक्षित हो सके।
तकनीकी अनुकूलता:
आज कंप्यूटर, इंटरनेट और यूनिकोड के युग में देवनागरी लिपि पूरी तरह से वैश्विक पटल पर छाने के लिए तैयार है, जो इसकी प्रासंगिकता को और बढ़ा देता है।
प्रचार-प्रसार के लिए किए गए भगीरथ प्रयास
परिषद् ने अपने स्थापना काल से ही नागरी के प्रचार-प्रसार के लिए कई ऐतिहासिक कार्य किए हैं :
'नागरी संगम' पत्रिका का प्रकाशन: परिषद् द्वारा 'नागरी संगम' नामक एक उच्च स्तरीय त्रैमासिक पत्रिका का नियमित संपादन किया जाता है, जो देश-विदेश के विद्वानों के विचारों को जनता तक पहुँचाती है।
शैक्षणिक संस्थानों में अलख जगाना: परिषद् ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज, श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज, डॉ. भीमराव अम्बेडकर कॉलेज, शिवाजी कॉलेज, पीजीडीएवी कॉलेज,और अभी हम आपके प्रतिष्ठित सत्यवती कॉलेज में हैं - ऐसे ही प्रतिष्ठित संस्थानों से लेकर देश के सुदूर राज्यों (जैसे केरल के तिरुवनंतपुरम, पुदुचेरी, त्रिपुरा, शिलांग, विजयनगरम (पोर्ट ब्लेयर) और अरुणाचल प्रदेश के ईटानगर) तक जाकर कार्यशालाएँ और संगोष्ठियाँ आयोजित की हैं ताकि युवा पीढ़ी इससे जुड़ सके। हमने मध्य प्रदेश के अमरकंटक और पंजाब के भटिंडा में भी आयोजन किया है। दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में भी किया है। यही नहीं नेपाल जाकर भी संगोष्ठियां आयोजित की हैं।
पुस्तकों का प्रकाशन: परिषद् ने भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं को भी नागरी के माध्यम से आसानी से सीखने के लिए कई बहुभाषी कोश और पुस्तकें प्रकाशित की हैं। नागरी लिपि परिषद् की तरफ से आपके कॉलेज में जो प्रदर्शनी लगाई गई है उसमें आप इन पुस्तकों को देख सकते हैं।
निबंध और पत्र लेखन प्रतियोगिता और पुरस्कार
नागरी लिपि के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु विनोबा भावे जी के नाम पर तो पुरस्कार दिया ही जाता है, साथ ही कई अन्य गणमान्य व्यक्तियों की स्मृति में भी पुरस्कार प्रदान किया जाता है।
नागरी लिपि परिषद् से जुड़ने के लिए और नागरी लिपि के प्रचार-प्रसार में सहभागिता के लिए नागरी लिपि परिषद् मात्र 2000 की सहयोग राशि प्राप्त कर आजीवन सदस्यता प्रदान करता है। हमारे प्रिय छात्र-छात्राएं तो निशुल्क जुड़ सकते हैं ।
अंत में, मैं यही कहना चाहूँगा कि लिपि केवल अक्षरों का समूह नहीं होती, वह किसी भी राष्ट्र की संस्कृति का चेहरा होती है। आचार्य विनोबा भावे का वह सपना आज भी अधूरा है कि "भारत के लिए एक लिपि हो और वह नागरी हो"। नागरी लिपि परिषद् इस सपने को पूरा करने के लिए पूरी निष्ठा से काम कर रही है।
आइए, हम सब भी इस महायज्ञ में अपनी आहुति दें और अपनी वैज्ञानिक लिपि पर गर्व करें।
"एक हृदय हो भारत जननी,
एक लिपि हो देवनागरी।"
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