Friday, March 21, 2025

Hum To Bhai Vishpayee Hain | Hindi Kavita Sangrah | Dr Ajay Kumar Ojha| Acharya Rabindra Nath Ojha


Hum To Bhai Vishpayee Hain | Hindi Kavita Sangrah | Dr Ajay Kumar Ojha| Acharya Rabindra Nath Ojha



हम तो भाई विषपायी हैं 
(आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा की अनमोल कविताओं का अद्वितीय संग्रह)




संकलन एवं प्रस्तुति 

डॉ. अजय कुमार ओझा 










बिहार विभूति आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा की रचनाओं पर आधृत कई पुस्तकें  अब तक प्रकाशित हो चुकी  हैं और अभी कई प्रकाशनाधीन हैं। उनकी कविताओं के  संग्रह भी प्रकाशित हो चुके  हैं  -  हिन्दी में “हम हों केवल भारतवासी, भोजपुरी में “छलके छलके नयनियाँ के कोर”। एक और कविता संग्रह अब आपके हाथों में है - “हम तो भाई विषपायी हैं”।



आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा की रचनाएँ शाश्वत मूल्यों की रचनाएँ हैं -  चाहे ललित निबंध हो, चाहे कविता हो, चाहे पत्र लेखन हो, चाहे समीक्षा हो ।  2010 में आचार्य जी का अचानक निधन हो  गया और  लगता था कि  उनकी कालजयी  रचनाएँ उनके जाने के बाद नष्ट-विनष्ट हो जाएंगी।  और ये भी तो नहीं मालूम था कि उनकी रचनाएँ कहाँ पर हैं, किस अवस्था में हैं, किस स्थिति में हैं ? उनसे इस पर कुछ बात भी नहीं हो पायी थी।  अचानक जो हम सब को छोड़ कर चले गए।  


जब उनकी रचनाओं की हम खोज कर रहे थे तब ही मुझे उनकी लिखी  कई कविताएँ भी  प्राप्त हुईं।  कविताओं के  दो  संग्रह तो  निकल ही चुके हैं ।  अब ये तीसरा संग्रह है जिसमें सत्ताईस हिन्दी कविताएँ  शामिल की गयीं हैं।  इस संग्रह में भी तरह तरह की कविताएँ हैं  - कुछ प्रकृति पर हैं , कुछ देशभक्ति पर हैं, कुछ ईश वंदना पर  हैं, तो  कुछ दर्शन  से संबंधित। एक कविता तो हिन्दी की महिमा पर ही ही  है -


“हिन्दी   है जन जन की भाषा, हिन्दी  जन मन बानी 

हिन्दी है भारत की ऊर्जा,  इसकी   अमर    कहानी ”


एक कविता तो मंदिर में जूता-चोरी प्रकरण पर है।  कविता थोड़ी लम्बी है पर है बड़ा रोचक।  इस कविता की कुछ पंक्तियाँ मैं उद्धृत करने को बाध्य हो रहा हूँ -


“मंदिर में अब जाऊँ कैसे , कौन करे जूता रखवाली 

मंदिर आते जाते मैंने , जूता  चप्पल   बहुत   गँवाली” 


अच्छा तो अब एक देशभक्ति कविता की कुछ पंक्तियाँ भी देख ही लीजिए- 


“आपस  में  मत लड़ो  साथियो, मत  करो   देश  बदनाम,

कितना सुन्दर कितना प्यारा,मधुर-मधुर भारत यह नाम।”


अब उस कविता की पंक्तियाँ प्रस्तुत करता हूँ जिससे इस पुस्तक का नामकरण हुआ है -

“आपत-विपत  बहुत  ही  झेली,सम्पत्ति  कम  ही पायी है 

  ऐसे जीवन को जो भी कह लो, हम तो भाई विषपायी हैं”


तो इस तरह से हम देखते हैं कि आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा के इस कविता संग्रह में भी विभिन्न विषयों पर जो उनकी अनमोल कविताएँ हैं उनको सम्मिलित किया गया है जिससे यह कविता संग्रह भी पठनीय और संग्रहणीय हो गया है।  


इस कविता संग्रह को तैयार करने में भी मुझे काफी श्रम करना पड़ा।  इधर उधर लिखे व बिखरे पड़े कविताओं को  संग्रहित करना, फिर उनको सुरक्षित रखना क्योंकि जिस कॉपी या डायरी में से इन्हें निकाला गया वह कॉपी या डायरी क्षतिग्रस्त अवस्था में थे, कहीं कहीं लिखावट भी धूमिल हो गयी थी, फिर उनको पढ़ना, ठीक करना, टाइप करना, प्रकाशित करवाना, फिर आप सुधी  पाठकों तक पहुँचाना।  


पर प्रसन्नता की बात है कि आचार्य रवीन्द्रनाथ ओझा की अमूल्य रचनाओं से आप अवगत हो रहें हैं, हर्ष का विषय है कि हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में हम भी कुछ गिलहरी-योगदान दे रहे हैं, खुशी की बात है कि नागरी लिपि का भी प्रचार प्रसार हो रहा है।  है न !


तो अब आप इस कविता संग्रह “हम तो भाई विषपायी हैं” का आनंद लीजिये पर हाँ अनजाने में हुई त्रुटियों के लिए हमें क्षमा करेंगे।  

जय हिंद जय भारत ! 


सधन्यवाद।                                                 

                                                            डॉ अजय कुमार ओझा 

पूर्व संवाददाता, यूनाइटेड न्यूजपेपर्स, दिल्ली  

पूर्व वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी (दूरदर्शन) 

भारतीय प्रसारण सेवा 

एडवोकेट, भारत का सर्वोच्च न्यायालय 

                                              ई-मेल : ajayojha60@gmail.com 

संपर्क : 9968270323 





No comments:

Post a Comment