ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा विचार गोष्ठी
एवं काव्य गोष्ठी का आयोजन
ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया (Authors Guild of India) एवं पी जी डी ए वी महाविद्यालय (PGDAV College), नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में "विचार गोष्ठी ('सोशल मीडिया : कितना सोशल') एवं काव्य गोष्ठी" का आयोजन दयानंद सभागार में किया गया। इस अवसर पर पी जी डी ए वी महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डॉ. मुकेश अग्रवाल मुख्य अतिथि थे।
कार्यक्रम का शुभारंभ करते हुए ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के महासचिव डॉ. शिवशंकर अवस्थी ने सर्वप्रथम सोशल मीडिया के वैश्विक इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा - “आज सिर्फ युवा ही नहीं बल्कि हर उम्र का व्यक्ति सोशल मीडिया के विभिन्न तंत्रों से जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया सदैव परिवर्तनशील रहा है और भविष्य में भी बदलाव होता रहेगा।"
दिलीप चौबे जी ने अपने संबोधन में कहा - “आज हमारे समाज में सोशल मीडिया इस कदर हावी है कि कोई भी अछूता नहीं है। इसके सही और गलत दोनों पक्ष हैं।"
डॉ.विमलेश कांति वर्मा ने कहा - “सोशल मीडिया पर असंवैधानिक सूचनाओं की भ्रामकता गुमराह करने वाली देखने को मिलती हैं। इस पर रोक लगनी चाहिए।”
डॉ. राकेश पाण्डेय ने कहा - “हर नयी उत्पत्ति के गुण दोष होते हैं। इसका मूल्यांकन समय-समय पर होते रहना चाहिए। प्रिंट मीडिया में जवाबदेही होती है लेकिन सोशल मीडिया की कोई जवाबदेही तय नहीं है।"
श्री गोस्वामी जी ने कहा - “सोशल मीडिया नया नहीं है बल्कि बहुत पुराना है क्योंकि पहले सोशल मीडिया का माध्यम महिलाएं हुआ करतीं थीं। सोशल मीडिया का मतलब है चटपटी बातें। सोशल मीडिया के कोई मापदंड नहीं हैं। धार्मिक ग्रंथों का मूल्यांकन भी गलत हो रहा है।” उन्होंने कालिदास का उदाहरण देते हुए कहा - जो पुराना है वह हमेशा सच हो यह जरूरी नहीं है।"
नेशनल बुक ट्रस्ट से पधारे श्री राकेश यादव ने कहा - “सोशल मीडिया बाल्यावस्था में है। अभी किशोरावस्था को भी प्राप्त नहीं हुआ है। भविष्य में ऐसी तकनीक आने वाली है उसकी खबरें छन कर आने लगी हैं। उन्हें पढ़कर-सुनकर लगता है कि तब शायद सोशल मीडिया किशोरावस्था में प्रवेश करेगा।”
डॉ. अजय ओझा ने अपनी बात रखते हुए कहा - “विचार व्यक्त करने की आजादी हर व्यक्ति को घर बैठे मिल गई है। इसके माध्यम से हमें बहुत पुराने संबंधों की जानकारी मिल जाती है, अनायास बहुत पुराने दोस्तों, संबंधियों, हितैषियों से संपर्क स्थापित हो जाता है जिन्हें शायद हम भूल चुके हैं - अब सोशल मीडिया के विभिन्न तंत्रों से हम एक दूसरे को जोड़ते और एक दूसरे से जुड़ते चले जा रहे हैं। "
आचार्य अनमोल ने अपने वक्तव्य में कहा - "हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे अनुज सोशल मीडिया के दायित्व को समझें। सोशल मीडिया पर तर्क को कुतर्क के रूप में पूरे दावे के साथ पेश किया जा रहा है। सोशल मीडिया एक तलब के रूप में विकसित हो गया है।"
श्री किशोर कुमार मालवीय जी ने कहा - “सोशल मीडिया एक अप्रत्यक्ष द्वंद्व है क्योंकि यह अच्छे और बुरे दोनों तरह के पक्षों से भरा हुआ है। काटो या चाटो की रणनीति पर राजनीतिक यूट्यूब चैनल चल रहे हैं। डीपफेक वीडियो से बचना चाहिए।”
डॉ. हरिसिंह पाल ने कहा - “पहले जब कोई कविता या लेख छपता था तो उसमें अपना नाम दूसरे लोगों को दिखाकर खुश हुआ करते थे। लेकिन आश्चर्य का विषय है कि सोशल मीडिया का न तो कोई संपादक है। न कोई संचालक । सब कुछ आम आदमी के हाथों में पहुंच गया है। वे खुद संपादक हैं और संचालक हैं। हमने अपने बाप-दादाओं से सीखा है लेकिन आज की पीढ़ी हमसे नहीं बल्कि सोशल मीडिया से सीख रही है।"
डॉ. रेखा चौहान ने अपने उद्बोधन में कहा - "सिक्के के दो पहलू की तरह है सोशल मीडिया। अच्छी बातें अपनाएं और बुरी आदतों को तिलांजलि दें तभी सोशल मीडिया सार्थक होगा।"
श्री पंकज जी ने अपने अनुभव के आधार पर कहा - "हमने दो सदियों को देखा है। पहले के दौर में प्रिंट मीडिया सशक्त रहा है। प्रिंट मीडिया इतना प्रभावशाली रहा है कि सरकारों का पतन तक हो जाता था लेकिन अब सोशल मीडिया सरकार तो क्या एक पार्षद तक को नहीं हिला सकता। सोशल मीडिया पर दिख रहीं सूचनाओं की सत्यता प्रमाणित करने का कोई माध्यम नहीं है।”
श्री शेखर जी ने अपनी बात रखते हुए कहा - “हम इंसान हैं तो हम सोशल होंगे ही। हमारे देश में सोशल मीडिया यानी सामाजिक संचार का इतिहास सदियों पुराना है। अब इसका रूप बदल गया है। पहले भी गांव के व्यक्तियों से सोशल मीडिया संचालित होता था और आज भी गांव-शहर के हर घर से संचालित हो रहा है सोशल मीडिया।”
मुख्य अतिथि डॉ. मुकेश अग्रवाल जी ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा - "प्रबुद्ध वक्ताओं ने सोशल मीडिया पर जिस तरह से प्रकाश डाला वो सराहनीय था। सोशल मीडिया को लेकर जागरूकता स्पष्ट दिखाई दे रही है। इसके सभी पहलुओं को लेकर प्रबुद्ध वर्ग सतर्क है। यह एक अच्छा संकेत है। 'सोशल मीडिया : कितना सोशल', यह एक ऐसा मुद्दा है कि इसे भारतीय परिवेश में ढालने की जरूरत है। विज्ञापनों का एक बड़ा माध्यम बन गया है सोशल मीडिया लेकिन इसमें कौन-सा विज्ञापन सही है कौन-सा गलत है ये तय कर पाना संभव नहीं है। एक और दुविधा एकल परिवार में घर कर रही है कि वो अपने छोटे बच्चों को मोबाइल से कैसे बचाएं ? इस वजह से छोटी उम्र के बच्चे सोशल मीडिया के आदी हो चुके हैं।"
दूसरे सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। काव्य गोष्ठी के पहले वरिष्ठ मीडियाकर्मी, एडवोकेट और रचनाकार डॉ. अजय कुमार ओझा की तीन भाषा में तीन पुस्तकों का लोकार्पण किया गया । ये पुस्तकें हैं : हिंदी में " धोबिया जल बीच मरत पियासा", अंग्रेजी में "INDIA IN KOREA" और भोजपुरी में "संक्षिप्त वाल्मीकीयरामायण कथासार" ।
काव्य गोष्ठी का संचालन श्री शेखर जी ने किया। आचार्य अनमोल ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत कर काव्य गोष्ठी का शुभारंभ किया। कवियों ने सभी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
डॉ. हरीष अरोड़ा ने कविता के माध्यम से भाषा संवाद पर केंद्रित अपनी कविता सुनाई - " शब्दों से बाहर भी एक भाषा होती है…। 'बक्से में बंद एक लोटा' शीर्षक से भी एक कविता सुनाई।"
डॉ. अजय कुमार ओझा ने भी एक कविता का पाठ किया - “हम तो भाई विषपायी हैं…।”
डॉ. पन्ना लाल ने सुनाया - “आजादी का पर्व मना रहे सब है चंगा…”
डॉ. रेखा चौहान अपनी कविता के माध्यम से सोशल मीडिया पर कटाक्ष करते हुए सुनाया - " समय बदल रहा है चेहरे बदल रहे हैं जेब से मोबाइल निकल रहे हैं…”
श्री एस. के. भटनागर ने अपनी शब्दांजलि इस प्रकार पेश की - "सूरत दिल से उतरती नहीं, फिर क्यूं"
डॉ शिवशंकर अवस्थी ने अपनी कविता के माध्यम से बताया - “मेरी तमन्नाओं का शहर…सबका होता अपना मकान…" ।
द्राक्षा ने अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा - "दिलों के धागे टूट चुके हैं…। "
आचार्य अनमोल ने सुनाया - “भाव कपट के…उठो आज दिखला दो अपने अंदर के शोले…"
श्री शेखर जी ने अपनी गजल "हम नदी के रास्ते में बनाते हैं घर…” सुनाई।
अध्यक्षीय कविता पाठ करते हुए मुख्य अतिथि ने 'एक अनाथ बच्चा' शीर्षक से कविता पाठ किया - " मैंने सपने में मां को देखा…मां जैसी ही लगती थी।”
समापन समारोह में सभी आमंत्रित वक्ताओं और श्रोताओं को महासचिव डॉ. शिवशंकर अवस्थी ने धन्यवाद दिया। कार्यक्रम का विधिवत समापन राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम्' एवं राष्ट्र गान 'जन-गण-मन' से हुआ।
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