पुस्तक समीक्षा :
डॉ. अजय कुमार ओझा की पुस्तक "Wonderful Tharu Tribe, Alluring Tharuhat and Charming Champaran"
By Dr. Ajay Kumar Ojha
Published by Rachna Publications, Delhi
एक उपेक्षित जनजातीय संसार, उसकी भूमि और उसकी स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज
डॉ. अजय कुमार ओझा की पुस्तक Wonderful Tharu Tribe, Alluring Tharuhat and Charming Champaran केवल थारू जनजाति पर लिखी गई एक सामान्य पुस्तक नहीं है। यह पुस्तक तीन परस्पर जुड़े हुए आयामों — थारू समुदाय, थरूहट की भूमि और ऐतिहासिक चम्पारण—को एक साथ देखने का प्रयास करती है। लेखक स्वयं स्पष्ट करते हैं कि पुस्तक का उद्देश्य केवल थारू समुदाय का परिचय देना नहीं, बल्कि उस भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश को भी सामने लाना है जिसमें यह समुदाय पीढ़ियों से विकसित हुआ है। पुस्तक में कुल 37 आलेख संकलित हैं, जिनमें अधिकांश अपेक्षाकृत छोटे होने के बावजूद विषयगत दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
लेखक और विषय का आत्मीय संबंध
इस पुस्तक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि लेखक ने थारू समाज को दूर बैठकर केवल पुस्तकीय सामग्री के आधार पर समझने का प्रयास नहीं किया। डॉ. ओझा के अनुसार, विद्यार्थी जीवन में थारू समुदाय के एक मित्र धर्मराज खटैत से उनका संपर्क हुआ और वहीं से इस समुदाय के प्रति उनकी जिज्ञासा तथा आत्मीयता का बीजारोपण हुआ। बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र की उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने पश्चिम चम्पारण के थारुओं को अपने शोध का विषय बनाया।
विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि उनका शोध participant observation अर्थात् सहभागी अवलोकन की पद्धति पर आधारित था। उन्होंने थारू बस्तियों में रहकर उनके दैनिक जीवन, सामाजिक व्यवहार, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक संसार को निकट से समझने का प्रयास किया। लेखक के अनुसार, उन्होंने 1980 के दशक में पश्चिम चम्पारण के बखरी बाजार क्षेत्र में थारू समुदाय के बीच महीनों तक रहकर क्षेत्रीय अध्ययन किया। उनका पीएचडी शोध 2010 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पूर्ण हुआ।
यही दीर्घकालिक क्षेत्र-अनुभव इस पुस्तक को केवल सूचना-संग्रह न रहकर अनुभव-संपन्न सामाजिक दस्तावेज बना देता है।
थारू जनजाति का सामाजिक संसार
पुस्तक का केंद्रीय आकर्षण थारू समुदाय है। लेखक थारुओं को किसी संग्रहालय में रखी हुई स्थिर सांस्कृतिक वस्तु के रूप में नहीं देखते, बल्कि एक ऐसे जीवंत समुदाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसकी अपनी सामाजिक संरचना, परंपराएँ, जीवन-पद्धति, स्मृतियाँ और बदलते समय के साथ संघर्ष हैं।
इस दृष्टि से पुस्तक का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि जनजातीय समाजों पर चर्चा प्रायः दो अतियों में चली जाती है—या तो उन्हें अत्यधिक रोमानी दृष्टि से देखा जाता है अथवा केवल आर्थिक पिछड़ेपन के आँकड़ों तक सीमित कर दिया जाता है। डॉ. ओझा का दृष्टिकोण इन दोनों से आगे जाकर समुदाय के मानवीय और सामाजिक अनुभव को समझने की कोशिश करता है।
थरूहट : केवल भूगोल नहीं, एक सांस्कृतिक संसार
पुस्तक का दूसरा महत्वपूर्ण शब्द है — ‘थरूहट’। यह केवल किसी भौगोलिक क्षेत्र का नाम नहीं, बल्कि थारू समुदाय की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्मृतियों से जुड़ा हुआ संसार है।
थरूहट को समझने के लिए जंगल, खेत, नदियाँ, गाँव, सीमावर्ती जीवन, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों को एक साथ देखना आवश्यक है। लेखक का अनुभव इस व्यापक संदर्भ को समझने में सहायता करता है।
पुस्तक इस बात की ओर भी संकेत करती है कि किसी समुदाय को समझने के लिए उसके निवास-क्षेत्र को समझना अनिवार्य है। समुदाय और उसका भूगोल एक-दूसरे से अलग नहीं होते। थारू समाज की जीवन-शैली, उसकी सांस्कृतिक स्मृति और उसके सामाजिक संबंधों को थरूहट की प्रकृति और इतिहास से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
चम्पारण का व्यापक संदर्भ
पुस्तक का तीसरा आयाम चम्पारण है। लेखक थरूहट को व्यापक चम्पारण के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़ते हैं। इस प्रकार पुस्तक का कैनवास केवल एक जनजातीय समुदाय तक सीमित नहीं रहता।
चम्पारण भारतीय इतिहास में महात्मा गांधी के सत्याग्रह के कारण विशेष स्थान रखता है, लेकिन चम्पारण की पहचान केवल गांधी और नील आंदोलन तक सीमित नहीं है। यहाँ की लोक-संस्कृति, सीमावर्ती समाज, वन-क्षेत्र, कृषि-जीवन और विभिन्न समुदायों की सामाजिक संरचनाएँ भी इसके इतिहास का हिस्सा हैं।
इस दृष्टि से पुस्तक चम्पारण को बहुस्तरीय सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र के रूप में देखने की प्रेरणा देती है।
शोध और संस्मरण का संगम
पुस्तक की शैली की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि इसमें अकादमिक शोध और व्यक्तिगत अनुभव दोनों का मेल दिखाई देता है। लेखक स्वयं अपने दीर्घकालिक जुड़ाव को पुस्तक की पृष्ठभूमि में रखते हैं। इस कारण पाठक को केवल ‘थारू कौन हैं?’ का उत्तर नहीं मिलता, बल्कि यह भी समझ में आता है कि लेखक स्वयं इस समाज तक कैसे पहुँचे और उनकी दृष्टि समय के साथ कैसे विकसित हुई।
लेखक ने अपने पुराने लेखों और बाद के लेखन को संकलित करके पुस्तक का रूप दिया है। उनके अनुसार, पुस्तक के अधिकांश आलेख उनके ब्लॉग पर विभिन्न समयों में प्रकाशित सामग्री से संकलित किए गए हैं।
इससे पुस्तक में एक प्रकार की कालानुक्रमिक सामाजिक स्मृति भी निर्मित होती है।
सामाजिक परिवर्तन का दस्तावेज
थारू समाज स्थिर नहीं है। शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, बाजार, सड़क, संचार, आधुनिक संस्थाओं और व्यापक सामाजिक परिवर्तन ने उसके जीवन को प्रभावित किया है। पुस्तक की उपयोगिता इसी परिवर्तनशीलता को समझने में भी है।
डॉ. ओझा के व्यापक शोध-कार्य को देखते हुए यह पुस्तक उनके दीर्घकालिक थारू-अध्ययन की एक लोकप्रिय और पठनीय अभिव्यक्ति के रूप में देखी जा सकती है। उपलब्ध लेखक-सामग्री के अनुसार, उनका थारू समुदाय से संबंध कई दशकों से चला आ रहा है और उन्होंने इस विषय पर अन्य पुस्तकें तथा लेख भी प्रकाशित किए हैं।
पुस्तक का मानवीय पक्ष
इस पुस्तक की सबसे बड़ी शक्ति इसके विषय का मानवीय पक्ष है। थारू समुदाय को केवल ‘जनजाति’ कहकर उसका परिचय समाप्त नहीं किया जा सकता। प्रत्येक समुदाय की तरह उसके भीतर भी व्यक्ति हैं, परिवार हैं, आकांक्षाएँ हैं, संघर्ष हैं, स्मृतियाँ हैं और भविष्य की आशाएँ हैं।
डॉ. ओझा का लेखन पाठक को इसी मानवीय संसार के करीब ले जाने का प्रयास करता है। इसलिए पुस्तक समाजशास्त्र, मानवशास्त्र या इतिहास के विद्यार्थी के लिए जितनी उपयोगी हो सकती है, सामान्य पाठक के लिए भी उतनी ही रुचिकर बन सकती है।
शोधार्थियों के लिए उपयोगिता
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका field-based orientation है। जनजातीय अध्ययन में क्षेत्र-अनुभव का विशेष महत्व होता है। थारू समाज के संदर्भ में लंबे समय तक किया गया सहभागी अवलोकन शोधार्थियों के लिए विशेष रुचि का विषय हो सकता है।
समाजशास्त्र, मानवशास्त्र, इतिहास, लोक-संस्कृति, जनजातीय अध्ययन, ग्रामीण विकास और सीमावर्ती समाजों का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों एवं शोधकर्ताओं के लिए यह पुस्तक एक उपयोगी आरंभिक स्रोत के रूप में देखी जा सकती है।
साथ ही, पुस्तक से आगे के गंभीर शोध के लिए अनेक प्रश्न भी निकलते हैं—थारू समाज में सामाजिक परिवर्तन की गति क्या है? आधुनिक शिक्षा ने पारंपरिक संरचनाओं को किस प्रकार प्रभावित किया है? भूमि और संसाधनों के प्रश्नों ने समुदाय के जीवन को कैसे बदला? सीमावर्ती भूगोल ने सामाजिक संबंधों को किस प्रकार आकार दिया? ऐसे प्रश्न पुस्तक के अध्ययन को और व्यापक बना सकते हैं।
पुस्तक की भाषा और प्रस्तुति
पुस्तक का शीर्षक ही उसके दृष्टिकोण को स्पष्ट करता है — Wonderful, Alluring और Charming जैसे शब्दों के माध्यम से लेखक थारू समाज, थरूहट और चम्पारण के प्रति अपने आत्मीय आकर्षण को व्यक्त करते हैं।
हालाँकि पुस्तक का आधार शोध-अनुभव है, इसकी प्रस्तुति पूर्णतः दुरूह अकादमिक भाषा में नहीं है। आलेखात्मक संरचना पाठक को विषय के अलग-अलग पक्षों से क्रमशः परिचित कराती है। यही कारण है कि पुस्तक शोधार्थियों के साथ-साथ सामान्य पाठकों के लिए भी सुलभ बनती है।
आलोचनात्मक दृष्टि
किसी भी पुस्तक की समीक्षा केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं होनी चाहिए। इस पुस्तक के संदर्भ में एक अकादमिक पाठक यह अपेक्षा कर सकता है कि 37 आलेखों को विषयवार व्यवस्थित करने, संदर्भ-सूची को विस्तृत करने, सांख्यिकीय सामग्री को अद्यतन करने तथा कुछ प्रमुख निष्कर्षों को व्यवस्थित अकादमिक अध्यायों में प्रस्तुत करने से पुस्तक का शोध-मूल्य और बढ़ सकता है।
इसी प्रकार, थारू समाज के भीतर विविधता, विभिन्न पीढ़ियों के अनुभव और समकालीन सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन पर तुलनात्मक सामग्री भविष्य के संस्करणों को और समृद्ध कर सकती है।
लेकिन इन संभावित विस्तारों को पुस्तक की मूल उपलब्धि से अलग देखना चाहिए। इसका प्रमुख उद्देश्य एक विस्तृत समाजशास्त्रीय मोनोग्राफ प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि लेखक के लंबे अनुभव और लेखन के माध्यम से थारू समुदाय, थरूहट और चम्पारण को पाठकों के सामने लाना है। इस उद्देश्य में पुस्तक सार्थक हस्तक्षेप करती है।
निष्कर्ष
Wonderful Tharu Tribe, Alluring Tharuhat and Charming Champaran को थारू समाज, थरूहट और पश्चिम चम्पारण के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन का अनुभव-आधारित परिचयात्मक दस्तावेज कहा जा सकता है।
इस पुस्तक का वास्तविक महत्व इस बात में है कि लेखक ने एक ऐसे समुदाय को केंद्र में रखा है जिसे मुख्यधारा के पाठकीय और बौद्धिक विमर्श में अपेक्षाकृत कम स्थान मिला है। दशकों तक चले लेखक के क्षेत्रीय जुड़ाव ने पुस्तक को केवल सूचनात्मक नहीं रहने दिया; उसमें अनुभव, स्मृति, आत्मीयता और सामाजिक अवलोकन का सम्मिश्रण दिखाई देता है। पुस्तक के लेखक स्वयं बताते हैं कि उनका थारू समुदाय से संबंध उनके छात्र जीवन से शुरू हुआ और बाद में यह संबंध उनके शोध तथा निरंतर लेखन में विकसित हुआ।
रचना पब्लिकेशन्स, दिल्ली से प्रकाशित यह पुस्तक उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है जो भारत की जनजातीय विविधता, थारू संस्कृति, पश्चिम चम्पारण, सीमावर्ती समाज और क्षेत्रीय इतिहास को एक साथ समझना चाहते हैं।
अंततः कहा जा सकता है कि यह पुस्तक थारू समाज को केवल ‘अध्ययन की वस्तु’ के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत मानवीय समुदाय और उसकी अपनी भूमि, संस्कृति तथा स्मृतियों के साथ देखने का अवसर प्रदान करती है। यही इसकी सबसे उल्लेखनीय विशेषता है।
No comments:
Post a Comment