Thursday, October 15, 2026

देवनागरी लिपि की वैश्विक स्थिति एवं प्रोत्साहन की दिशा

 देवनागरी लिपि की वैश्विक स्थिति एवं प्रोत्साहन की दिशा




[1.] भूमिका: देवनागरी का उद्भव, विकास एवं वैज्ञानिकता

उद्भव और ऐतिहासिक यात्रा

देवनागरी केवल भारत की एक पारंपरिक लिपि नहीं है, बल्कि यह मानव सभ्यता के इतिहास में भाषाई अभिव्यक्ति और ध्वनि-विज्ञान (Phonetics) के शिखर का प्रतिनिधित्व करती है। ऐतिहासिक दृष्टि से, देवनागरी का उद्भव ब्राह्मी लिपि से हुआ है। भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक, ब्राह्मी लिपि ने समय के साथ कई क्षेत्रीय और रूपात्मक परिवर्तनों को पार किया। ईसा की चौथी से पांचवीं शताब्दी के दौरान गुप्त काल में ब्राह्मी का रूपांतरण 'गुप्त लिपि' में हुआ, जो आगे चलकर 'सिद्धमात्रिका' या 'कुटिल लिपि' के रूप में विकसित हुई।
नवीं से दसवीं शताब्दी के आसपास, कुटिल लिपि से दो मुख्य शाखाएं निकलीं—पश्चिमी शाखा और पूर्वी शाखा। पश्चिमी शाखा से ही उस लिपि का जन्म हुआ जिसे आज हम देवनागरी या नागरी के नाम से जानते हैं। 'नागरी' शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ का मानना है कि नगरों (विशेषकर काशी या गुजरात के नगरों) में अधिक प्रचलित होने के कारण इसे 'नागरी' कहा गया, जबकि अन्य का मत है कि आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रंथों की 'देवनगर' (शरीर या देवस्थान) जैसी पवित्रता को समाहित करने के कारण इसमें 'देव' शब्द जुड़ा और यह 'देवनागरी' कहलाई।

वैज्ञानिक संरचना और ध्वनि-विज्ञान
विश्व की अधिकांश लिपियाँ (जैसे रोमन, अरबी या सिरिलिक) ऐतिहासिक संयोगों और ध्वनि-चिह्नों के अनियोजित संयोजन से बनी हैं। इसके विपरीत, देवनागरी पूरी तरह से अक्षर-वैज्ञानिक (Syllabic) और व्यवस्थित सिद्धांतों पर आधारित है। पाणिनि के व्याकरण और अष्टाध्यायी के सूत्रों से प्रेरित, देवनागरी की वर्णमाला वैज्ञानिकता की पराकाष्ठा है।
देवनागरी की सबसे बड़ी विशेषता इसका वर्गीकरण है। वर्णमाला को स्वर और व्यंजन में विभाजित किया गया है, और व्यंजनों को उनके उच्चारण स्थान के आधार पर पांच स्पष्ट वर्गों में बांटा गया है:

  1. कण्ठ्य (Guttural): क, ख, ग, घ, ङ (कंठ से उच्चरित)
  2. तालव्य (Palatal): च, छ, ज, झ, ञ (तालु से उच्चरित)
  3. मूर्धन्य (Retroflex): ट, ठ, ड, ढ, ण (जीभ को उलटकर मूर्धा को छूने से उच्चरित)
  4. दन्त्य (Dental): त, थ, द, ध, न (दांतों के स्पर्श से उच्चरित)
  5. ओष्ठ्य (Labial): प, फ, ब, भ, म (होठों के जुड़ने से उच्चरित)

यह क्रम यादृच्छिक (Random) नहीं है, बल्कि यह मानव के मुख-विवर से ध्वनि निकलने की प्राकृतिक और जैविक प्रक्रिया का हूबहू अनुसरण करता है।
"जैसा बोलना, वैसा लिखना" — अकाट्य नियम
रोमन लिपि में जहाँ एक ही अक्षर 'C' का उच्चारण 'कैट' (Cat) में 'क' और 'सिटी' (City) में 'स' हो जाता है, या 'Put' में 'u' का उच्चारण 'उ' और 'But' में 'अ' हो जाता है, वहीं देवनागरी इस प्रकार की विसंगतियों से पूरी तरह मुक्त है। देवनागरी का अकाट्य नियम है: "जो बोला जाता है, वही लिखा जाता है; और जो लिखा जाता है, वही पढ़ा जाता है।" इसमें कोई भी अक्षर 'मूक' (Silent) नहीं होता (जैसे अंग्रेजी के 'Knowledge' में 'K' या 'Right' में 'gh')। यह गुण इसे दुनिया की सबसे सुसंगत, त्रुटिहीन और सीखने में आसान लिपि बनाता है।

[2.] राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: भारतीय भाषाओं का आधारस्तंभ

बहुभाषी आधार
भारत की सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को जोड़ने में देवनागरी एक मजबूत पुल का कार्य करती है। यह केवल हिंदी की लिपि नहीं है, बल्कि भारत की कई प्रमुख और संवैधानिक भाषाओं का मुख्य आधार है:
  • संसदीय और प्रांतीय भाषाएँ: हिंदी, मराठी, नेपाली, कोंकणी, डोगरी, मैथिली और बोडो भाषाएँ आधिकारिक रूप से देवनागरी लिपि में ही लिखी जाती हैं।
  • संस्कृत और धार्मिक ग्रंथ: भारत की आत्मा कही जाने वाली संस्कृत भाषा, जिसके मूल ग्रंथ वेदों, उपनिषदों और पुराणों में समाहित हैं, मुख्य रूप से देवनागरी के माध्यम से ही दुनिया भर में संरक्षित है।
  • क्षेत्रीय जुड़ाव: सिंधी, कश्मीरी और संथाली जैसी भाषाओं को लिखने के लिए भी देवनागरी का व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त, गुजराती और गुरुमुखी (पंजाबी) लिपियों की बनावट और वर्ण-क्रम देवनागरी के इतने करीब हैं कि देवनागरी जानने वाला व्यक्ति इन्हें बहुत कम समय में सीख सकता है।
भारतीय संविधान और कानूनी स्थिति
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश की एकता के लिए लिपि के महत्त्व को बखूबी समझा था। संविधान के अनुच्छेद 343(1) में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है:
"संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी।"

यह प्रावधान देवनागरी को केवल एक व्यावहारिक लिपि नहीं, बल्कि भारत गणराज्य का एक संप्रभु प्रतीक (Sovereign Symbol) बनाता है। इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद ३५१ में सरकार को यह निर्देश दिया गया है कि वह हिंदी के विकास और प्रसार के लिए काम करे, जिससे भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके, और इसके लिए मुख्य रूप से देवनागरी आधारित शब्दावली को प्राथमिकता दी जाए।

[3.] देवनागरी की वैश्विक स्थिति (Global Status)

समकालीन विश्व में देवनागरी की वैश्विक स्थिति को समझने के लिए हमें इसे तीन मुख्य आयामों से देखना होगा: अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक जगत, प्रवासी भारतीय समुदाय और वैश्विक कूटनीति।
क. अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक और विश्वविद्यालय नेटवर्क
वैश्विक स्तर पर, संस्कृत के अध्ययन और भारतविद्या (Indology) के प्रसार ने देवनागरी को दुनिया के कोने-कोने में पहुँचाया है। आज विश्व के प्रमुख विश्वविद्यालयों में देवनागरी एक प्रतिष्ठित लिपि के रूप में स्थापित है:
  • यूरोप: जर्मनी के हीडलबर्ग विश्वविद्यालय, बॉन विश्वविद्यालय और लेइपज़िग विश्वविद्यालय को संस्कृत और देवनागरी का यूरोपीय केंद्र माना जाता है। इसके अलावा, ब्रिटेन के ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज विश्वविद्यालयों में दक्षिण एशियाई अध्ययन के तहत देवनागरी का पठन-पाठन दशकों से चल रहा है।
  • अमेरिका: हार्वर्ड, येल, कोलंबिया, शिकागो और कैलिफोर्निया (बर्कले) जैसे शीर्ष विश्वविद्यालयों (Ivy League) में हिंदी और संस्कृत के विशेष विभाग हैं, जहाँ विदेशी छात्र देवनागरी लिपि को पूरी वैज्ञानिकता के साथ सीख रहे हैं।
  • एशिया और रूस: रूस के मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी और सेंट पीटर्सबर्ग यूनिवर्सिटी में भारतविदों की एक लंबी परंपरा रही है जो देवनागरी के विशेषज्ञ हैं। चीन के पेकिंग विश्वविद्यालय और टोक्यो यूनिवर्सिटी (जापान) में भी देवनागरी आधारित भाषाओं पर गहन शोध कार्य हो रहे हैं।
ख. प्रवासी भारतीय (Diaspora) और सांस्कृतिक प्रभाव
विश्व भर में फैले लगभग ३.२ करोड़ से अधिक प्रवासी भारतीय देवनागरी को जीवित रखने और फैलाने के सबसे बड़े संवाहक हैं।
  • गिरमिटिया देश (Fiji, Mauritius, Suriname, Guyana, Trinidad): १९वीं शताब्दी में जब भारतीय मजदूरों को इन देशों में ले जाया गया, तो वे अपने साथ तुलसीदास कृत 'रामचरितमानस' लेकर गए जो देवनागरी में छपी थी। आज इन देशों में देवनागरी केवल एक लिपि नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक अस्मिता और पूर्वजों की पहचान का प्रतीक है। मॉरीशस में 'विश्व हिंदी सचिवालय' की स्थापना इसका साक्षात प्रमाण है।
  • आधुनिक प्रवासी (USA, UK, Canada, Gulf, Australia): इन देशों में बसे भारतीय समुदाय ने अपनी नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए सैकड़ों शनिवार/रविवार स्कूल (जैसे बालविहार, हिंदी शालाएँ) खोले हैं, जहाँ बच्चों को सबसे पहले देवनागरी वर्णमाला लिखना सिखाया जाता है।
ग. अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर देवनागरी और हिंदी
संयुक्त राष्ट्र संघ (UN) में हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की मांग लंबे समय से चल रही है। वर्तमान में, संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक संचार विभाग (DGC) द्वारा हिंदी में समाचार, पॉडकास्ट और सोशल मीडिया अपडेट्स नियमित रूप से जारी किए जाते हैं, जिन्हें देवनागरी लिपि में ही प्रस्तुत किया जाता है। इसके अलावा, वैश्विक नेताओं द्वारा भारत आगमन पर देवनागरी में ट्वीट करना या संदेश लिखना अब अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति का एक नया और प्रभावी माध्यम बन चुका है।

[4.] डिजिटल युग में देवनागरी: चुनौतियाँ और उपलब्धियाँ

इंटरनेट और सूचना प्रौद्योगिकी (IT) के आगमन ने देवनागरी के सामने अभूतपूर्व अवसर और साथ ही कुछ गंभीर चुनौतियाँ भी पेश की हैं।
क. तकनीकी उपलब्धियाँ
  • यूनिकोड (Unicode) का आगमन: शुरुआती डिजिटल युग में देवनागरी के लिए अलग-अलग गैर-मानकीकृत फॉन्ट (जैसे कृतिदेव, चाणक्य) हुआ करते थे, जिससे एक कंप्यूटर से दूसरे कंप्यूटर पर टेक्स्ट भेजने पर वह 'कचरा' (Garbled text) बन जाता था। यूनिकोड के आने से देवनागरी को वैश्विक मानक कोडिंग मिली। अब देवनागरी का हर अक्षर दुनिया के हर डिजिटल डिवाइस पर समान रूप से दिखाई देता है।
  • इनपुट टूल्स और कीबोर्ड: गूगल इंडिक कीबोर्ड (Google Indic Keyboard), इनस्क्रिप्ट (InScript) कीबोर्ड और वॉयस-टू-टेक्स्ट (Voice-to-Text) तकनीकों ने देवनागरी में लिखना बेहद आसान बना दिया है। अब कोई भी व्यक्ति अपनी आवाज से देवनागरी में लंबे-लंबे लेख टाइप कर सकता है।
  • सर्च इंजन और एल्गोरिदम: आज गूगल, यूट्यूब और एआई (AI) एल्गोरिदम देवनागरी लिपि को पूरी सटीकता से समझते हैं, जिससे इंटरनेट पर देवनागरी सामग्री की खोज (Search) और उसका उपभोग तेजी से बढ़ा है।
ख. तकनीकी चुनौतियाँ
  • संयुक्ताक्षरों (Ligatures) की समस्या: देवनागरी में जब दो व्यंजन आधे मिलकर एक नया रूप लेते हैं (जैसे क् + ष = क्ष, त् + र = त्र, द् + ध = द्ध), तो कई स्क्रीन और सॉफ्टवेयर इसे सही ढंग से रेंडर (Render) नहीं कर पाते। 'मात्राओं' का अक्षरों के आगे-पीछे या ऊपर-नीचे लगना डिजिटल रेंडरिंग इंजन के लिए आज भी एक जटिल प्रक्रिया है।
  • ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR): अंग्रेजी के लिए ओसीआर (स्कैन की गई छवि से टेक्स्ट निकालना) शत-प्रतिशत सटीक है, लेकिन देवनागरी के लिए, विशेषकर पुरानी किताबों या हस्तलिपियों के मामले में, शिरोरेखा (Top horizontal line) के टूटने या मात्राओं के आपस में मिल जाने के कारण ओसीआर की सटीकता अभी भी ९०-९५% के आसपास ही सिमटी हुई है।

[5.] देवनागरी के मार्ग की प्रमुख बाधाएँ और खतरे

वैश्विक स्तर पर सर्वश्रेष्ठ लिपि होने के बावजूद, देवनागरी को अपने ही देश और वैश्विक पटल पर कुछ आंतरिक और बाह्य खतरों का सामना करना पड़ रहा है।
क. 'रोमन' लिपि का आक्रामक प्रभाव (The Romanization Threat)
आज की युवा पीढ़ी सोशल मीडिया, व्हाट्सएप और चैटिंग के दौरान हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को लिखने के लिए रोमन लिपि का धड़ल्ले से उपयोग कर रही है। इसे आमतौर पर 'हिंग्लिश' (Hinglish) कहा जाता है। उदाहरण के लिए:
  • देवनागरी: “आप कहाँ जा रहे हैं?”
  • रोमन/हिंग्लिश: “Aap kahan ja rahe hain?”
यह प्रवृत्ति दिखने में व्यावहारिक लग सकती है, लेकिन यह देवनागरी के अस्तित्व के लिए एक धीमा जहर (Slow Poison) है। जब युवा पीढ़ी देवनागरी लिखना और पढ़ना छोड़ देगी, तो वे धीरे-धीरे अपनी भाषा के व्याकरण, शुद्ध उच्चारण और समृद्ध साहित्य से पूरी तरह कट जाएंगे।
ख. हीनभावना और अंग्रेजी का वर्चस्व
औपनिवेशिक मानसिकता के कारण आज भी भारत और दक्षिण एशिया के बड़े हिस्से में अंग्रेजी और रोमन लिपि को आधुनिकता, उच्च सामाजिक स्तर और रोजगार का पैमाना माना जाता है, जबकि देवनागरी जानने वाले को पारंपरिक या पिछड़ा समझ लिया जाता है। यह हीनभावना देवनागरी के स्वाभाविक विकास को रोकती है।
ग. मानकीकरण (Standardization) का अभाव
देवनागरी में कुछ वर्णों को लिखने के एक से अधिक तरीके प्रचलित हैं (जैसे: 'अ' और 'ऋ' के पुराने और नए रूप; 'झ' को दो तरीकों से लिखना)। हालांकि केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने इसका मानकीकरण किया है, लेकिन प्रिंट मीडिया, डिजिटल मीडिया और विभिन्न राज्यों की पाठ्यपुस्तकों में आज भी एकरूपता की कमी दिखाई देती है, जिससे नए सीखने वाले भ्रमित हो जाते हैं।

[6.] प्रोत्साहन की दिशा: बहुआयामी कार्ययोजना (Roadmap for Promotion)
देवनागरी लिपि को वैश्विक स्तर पर पुनर्स्थापित करने और इसे २१वीं सदी की सबसे उन्नत लिपि बनाने के लिए एक व्यापक, त्रि-स्तरीय नीति (सरकारी, तकनीकी और सामाजिक) की आवश्यकता है।
क. सरकारी एवं नीतिगत स्तर पर प्रयास
  1. सॉफ्ट पावर और सांस्कृतिक कूटनीति: भारत सरकार को दुनिया भर में स्थित अपने 'भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद' (ICCR) और दूतावासों के माध्यम से 'देवनागरी शिक्षण केंद्र' खोलने चाहिए। विदेशी नागरिकों के लिए विशेष छात्रवृत्ति और 'देवनागरी फेलोशिप' शुरू की जानी चाहिए।
  2. नई शिक्षा नीति (NEP 2020) का पूर्ण क्रियान्वयन: प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा और देवनागरी लिपि को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए। गैर-देवनागरी भाषी राज्यों में भी त्रि-भाषा सूत्र के तहत स्वेच्छा से देवनागरी सीखने के लिए आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएं।
  3. वैश्विक पुरस्कारों की स्थापना: जिस तरह ब्रिटेन का बुकर प्राइज या फ्रांस के साहित्यिक पुरस्कार हैं, उसी तरह देवनागरी लिपि में लिखे गए सर्वश्रेष्ठ वैश्विक साहित्य या शोध के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार (जैसे 'आदिशक्ति देवनागरी पुरस्कार') की स्थापना की जानी चाहिए।
ख. तकनीकी एवं डिजिटल स्तर पर नवाचार
  1. AI और बड़े भाषा मॉडल (LLMs) में समावेशन: चैटजीपीटी (ChatGPT), जेमिनी (Gemini) और भारत के अपने एआई मॉडल (जैसे 'भाषिणी') में देवनागरी के डेटासेट को बड़े पैमाने पर समृद्ध किया जाना चाहिए, ताकि एआई द्वारा अनुवाद पूरी तरह प्राकृतिक और व्याकरण सम्मत हो।
  2. देवनागरी आधारित डोमेन नेम (IDN): इंटरनेट पर वेबसाइटों के पते (URL) अभी भी मुख्य रूप से रोमन में होते हैं। हालांकि .भारत डोमेन उपलब्ध है, लेकिन इसके व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए उद्योगों और सरकारी विभागों को अपनी वेबसाइटें पूरी तरह देवनागरी यूआरएल में संचालित करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा (जैसे: प्रधानमंत्री.भारत)।
  3. बेहतर गेमिंग और बच्चों के ऐप्स: बच्चों को बचपन से ही खेल-खेल में देवनागरी सिखाने के लिए उच्च गुणवत्ता वाले मोबाइल गेम्स, एनिमेशन और इंटरैक्टिव ऐप्स विकसित करने होंगे।

ग. सामाजिक और व्यावहारिक स्तर पर सुधार
  1. "अभिमान देवनागरी" अभियान: सोशल मीडिया पर एक राष्ट्रव्यापी और वैश्विक अभियान चलाया जाना चाहिए जो युवाओं को अपनी मातृभाषा की सामग्री को रोमन के बजाय केवल देवनागरी लिपि में ही लिखने (Typing) के लिए प्रेरित करे।
  2. व्यावसायिक और कॉर्पोरेट जगत में उपयोग: बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के लिए भारत में अपने उत्पादों की पैकेजिंग, विज्ञापनों और दिशा-निर्देशों में देवनागरी लिपि का उपयोग अनिवार्य या अत्यधिक अनुशंसित किया जाना चाहिए।
  3. सार्वजनिक स्थानों पर दृश्यता (Visual Visibility): भारत और प्रवासी बहुल देशों के हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों और पर्यटन स्थलों पर सूचना पट्टों में देवनागरी को प्रमुखता से स्थान मिलना चाहिए, जिससे इसकी वैश्विक दृश्यता बढ़े।


[7.] प्रत्यक्ष तुलना: देवनागरी बनाम रोमन लिपि
यह समझने के लिए कि देवनागरी तकनीकी और भाषाई रूप से कितनी उन्नत है, निम्नलिखित तालिका के माध्यम से इसका दुनिया की सबसे प्रचलित लिपि 'रोमन' से सीधा मूल्यांकन किया जा सकता है:
विशेषता / मापदंडदेवनागरी लिपिरोमन लिपि (अंग्रेजी)
मूल दर्शनअक्षरात्मक (Syllabic): ध्वनि और वर्ण का सीधा, अटूट संबंध।वर्णमालात्मक (Alphabetic): स्वर और व्यंजन स्वतंत्र रूप से अलग होते हैं, कोई निश्चित ध्वनि नियम नहीं।
उच्चारण सटीकताशत-प्रतिशत (100%): जैसा लिखा जाएगा, वैसा ही पढ़ा जाएगा। कोई भ्रम नहीं।असंगत: एक ही अक्षर के कई उच्चारण (जैसे Cat में C = क, Cinema में C = स)।
मूक अक्षर (Silent Letters)शून्य (0): देवनागरी में कोई भी अक्षर मूक या अदृश्य नहीं होता।अत्यधिक: कई शब्दों में अक्षर लिखे जाते हैं पर पढ़े नहीं जाते (जैसे Knife, Psychology, Doubt)।
वर्णों की संख्या52 (14 स्वर, 38 व्यंजन): मानव मुख से निकलने वाली लगभग हर सूक्ष्म ध्वनि के लिए एक स्वतंत्र चिह्न।26 (5 स्वर, 21 व्यंजन): ध्वनियों की कमी के कारण दो या तीन अक्षरों को मिलाकर काम चलाना पड़ता है (जैसे 'Sh' से श, 'Th' से थ)।
शिरोरेखा (Top Line)उपलब्ध: शब्दों को एक सूत्र में बांधती है, जिससे पढ़ने की गति (Reading speed) बढ़ती है और अक्षरों का अलगाव स्पष्ट रहता है।अनुपस्थित: शब्द केवल खाली स्थान (Space) के माध्यम से अलग होते हैं।
वैज्ञानिक क्रमकंठ से ओष्ठ तक: मानव शरीर के उच्चारण तंत्र के प्राकृतिक विज्ञान पर आधारित अत्यंत व्यवस्थित क्रम।यादृच्छिक (Random): A के बाद B और B के बाद C क्यों आता है, इसका कोई वैज्ञानिक या तार्किक आधार नहीं है।




[8.] निष्कर्ष: 21वीं सदी में देवनागरी का भविष्य

देवनागरी केवल अक्षरों का समूह नहीं है, बल्कि यह भारत की हज़ारों साल पुरानी दार्शनिक चेतना, वैज्ञानिक समझ और सांस्कृतिक पहचान का दृश्य रूप है। यह एक ऐसी लिपि है जो अतीत की थाती को संजोए हुए भविष्य की डिजिटल दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की पूरी क्षमता रखती है।
आज जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और वॉयस टेक्नोलॉजी दुनिया की दिशा तय कर रही हैं, देवनागरी की "ध्वनि और लिपि की एकरूपता" इसके लिए सबसे बड़ा वरदान साबित हो रही है। कंप्यूटर विज्ञान के विशेषज्ञों का भी मानना है कि प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (Natural Language Processing - NLP) के लिए देवनागरी जैसी वैज्ञानिक लिपियाँ सबसे कम त्रुटिपूर्ण परिणाम देती हैं।
रोमन लिपि का बढ़ता प्रभाव निश्चित रूप से एक चुनौती है, लेकिन इसे एक अवसर में बदला जा सकता है। यदि हम नीतिगत स्तर पर दृढ़ता दिखाएं, तकनीक को स्वदेशी और सुलभ बनाएं, और सबसे महत्वपूर्ण—अपनी आने वाली पीढ़ी के मन से हीनभावना को मिटाकर देवनागरी के प्रति गौरव का भाव जगाएं, तो वह दिन दूर नहीं जब यह लिपि केवल भारत की राजभाषा का माध्यम न रहकर वैश्विक स्तर पर ज्ञान, विज्ञान और डिजिटल संचार की एक प्रमुख धुरी बनेगी।

देवनागरी का संरक्षण और संवर्धन किसी एक भाषा का संवर्धन नहीं है, बल्कि यह पूरी मानवता की सबसे वैज्ञानिक अभिव्यक्ति प्रणाली को जीवित रखने का महासंकल्प है।



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