Wednesday, September 16, 2026

पुस्तक समीक्षा : डॉ. अजय कुमार ओझा की पुस्तक "धोबिया जल बीच मरत पियासा"

 

पुस्तक समीक्षा:

 "धोबिया जल बीच मरत पियासा"

(आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के रोचक ललित निबंधों का रुचिकर संग्रह)

संकलन, पुनर्सृजन, संपादन एवं प्रस्तुति  : डॉ. अजय कुमार ओझा
प्रकाशक : अनुराधा प्रकाशन, नई दिल्ली

यह पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है। 






प्यासे मनुष्य, बदलते समय और स्मृतियों की साहित्यिक यात्रा

हिंदी ललित निबंध की परंपरा में वे रचनाएँ विशेष महत्त्व रखती हैं जिनमें लेखक अपने समय, समाज और जीवन को केवल बाहर से नहीं देखता, बल्कि उसके भीतर उतरकर उसे अनुभव करता है। ललित निबंध में विचार जब संवेदना से जुड़ता है, स्मृति जब संस्कृति का रूप ग्रहण करती है और सामान्य जीवन-प्रसंग जब व्यापक मानवीय अर्थ प्राप्त कर लेते हैं, तब साहित्य अपनी विशिष्ट ऊँचाई प्राप्त करता है।

‘धोबिया जल बीच मरत पियासा’ आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के ऐसे ही ललित निबंधों का संग्रह है। डॉ. अजय कुमार ओझा द्वारा पुनर्सृजित,संपादित व  प्रस्तुत यह कृति बारह ललित निबंधों के माध्यम से पाठक को जीवन के विविध रंगों से परिचित कराती है। पुस्तक के निबंधों के शीर्षक ही इसकी विषय-विविधता का संकेत देते हैं—

  1. धोबिया जल बीच मरत पियासा
  2. एक अद्भुत, अपूर्व सौन्दर्य
  3. अखियाँ हरिदरसन की प्यासी
  4. अकेलत्व की चाह
  5. दिया कबीरा रोय
  6. प्रवाह से विच्छिन्न जीवन को देखने लगा हूँ
  7. व्याकरण भूलते जा रहा हूँ
  8. मैं जेब कतरने का कलाकार हूं
  9. तरकारीवाला
  10. गाँव का गाँधी, सिंहनपुरा संत – पंचकौड़ी ओझा
  11. एक रिक्शेवाले की प्रतीक्षा
  12. पटना-यात्रा तब और अब

इन बारह निबंधों को एक साथ पढ़ने पर आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा की रचनात्मक चेतना के अनेक पक्ष सामने आते हैं।


शीर्षक : ‘धोबिया जल बीच मरत पियासा’

किसी भी पुस्तक का शीर्षक उसकी रचनात्मक आत्मा का संकेतक होता है। ‘धोबिया जल बीच मरत पियासा’ शीर्षक में लोकभाषा की मिठास भी है और गहरी जीवन-दृष्टि भी।

चारों ओर जल हो और फिर भी प्यास बनी रहे - यह स्थिति केवल भौतिक प्यास की नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर पैदा हुई उस रिक्तता की प्रतीक हो सकती है जिसमें संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद आत्मिक तृप्ति का अभाव है।

यह शीर्षक पुस्तक के अन्य निबंधों को समझने की भी एक कुंजी बन जाता है। मनुष्य प्रकृति के बीच है, समाज के बीच है, संबंधों के बीच है, स्मृतियों के बीच है, लेकिन फिर भी वह किसी ऐसी चीज की तलाश में है जो उसे भीतर से पूर्ण कर सके।

‘एक अद्भुत, अपूर्व सौन्दर्य’ : सौन्दर्य की खोज

यह निबंध सौन्दर्य के सामान्य अर्थ से आगे जाने की संभावना पैदा करता है। ललित निबंधकार की दृष्टि वस्तुओं के बाहरी रूप तक सीमित नहीं रहती। वह जीवन के सामान्य दृश्यों, प्रकृति और मानवीय व्यवहार में छिपे सौन्दर्य को खोजती है।

आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के लिए सौन्दर्य केवल आँखों से देखने की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभूति का विषय है। इसलिए उनके सौन्दर्य-बोध में प्रकृति के साथ-साथ मनुष्य और उसकी संवेदना भी शामिल हो जाती है।

‘अखियाँ हरिदरसन की प्यासी’ : भक्ति और विरह का भाव

इस शीर्षक में लोकभक्ति और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की गहरी अनुगूँज सुनाई देती है। ‘अखियाँ’ और ‘प्यासी’ जैसे शब्द भाव-जगत में प्रतीक्षा, दर्शन और आत्मिक आकांक्षा का संसार निर्मित करते हैं।

यहाँ ‘दर्शन’ केवल धार्मिक कर्मकांड का विषय न रहकर मनुष्य की उस शाश्वत आकांक्षा का प्रतीक बन सकता है जिसमें वह किसी उच्चतर सत्य, सौन्दर्य या प्रिय सत्ता का साक्षात्कार चाहता है।


'अकेलत्व की चाह’ : भीड़ में एकांत की तलाश

आधुनिक जीवन की एक बड़ी विडंबना यह है कि मनुष्य लगातार लोगों के बीच रहते हुए भी अकेला होता जा रहा है। लेकिन यहाँ ‘अकेलत्व’ केवल सामाजिक अलगाव नहीं है। यह अपने भीतर लौटने की इच्छा भी हो सकती है।

आज का मनुष्य बाहरी शोर से घिरा हुआ है। ऐसे समय में अकेले रहने की इच्छा आत्मसंवाद की आवश्यकता बन जाती है।

यह निबंध संभवतः इसी अंतर्द्वंद्व को सामने लाता है - क्या अकेलापन अभिशाप है अथवा आत्म-साक्षात्कार का अवसर ?


‘दिया कबीरा रोय’ : कबीर की चेतना और समय का प्रश्न

‘दिया कबीरा रोय’ शीर्षक तत्काल कबीर की निर्भीक, लोकधर्मी और आत्मदर्शी परंपरा की याद दिलाता है।

कबीर ने अपने समय के धार्मिक आडंबर, सामाजिक विभाजन और खोखले कर्मकांड पर प्रश्न उठाए थे। उनके यहाँ सत्य की खोज और मनुष्य की प्रतिष्ठा सर्वोपरि है।

आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा जब कबीर को स्मरण करते हैं तो यह स्मरण केवल अतीत की ओर लौटना नहीं, बल्कि वर्तमान को कबीर की दृष्टि से देखने का प्रयास बन जाता है।

‘रोय’ शब्द शीर्षक में करुणा का भाव भी पैदा करता है - मानो कबीर की आँखों के सामने अपने समय की कोई ऐसी स्थिति उपस्थित हो गई हो जो उनकी आत्मा को व्यथित कर रही हो।


‘प्रवाह से विच्छिन्न जीवन को देखने लगा हूँ’ : आधुनिक मनुष्य की त्रासदी

यह शीर्षक संग्रह के सबसे गंभीर और चिंतनशील निबंधों में से एक की ओर संकेत करता है।

जीवन एक प्रवाह है। परंपरा, संस्कृति, परिवार, समाज और प्रकृति इस प्रवाह के विभिन्न घटक हैं। जब मनुष्य इनसे कटने लगता है तो उसका जीवन बाहरी रूप से सुविधापूर्ण होते हुए भी भीतर से विच्छिन्न हो सकता है।

आज की तेज गति वाली दुनिया में यह प्रश्न विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है कि मनुष्य किस प्रवाह से जुड़ा है और किससे कट गया है।

यह निबंध आधुनिकता के विरोध का सरल घोषणापत्र नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की जटिलताओं पर आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है।


‘व्याकरण भूलते जा रहा हूँ’ : भाषा से जीवन तक

यह शीर्षक अत्यंत रोचक और बहुअर्थी है।

व्याकरण भाषा को व्यवस्थित करता है, लेकिन जीवन हमेशा व्याकरण के नियमों से नहीं चलता। मनुष्य के अनुभव, प्रेम, पीड़ा, स्मृति और संवेदना कई बार स्थापित नियमों को तोड़कर अपनी अभिव्यक्ति तलाशते हैं।

‘व्याकरण भूलते जा रहा हूँ’ में भाषा और जीवन के बीच के तनाव को पढ़ा जा सकता है। संभव है कि लेखक यहाँ शाब्दिक व्याकरण से आगे बढ़कर उस सामाजिक और मानसिक ‘व्याकरण’ पर भी प्रश्न उठाते हों जिसे मनुष्य ने अपने जीवन के लिए निर्धारित कर रखा है।

ललित निबंध की दृष्टि से यह शीर्षक लेखक की भाषिक प्रयोगशीलता और विनोदपूर्ण चिंतन का परिचायक भी है।

‘मैं जेब कतरने का कलाकार हूं’ : व्यंग्य और आत्मविडंबना

शीर्षक पहली दृष्टि में चौंकाता है। कोई लेखक स्वयं को ‘जेब कतरने का कलाकार’ क्यों कहेगा?

यही चौंकाने वाला अंदाज ललित निबंध की रोचकता पैदा करता है। शीर्षक में व्यंग्य, आत्मपरिहास और सामाजिक संकेत - तीनों की संभावनाएँ मौजूद हैं।

यहाँ ‘जेब काटना’ वास्तविक अपराध के बजाय किसी रूपक, सामाजिक व्यवहार या मानवीय प्रवृत्ति की ओर संकेत हो सकता है। लेखक स्वयं को ही व्यंग्य का पात्र बनाकर पाठक को समाज के दूसरे चेहरों की ओर देखने के लिए प्रेरित कर सकता है।

ललित निबंधकार की विशेषता यही है कि वह गंभीर बात को भी मुस्कान के साथ कह सकता है।

‘तरकारीवाला’ : साधारण व्यक्ति का असाधारण साहित्यिक संसार

ललित निबंध की शक्ति इस बात में है कि वह उन लोगों को भी साहित्य का विषय बना सकता है जिन्हें सामान्यतः साहित्य में ‘महत्त्वपूर्ण’ नहीं माना जाता।

‘तरकारीवाला’ ऐसा ही शीर्षक है।

एक साधारण सब्जी विक्रेता लेखक की दृष्टि में केवल रोजमर्रा का व्यक्ति नहीं रह जाता। उसके माध्यम से श्रम, गरीबी, आत्मसम्मान, संघर्ष, व्यवहार, बाजार और मानवीय संबंधों की अनेक परतें खुल सकती हैं।

यही वह दृष्टि है जो ललित निबंध को सामाजिक संवेदना से जोड़ती है।


‘गाँव का गाँधी, सिंहनपुरा संत – पंचकौड़ी ओझा’

संग्रह का यह निबंध व्यक्ति-चित्रण की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है।

पंचकौड़ी ओझा को ‘गाँव का गाँधी’ और ‘सिंहनपुरा संत’ कहना ही उनके व्यक्तित्व के प्रति लेखक की गहरी श्रद्धा और आत्मीयता को व्यक्त करता है।

भारतीय गाँवों में ऐसे अनेक व्यक्तित्व रहे हैं जिनका औपचारिक इतिहास में शायद उल्लेख न मिले, लेकिन स्थानीय समाज के नैतिक और सांस्कृतिक जीवन में उनका प्रभाव अत्यंत गहरा रहा है।

इस प्रकार का व्यक्ति-चित्र केवल किसी व्यक्ति की जीवनी नहीं होता। वह अपने साथ पूरे ग्रामीण समाज की स्मृति, संस्कार और जीवन-मूल्यों को लेकर चलता है।

इस निबंध का महत्त्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि यह स्थानीय इतिहास को मानवीय इतिहास में बदलने की क्षमता रखता है।


‘एक रिक्शेवाले की प्रतीक्षा’ : प्रतीक्षा का मानवीय अर्थ

रिक्शावाला भारतीय शहरों के सामान्य जीवन का परिचित पात्र है। लेकिन ललित निबंधकार की दृष्टि सामान्य दृश्य को भी अर्थपूर्ण बना देती है।

‘प्रतीक्षा’ इस निबंध का सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है। रिक्शेवाले की प्रतीक्षा केवल किसी यात्री की प्रतीक्षा नहीं रह जाती; वह रोजी-रोटी, सम्मान, अवसर और जीवन की बेहतर संभावना की प्रतीक्षा का प्रतीक बन सकती है।

इस प्रकार एक सामान्य रिक्शेवाला व्यापक मानवीय संवेदना का प्रतिनिधि बन जाता है।


‘पटना-यात्रा तब और अब’ : स्मृति और परिवर्तन

संग्रह का अंतिम निबंध अतीत और वर्तमान की तुलना के लिए एक सुंदर आधार प्रदान करता है।

पटना केवल एक शहर नहीं है। बिहार के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन में इसका विशेष स्थान रहा है। इसलिए ‘तब’ और ‘अब’ का अंतर केवल सड़क, भवन, यातायात या शहर के विस्तार का अंतर नहीं हो सकता।

यह परिवर्तन जीवन-शैली, सामाजिक संबंधों, भाषा, संस्कृति और मनुष्य की मानसिकता में आए बदलावों का भी दर्पण बन सकता है।

संस्मरणात्मक दृष्टि से यह निबंध पाठक को समय की यात्रा कराता है - पुराने पटना की स्मृतियों से लेकर बदलते हुए वर्तमान पटना तक।

बारह निबंधों में एक सूत्र

इन सभी निबंधों की विषय-वस्तु अलग-अलग है, लेकिन इनके भीतर एक साझा रचनात्मक सूत्र दिखाई देता है - मनुष्य और उसके जीवन की खोज।

कहीं प्यास है, कहीं सौन्दर्य की तलाश; कहीं ईश्वर-दर्शन की आकांक्षा है, कहीं अकेलेपन की चाह; कहीं कबीर का प्रश्न है, कहीं जीवन-प्रवाह से विच्छिन्न होने की चिंता; कहीं भाषा का व्याकरण टूट रहा है तो कहीं जेब काटने का व्यंग्यात्मक कलाकार सामने आता है।

फिर लेखक तरकारीवाले और रिक्शेवाले जैसे सामान्य पात्रों के पास पहुँचता है और अंततः गाँव के एक विशिष्ट व्यक्तित्व तथा पटना की स्मृतियों के माध्यम से व्यक्ति से समाज और वर्तमान से अतीत तक की यात्रा करता है।

यही विविधता पुस्तक को रोचक बनाती है।


लोक और शास्त्र का संगम

आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के इन निबंधों की एक विशेषता लोक और शास्त्र के बीच संवाद स्थापित करने की क्षमता मानी जा सकती है।

‘अखियाँ हरिदरसन की प्यासी’, ‘दिया कबीरा रोय’ जैसे शीर्षक भारतीय भक्ति और संत परंपरा की ओर ले जाते हैं, जबकि ‘तरकारीवाला’, ‘एक रिक्शेवाले की प्रतीक्षा’ और ‘पटना-यात्रा तब और अब’ हमें रोजमर्रा के सामाजिक जीवन के बीच ले आते हैं।

अर्थात् लेखक के लिए साहित्य का संसार केवल पुस्तकालय में नहीं है। वह खेत में है, बाजार में है, सड़क पर है, गाँव में है, शहर में है और मनुष्य की स्मृति में भी है। 


भाषा : सहजता, लालित्य और लोक-संवेदना

ललित निबंध का सौंदर्य केवल विषय में नहीं, भाषा में भी निहित होता है। इस संग्रह के शीर्षक ही संकेत देते हैं कि आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा की भाषा में लोकजीवन और साहित्यिक संवेदना का सुंदर मेल है।

‘धोबिया जल बीच मरत पियासा’ जैसे लोक-स्वर वाले शीर्षक और ‘प्रवाह से विच्छिन्न जीवन को देखने लगा हूँ’ जैसे दार्शनिक शीर्षक एक ही संग्रह में दिखाई देते हैं। इससे भाषा और विचार की व्यापकता का अनुमान लगाया जा सकता है।

उनकी भाषा में जहाँ आवश्यकता होती है वहाँ गंभीरता आती है, जहाँ प्रसंग माँगता है वहाँ विनोद और व्यंग्य आता है और जहाँ स्मृति बोलती है वहाँ भाषा आत्मीय हो जाती है।


डॉ. अजय कुमार ओझा का  योगदान

इस संग्रह के संदर्भ में डॉ. अजय कुमार ओझा की भूमिका विशेष उल्लेख की अपेक्षा रखती है। किसी रचनाकार की साहित्यिक विरासत को सुरक्षित रखना, उसकी रचनाओं को खोजकर व्यवस्थित करना, उन्हें पुनर्सृजित कर पाठकों  तक पहुँचाना केवल संपादन का तकनीकी कार्य नहीं है; यह साहित्यिक संरक्षण का कार्य भी है।

आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के बारह ललित निबंधों को एक पुस्तक के रूप में सामने लाने से पाठकों को उनके रचनात्मक संसार को एक साथ देखने का अवसर मिलता है।

विशेषकर ‘गाँव का गाँधी, सिंहनपुरा संत – पंचकौड़ी ओझा’, ‘तरकारीवाला’ और ‘एक रिक्शेवाले की प्रतीक्षा’ जैसे निबंध इस बात की ओर संकेत करते हैं कि लेखक की दृष्टि साहित्य के तथाकथित बड़े विषयों के साथ-साथ सामान्य मनुष्य के जीवन पर भी समान रूप से केंद्रित थी। 

पुस्तक का समग्र मूल्यांकन

धोबिया जल बीच मरत पियासा’ को केवल बारह निबंधों का संग्रह कहना इसके साहित्यिक विस्तार को सीमित करना होगा। यह पुस्तक एक ऐसे रचनाकार की संवेदना का परिचय देती है जो जीवन को अनेक कोणों से देखता है।

इसमें  —

आध्यात्मिकता है,
प्रकृति और सौन्दर्य-बोध है,
आत्मचिंतन है,
व्यंग्य और विनोद है,
लोकजीवन है,
सामाजिक संवेदना है,
व्यक्ति-चित्रण है,
स्मृति है,
और बदलते समय का बोध भी है।

इन सबको जोड़ने वाली केंद्रीय शक्ति है —  मनुष्य के प्रति संवेदना। 


आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के ‘धोबिया जल बीच मरत पियासा’ के बारह ललित निबंध पाठक को एक ऐसी साहित्यिक यात्रा पर ले जाते हैं जहाँ जीवन के बड़े प्रश्न छोटे-छोटे अनुभवों से जन्म लेते हैं।

यहाँ प्यास केवल पानी की नहीं है। दर्शन की प्यास है, सौन्दर्य की प्यास है, आत्मीयता की प्यास है, अपने अतीत को समझने की प्यास है और मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की प्यास है।

‘धोबिया जल बीच मरत पियासा’ इसी मानवीय प्यास का साहित्यिक रूपक है।

डॉ. अजय कुमार ओझा द्वारा  पुनर्सृजित कर प्रस्तुत यह संग्रह आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा की रचनात्मक चेतना को समझने के लिए उपयोगी आधार प्रस्तुत करता है। इसकी विशेषता यह है कि यह पाठक को किसी एक विषय में बाँधता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभव से लेकर सामाजिक यथार्थ, गाँव की स्मृति से लेकर शहर के परिवर्तन और सामान्य जन से लेकर आत्मचिंतन तक अनेक संसारों में ले जाता है।

इस संग्रह को पढ़ते हुए अंततः यही अनुभव होता है कि ललित निबंध जीवन को सुंदर बनाने से अधिक, जीवन को गहराई से देखने की कला सिखाता है।

और आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के इन निबंधों की यही सबसे बड़ी साहित्यिक उपलब्धि है।

























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