Tuesday, June 2, 2015

LET US REMEMBER KABIR DAS MYSTICAL SAINT, POET & PROGRESSIVE REFORMIST ON HIS JAYANTI



LET US REMEMBER KABIR DAS  MYSTICAL SAINT, POET & PROGRESSIVE REFORMIST ON HIS JAYANTI


Through his Amrit Vani





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Courtesy:hindugodwallpaper.com

चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह।

जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥





माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय।
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय॥





साईं इतना दीजियेजा मे कुटुम समाय । 
मैं भी भूखा न रहूँसाधु ना भूखा जाय ॥





धीरे-धीरे रे मनाधीरे सब कुछ होय । 
माली सींचे सौ घड़ाॠतु आए फल होय ॥





माया मरी न मन मरामर-मर गए शरीर । 
आशा तृष्णा न मरीकह गए दास कबीर 



दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥




बडा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नही फल लागे अति दूर ॥



जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥


लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट ।
पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥



जहाँ दया तहाँ धर्म है, जहाँ लोभ तहाँ पाप ।
जहाँ क्रोध तहाँ पाप है, जहाँ क्षमा तहाँ आप ॥




धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय । 
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय ॥ 


माटी कहे कुम्हार से, तु क्या रौंदे मोय । 
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय ॥ 






आय हैं सो जाएँगे, राजा रंक फकीर । 
सिंहासन चढ़ि चले, एक बँधे जात जंजीर ॥






माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर । 

आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर ॥





शीलवन्त सबसे बड़ा, सब रतनन की खान । 
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन ॥ 








काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । 

पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब ॥ 






माँगन मरण समान है, मति माँगो कोई भीख । 

माँगन से तो मरना भला, यह सतगुरु की सीख ॥ 





गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय।

बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय॥





यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान।

सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान॥ 





जो तोको काँटा बुवै ताहि बोव तू फूल।
तोहि फूल को फूल है वाको है तिरसुल॥





सात समंदर की मसि करौं लेखनि सब बनराइ।
धरती सब कागद करौं हरि गुण लिखा न जाइ॥





साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उडाय॥




तिनका कबहुँ ना निंदियेजो पाँव तले होय । 
कबहुँ उड़ आँखो पड़ेपीर घानेरी होय ॥ 





रात गंवाई सोय केदिवस गंवाया खाय । 
हीरा जन्म अमोल थाकोड़ी बदले जाय ॥






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