Friday, September 17, 2021

" माँ ही ब्रह्म है ! " - डॉ सुशीला ओझा ( Dr Susheela Ojha )

                      डॉ सुशीला ओझा के फेसबुक वाल से 


    माँ राधिका देवी  (Radhika Devi) को समर्पित 



" माँ ही ब्रह्म है ! "

                                                                       डॉ सुशीला ओझा 



डॉ सुशीला ओझा अपनी करुणामयी ममतामयी माँ राधिका देवी के साथ 




मैंने ब्रह्म को देखा नहीं,

माँ ही ब्रह्म है !

मैंने आकाशधर्मा माँ को देखा है, 

उसकी गोद में शिशु रवि !


मेरे लालिमायुक्त, अनुरागमयी गालों को 

सहलाती है माँ ... 

खिल उठता है ह्रदय कमल,

खुलती है एक एक पंखुड़ी। 


माँ केसर कुमकुम से देती है ,

नवजीवन का आशीर्वाद। 

अपनी कोमल शीतल किरणों से ऊर्जस्वित करती  ... 

निशा नंदिनी बनकर आती, नहलाती अपनी ज्योत्सना से। 


हमको अपने क्रोड़ में लेकर खेलती है जल थल में ,

लुटाती है मोतियों के अक्षय कोष, खिल उठती कुमुदनी। 

माँ स्रष्टा है , द्रष्टा है, 

कलात्मकता , रचनात्मकता की देवी है। 


माँ की भूमिका अद्भुत है  ..... 

कभी होठों को चूमती है शिशु किरणों से। 

कभी अनुशासित करती है,

प्रखर किरणों से। 


माँ स्वस्तिवाचन की मृदुल फुहारों से भींगाती, 

बनती सावन की बूंदों से ... 

माँ का ह्रदय सागर की तरह विशाल है  .... अगाध है  ..... 

दया, क्षमा, सहनशीलता, ममता, करूणा, प्रेम रत्न से भरे। 


माँ शिल्पीमयी है, अनगढ़ चट्टानों से, 

विकृतियों की काई हटाती है  .... ! 

माँ के नैनों में नीर है, 

हड्डियों को तोड़कर बहाती है अमृतधारा। 


प्रसव पीड़ को झेलती ,

वक्ष में भरी पयस्विनी धारा है। 

माँ महिमामयी है ,

शिल्पी है, अद्भुत चित्रकार है !


माँ वटवृक्ष की  गहन छाँव है ,

उसके अंक में चंदन की  शीतलता है  .... !

वाणी में मयूरों की केका,

पंखों में अनगिनत आँखें। 


माँ वसंतमालती है  ... प्यार से बाँहों में भरती है  ... 

माँ हरश्रृंगार है, दिव्य गंध से आशीर्वाद बरसाती है  .... !

निर्झरिणी सी पावन ,

नैनों में प्रेम नदी छलकाती है  .... ! 


अपूर्व है माँ का प्रेम डगर  ... 

जिसमें प्रेम है, पीड़ा है, नेह है, हर्ष है  ... 

अश्रुपूरित आँखें 

पावस सी  हैं। 


है किसको इतनी हिम्मत, 

वात्सल्य रस की, 

पीयूष धारा से  .... 

"बचिया" पुकारने को  ... !


हरहराती नदी की तरह, 

खूँटे से टूटे गोवत्स की  तरह दौड़े। 

मेरे एक रंभाने से ,

बन जाती है पीयूषवर्षिणि  .... !


धन्य हुई सत् चित आनंदमयी भावों की प्रेममयी वर्षिणी   .... !

साश्रुनयन से धोए तेरे पग को। 

बारंबार 

भाल पर तिलक लगाऊँ  .... !


भावों की थाली में शब्दों के पुष्प, 

दिव्य कर्पूर गंध से आरती उतारूँ   .... !


माँ तुम अपरिभाषित हो  ... 

अवर्णनीय हो, अप्रमेय हो  ... !

शब्दों की परिधि में,

तुम नहीं बंधती। 


तुम अलौकिक हो  .... अद्भुत हो  .. 

साकार हो, निर्विकार हो  ... !

तुम शब्दों से परे, शब्दातीत हो माँ  ... 

स्वीकारो मेरा वंदन अभिनन्दन  ... ! 


                                           डॉ सुशीला ओझा 

                                       ( साहित्यकार  एवं संस्कृतिकर्मी )                                                                                     पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, महिला महाविद्यालय                                                                                           बेतिया, पश्चिम चम्पारण, बिहार  




Friday, August 27, 2021

असली हितैषी कौन ?

 

असली हितैषी कौन ?



माता मित्रं पिता चेति स्वभावात् त्रितयं हितम्। 

कार्यकारणतश्चान्ये     भवन्ति    हितबुद्धयः।।  




माता, पिता एवं मित्र तीनों ही स्वभावतः हमारे हित  की भलाई की सोचते हैं।  हमारा हित करने के बदले में वे  किसी प्रकार की अपेक्षा नहीं रखते। इन तीनों के सिवाय अन्य व्यक्ति यदि हमारे हित की सोचते हैं तो उसके बदले में हमसे कुछ न कुछ अपेक्षा भी रखते हैं। 









Sunday, August 22, 2021

मधुर एवं दिव्य भाषा संस्कृत ( २२ अगस्त संस्कृत दिवस )

मधुर एवं दिव्य भाषा संस्कृत ( २२ अगस्त संस्कृत दिवस )



भाषासु मुख्या मधुरा दिव्या गीर्वाणभारती। 

तत्रापि काव्यं मधुरं तस्मादपि सुभाषितम्।।


सभी भाषाओं में सबसे मुख्य, मधुर एवं दिव्य भाषा 'संस्कृत'  है।  उसमें भी काव्य मधुर होते हैं तथा काव्य में भी सबसे मधुर सुभाषित वचन होते हैं। 



भारतीय संस्कृति की परिचायक, सभी भारतीय भाषाओं की जननी, संसार भर की भाषाओं में प्राचीनतम एवं  समृद्धतम देवभाषा संस्कृत है। 


संस्कृत को विश्व पटल पर पहुँचाने में योगदान प्रदान करें। 

 

संस्कृत दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। 

 

Friday, August 20, 2021

मित्र की पहचान कब ?

 

मित्र की पहचान कब ?


जानीयात्प्रेषणेभृत्यान् 

बान्धवान्व्यसनाSSगमे। 

मित्रं ह्याSSपत्तिकालेषु 

भार्यां  च  विभवक्षये।। 



किसी महत्वपूर्ण कार्य पर भेजते समय सेवक की पहचान होती है।  व्यसन के समय में बन्धु - बान्धवों की पहचान होती है।  विपत्ति काल में मित्र की पहचान होती है एवं विभव-क्षय अर्थात् धन-संपत्ति के नष्ट हो जाने पर पत्नी की पहचान होती है। 

 

Monday, August 16, 2021

उदारस्य तृणं वित्तं

 


उदारस्य    तृणं   वित्तं   


उदारस्य    तृणं   वित्तं 

शूरस्य मरणं   तृणम्। 

विरक्तस्य  तृणं  भार्या 

   निस्पृहस्य तृणं जगत्।।  


उदार मनुष्य के लिए वित्त यानी धन तृण सदृश होता है, शूरवीर के लिए मृत्यु तृण सदृश होती है, विरक्त के लिए भार्या तृण सदृश होती है एवं निस्पृह (कामना रहित) मनुष्य के लिए जगत तृण सदृश होता है। 








अदृढ़ं  च  हतं  ज्ञानं      प्रमादेन  हतं  श्रुतम्। 

      संदिग्धो हि हतो मंत्रो, व्यग्रचित्तो हतो जपः।। 

मीठा वचन हितकारी !

 


मीठा  वचन  हितकारी !


अभ्यावहति    कल्याणं 

विविधं वाक् सुभाषिता। 

सैव  दुर्भाषिता  राजन् 

अनर्थायोपपद्यते। 



सुभाषित यानी मीठे वचन हितकारी होते हैं एवं उन्नति के मार्ग खोलते  हैं।  परन्तु वही वचन  दुर्भाषित हों  या कटुतापूर्ण शब्दों में बोले  जाएँ  तो दुःखदायी होते  हैं  तथा उसके दूरगामी दुष्परिणाम होते हैं। 

धर्म-विमुख बलवान असमर्थ होता है !

 


धर्म-विमुख बलवान असमर्थ होता है !



बलवानप्यशक्तोSसौ 

धनवानपि     निर्धनः। 

श्रुतवानपि  मूर्खोSसौ  

 यो धर्मविमुखो जनः।। 


जो व्यक्ति धर्म यानी कर्त्तव्य से विमुख होता है वह बलवान होकर भी असमर्थ, धनवान होकर भी निर्धन, एवं श्रुतवान यानी ज्ञानी होकर भी मूर्ख होता है।