Sunday, September 13, 2026

पुस्तक समीक्षा :डॉ. अजय कुमार ओझा की पुस्तक "बोल उठा खेत उस दिन" - तुम जहाँ भी चले जाओ, तुम्हारी जड़ें यहीं हैं

 




पुस्तक समीक्षा :

बोल उठा खेत उस दिन

(जन्मभूमि से संबंधित आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के लालित्यपूर्ण ललित निबंधों का संग्रह)

संयोजन, संकलन एवं सम्पादन : डॉ. अजय कुमार ओझा

प्रकाशक : लोकमित्र, दिल्ली 

यह पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है। 

जन्मभूमि की मिट्टी, स्मृतियों की सुगंध और गाँव के जीवन का ललित आख्यान

मनुष्य अपने जीवन में चाहे कितनी ही दूर चला जाए, उसकी स्मृतियों में एक स्थान ऐसा अवश्य होता है जहाँ लौटकर उसका मन बार-बार जाना चाहता है। वह स्थान है—उसकी जन्मभूमि। जन्मभूमि केवल वह भूखंड नहीं जहाँ मनुष्य ने जन्म लिया; वह उसके बचपन की धूप, खेतों की हरियाली, घर-आँगन की आवाजें, माता-पिता का स्नेह, गाँव के लोगों का अपनापन, मंदिर की घंटियाँ, पशुओं की रंभाहट और ऋतुओं के बदलते रंगों से निर्मित एक संपूर्ण भावलोक है।

“बोल उठा खेत उस दिन…” इसी भावलोक की साहित्यिक अभिव्यक्ति है। यह पुस्तक आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के जन्मभूमि से संबंधित ललित निबंधों का संग्रह है, जिसका संयोजन, संकलन एवं सम्पादन डॉ. अजय कुमार ओझा ने किया है। पुस्तक के तेईस निबंधों में एक व्यक्ति की निजी स्मृतियाँ धीरे-धीरे एक गाँव, एक परिवार, एक पीढ़ी और एक बदलती हुई ग्रामीण संस्कृति की सामूहिक स्मृति में रूपांतरित होती दिखाई देती हैं।

शीर्षक में छिपा पूरा भाव-संसार

पुस्तक का शीर्षक—“बोल उठा खेत उस दिन…”—अपने आप में अत्यंत अर्थगर्भित है। खेत सामान्यतः बोलते नहीं; वे अन्न देते हैं, ऋतुओं के साथ अपना रूप बदलते हैं और किसान के श्रम को अपने भीतर संजोते हैं। लेकिन जब लेखक अपनी स्मृतियों के माध्यम से खेतों की ओर लौटता है तो वही खेत बोलने लगते हैं।

यहाँ “खेत” केवल कृषि-भूमि का प्रतीक नहीं है। वह जन्मभूमि, श्रम, स्मृति, संस्कार और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। शीर्षक इसलिए पुस्तक के सभी निबंधों को एक भावात्मक सूत्र में बाँध देता है।

सिंहनपुरा : स्मृति का केंद्र

“(बड़का) सिंहनपुरा (Badaka Singhanpura)—मेरा गाँव” पुस्तक के मूल भाव को समझने की कुंजी है। लेखक के लिए सिंहनपुरा मात्र भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि जीवन की आरंभिक पाठशाला है। गाँव के माध्यम से लेखक अपने अतीत, अपने लोगों और अपने संस्कारों को पुनः देखता है।

यहाँ गाँव किसी रोमानी कल्पना का कृत्रिम चित्र नहीं बनता, बल्कि स्मृतियों में सुरक्षित एक जीवंत संसार के रूप में सामने आता है। यही कारण है कि पाठक सिंहनपुरा को केवल लेखक का गाँव न मानकर भारतीय ग्रामीण जीवन के एक प्रतिनिधि रूप के रूप में देख सकता है।

यात्रा और घर की ओर लौटना

“बेतिया से पटना और घर” शीर्षक अपने भीतर यात्रा और घर—दोनों को समेटे हुए है। यात्रा भौगोलिक दूरी को कम करती है, लेकिन स्मृति मनुष्य को भावनात्मक रूप से उसके घर तक पहले ही पहुँचा देती है।

इस निबंध को पुस्तक के व्यापक संदर्भ में देखें तो “घर” केवल मकान नहीं है। घर वहाँ है जहाँ परिवार है, जहाँ बचपन की स्मृतियाँ हैं और जहाँ लौटने पर व्यक्ति अपने मूल स्वरूप को पहचान पाता है।

काली मंदिर : आस्था और लोकजीवन

“मेरे गाँव बड़का सिंहनपुरा का काली मंदिर” पुस्तक के सांस्कृतिक पक्ष को विशेष गहराई देता है। भारतीय गाँवों में मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं रहे हैं। वे लोकजीवन, सामाजिक संपर्क, सामुदायिक स्मृति और सांस्कृतिक परंपरा के केंद्र भी रहे हैं।

काली मंदिर की स्मृति के माध्यम से लेखक अपने गाँव की धार्मिक चेतना और लोकविश्वासों को सामने लाते हैं। इस प्रकार यह निबंध व्यक्तिगत श्रद्धा के साथ-साथ ग्रामीण संस्कृति का भी दस्तावेज बन जाता है।

खेती : जीवन का आधार

“खेती के अनुभव” और “ट्रैक्टर—यात्रा” जैसे निबंध ग्रामीण जीवन के आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन को समझने में सहायता करते हैं।

भारतीय गाँवों में खेती केवल रोजगार नहीं रही; उसने सामाजिक संबंधों, उत्सवों, ऋतुचक्र और पारिवारिक जीवन को भी प्रभावित किया है। ट्रैक्टर का प्रवेश इस संसार में आधुनिकता के आगमन का संकेत है। पुराने कृषि-उपकरणों और पशु-आधारित खेती से मशीन आधारित कृषि की ओर संक्रमण केवल तकनीकी परिवर्तन नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन-शैली में आए बड़े बदलाव का संकेत है।

बैल—बिदाई : एक युग का अवसान

संग्रह का अंतिम निबंध “बैल—बिदाई” विशेष रूप से मार्मिक प्रतीत होता है। पुस्तक की शुरुआत जिस खेत से होती है, उसकी यात्रा अंततः उस बैल की विदाई तक पहुँचती है जिसने कभी उसी खेत को जीवंत बनाए रखा था।

यहाँ बैल एक पशु भर नहीं है। वह किसान के श्रम का साथी, ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार और पारंपरिक कृषि-संस्कृति का प्रतीक है। उसकी विदाई को आधुनिकता के आगमन और एक पुराने ग्रामीण संसार के धीरे-धीरे समाप्त होने के रूपक के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

इस दृष्टि से “बोल उठा खेत उस दिन…” का आरंभ और “बैल—बिदाई” का अंत एक सुंदर भावात्मक वृत्त निर्मित करता है।

परिवार : स्मृतियों का सबसे निकट संसार

“पिताजी की आत्म-भर्त्सना”, “मेरी भाभी—मेरी देवी”, “मेरे पिताजी—मेरी नजर में” और “फुआ की बिदाई” जैसे निबंध पुस्तक को पारिवारिक संवेदना से भर देते हैं।

विशेष रूप से “मेरी भाभी—मेरी देवी” जैसा शीर्षक भारतीय संयुक्त परिवार की उस भाव-संरचना की ओर संकेत करता है जिसमें रिश्ते केवल रक्त-संबंधों से निर्धारित नहीं होते, बल्कि सेवा, स्नेह, त्याग और आत्मीयता से अपना अर्थ प्राप्त करते हैं।

“मेरे पिताजी—मेरी नजर में” में पिता को देखने की दृष्टि केवल पुत्र की दृष्टि नहीं है; वह एक पूरी पीढ़ी को समझने का माध्यम बन सकती है। इसी प्रकार “फुआ की बिदाई” में विदाई निजी घटना से आगे बढ़कर भारतीय परिवार की भावनात्मक संरचना का प्रतिनिधि प्रसंग बन जाती है।

गाँव के गुमनाम नायकों को साहित्य में स्थान

इस पुस्तक की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इसमें बड़े ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के बजाय गाँव और परिवार से जुड़े लोगों को केंद्र में रखा गया है।

“गाँव का गाँधी, सिंहनपुरा संत—पंचकौड़ी ओझा”, “बड़का सिंहनपुरा के माणिकतुल्य व्यक्तित्व”, “अनन्त ओझा”, “रामजी ओझा”, “नागेश्वर ओझा”, “डॉ. सत्यदेव ओझा”, “अरविन्द—व्यक्ति एक रूप अनेक”, “नरेन्द्र—मेरा सहपाठी”, “कैलाश मिश्र—मेरे अनन्य मित्र” और “रामबिहारी” जैसे निबंध स्थानीय जीवन के अनेक चरित्रों को स्मृति में स्थायी स्थान देते हैं।

यही इस पुस्तक की बड़ी उपलब्धि है। इतिहास अक्सर राजाओं, युद्धों और बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों को दर्ज करता है; साहित्य उन साधारण मनुष्यों को बचाता है जिन्होंने अपने छोटे-से संसार को अर्थ दिया।

व्यक्ति-चित्रण में आत्मीयता

इन व्यक्तित्वों पर लिखते हुए लेखक का उद्देश्य केवल जीवन-परिचय देना नहीं है। वे उनके व्यक्तित्व के उन पक्षों को पकड़ते हैं जो लेखक की अपनी स्मृतियों में अंकित हैं।

इसलिए ये रेखाचित्र सूखे जीवन-वृत्तांत नहीं बनते। इनमें संबंधों की ऊष्मा है, स्मृति का अपनापन है और कहीं-कहीं विछोह की कसक भी है।

शिक्षक और मित्र : जीवन की दूसरी पाठशाला

“मेरे शिक्षक”, “डॉ. सत्यदेव ओझा”, “नरेन्द्र—मेरा सहपाठी” और “कैलाश मिश्र—मेरे अनन्य मित्र” जैसे निबंधों में लेखक के जीवन-निर्माण में शिक्षा और मित्रता की भूमिका दिखाई देती है।

शिक्षक ज्ञान देते हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व का प्रभाव अक्सर पाठ्यपुस्तकों से कहीं अधिक दूर तक जाता है। इसी तरह सहपाठी और मित्र जीवन की ऐसी स्मृतियाँ बन जाते हैं जो समय बीतने के बाद और भी मूल्यवान प्रतीत होती हैं।

अप्रैल में गाँव : प्रकृति और स्मृति

“अप्रैल में गाँव” शीर्षक प्रकृति और ग्रामीण जीवन के संबंध को सामने लाता है। गाँव को समझने के लिए केवल उसके लोगों को देखना पर्याप्त नहीं; उसके मौसम, खेत, पेड़-पौधे, कृषि-चक्र और प्राकृतिक वातावरण को भी समझना आवश्यक है।

ऋतु यहाँ केवल समय की गणना नहीं करती, बल्कि स्मृतियों को जागृत करती है। लेखक की दृष्टि में गाँव एक ऐसा जीवित संसार है जिसकी अपनी लय है, अपना मौसम है और अपनी संवेदना है।

ललित निबंध की विशेषता

ललित निबंध की शक्ति उसकी विषय-वस्तु से अधिक उसकी दृष्टि और अभिव्यक्ति में होती है। साधारण घटना को असाधारण संवेदना के साथ देखना ही उसे साहित्य में रूपांतरित करता है।

“बोल उठा खेत उस दिन…” की विषय-संरचना से स्पष्ट है कि लेखक का झुकाव बाहरी घटनाओं के वर्णन से अधिक स्मृति और संवेदना की ओर है। गाँव, खेत, परिवार, मित्र, शिक्षक, मंदिर और पशु—सभी लेखक की आत्मीय दृष्टि से गुजरकर साहित्यिक चरित्र प्राप्त करते हैं।

बदलते गाँव का दस्तावेज

पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसका परिवर्तन-बोध है। खेत वही हैं, लेकिन खेती बदल रही है। गाँव वही है, लेकिन जीवन-शैली बदल रही है। बैल की जगह ट्रैक्टर आ रहा है। रिश्तों के स्वरूप बदल रहे हैं। नई पीढ़ियाँ गाँव से बाहर जा रही हैं।

इस परिवर्तन को लेखक किसी समाजशास्त्रीय रिपोर्ट की तरह प्रस्तुत नहीं करते; वे उसे स्मृतियों के माध्यम से अनुभव कराते हैं। यही कारण है कि पुस्तक का भावात्मक पक्ष उसके सांस्कृतिक पक्ष से जुड़ जाता है।

डॉ. अजय कुमार ओझा का संपादकीय योगदान

किसी लेखक की बिखरी हुई रचनाओं को एक संगठित पुस्तक का रूप देना अपने आप में महत्त्वपूर्ण संपादकीय कार्य है। डॉ. अजय कुमार ओझा ने इन निबंधों को एक ऐसे संग्रह के रूप में प्रस्तुत किया है जिसमें जन्मभूमि केंद्रीय सूत्र बनी रहती है।

संकलन की दृष्टि से पुस्तक की विषय-संरचना भी उल्लेखनीय है। आरंभ खेत और गाँव से होता है; फिर घर, मंदिर, खेती, परिवार और ग्रामीण व्यक्तित्वों की ओर यात्रा होती है; उसके बाद शिक्षक, मित्र और ऋतु-स्मृतियाँ आती हैं और अंत में बैल की विदाई के साथ एक पुराने ग्रामीण संसार की मार्मिक छवि उभरती है।

इस प्रकार संपादन केवल रचनाओं को एकत्र करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी पुस्तक में एक भावात्मक एकसूत्रता दिखाई देती है।

क्यों पढ़ी जानी चाहिए यह पुस्तक?

“बोल उठा खेत उस दिन…” उन पाठकों के लिए विशेष महत्त्व रखती है जो अपने गाँव से दूर हो चुके हैं, लेकिन अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं। यह उन लोगों के लिए भी महत्त्वपूर्ण है जिन्होंने ग्रामीण भारत को केवल बाहर से देखा है।

पुस्तक पढ़ते हुए पाठक को अपने गाँव का कोई खेत याद आ सकता है, किसी बुजुर्ग की आवाज सुनाई दे सकती है, किसी मंदिर की घंटी स्मृति में बज सकती है, किसी मित्र का चेहरा आँखों के सामने आ सकता है या किसी विदाई का पुराना क्षण फिर से जीवित हो सकता है।

यही साहित्य की सबसे बड़ी सफलता है—वह लेखक की स्मृति को पाठक की स्मृति बना देता है।

समग्र मूल्यांकन

“बोल उठा खेत उस दिन…” को केवल ललित निबंधों का संग्रह कहना इसके महत्व को सीमित करना होगा। यह पुस्तक एक साथ संस्मरण, व्यक्तिचित्र, ग्रामीण जीवन का दस्तावेज, लोक-संस्कृति का आलेख और जन्मभूमि के प्रति आत्मीय श्रद्धांजलि है।

आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा ने अपने अनुभवों और स्मृतियों के माध्यम से जिस ग्रामीण संसार को शब्द दिया है, वह व्यक्तिगत होते हुए भी व्यापक भारतीय अनुभव का हिस्सा बन जाता है। वहीं डॉ. अजय कुमार ओझा का संपादकीय प्रयास इन स्मृतियों को पुस्तकाकार रूप देकर उन्हें स्थायित्व प्रदान करता है।

पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें बड़े विमर्शों के बजाय छोटे जीवन-प्रसंगों में छिपी बड़ी संवेदनाओं को महत्व दिया गया है। यही कारण है कि खेत, बैल, मंदिर, पिता, भाभी, फुआ, शिक्षक और मित्र—सभी पुस्तक में अपनी-अपनी आवाज के साथ उपस्थित होते हैं।

निष्कर्ष

अंततः “बोल उठा खेत उस दिन…” जन्मभूमि की उस पुकार का साहित्यिक रूप है जिसे मनुष्य जीवन भर अपने भीतर सुनता रहता है। यह पुस्तक हमें बताती है कि गाँव पीछे छूट सकता है, खेतों का रूप बदल सकता है, बैल विदा हो सकते हैं, लोग बिछुड़ सकते हैं और समय आगे बढ़ सकता है—लेकिन स्मृतियों में बसी जन्मभूमि कभी समाप्त नहीं होती।

इस पुस्तक को पढ़ते हुए सचमुच ऐसा अनुभव होता है कि कोई खेत दूर से पुकार रहा है और कह रहा है—

“तुम जहाँ भी चले जाओ, तुम्हारी जड़ें यहीं हैं।”

यही “बोल उठा खेत उस दिन…” की सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।



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