Friday, September 4, 2026

जय श्रीकृष्णा - जन्माष्टमी क्यों ?

जय श्रीकृष्णा  -

जन्माष्टमी क्यों ?






जय श्री कृष्णा ! श्रीकृष्ण जन्माष्टमी सनातन हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण, पवित्र और हर्षोल्लास से मनाए जाने वाले पर्वों में से एक है। यह केवल एक त्योहार नहीं है, बल्कि भगवान विष्णु के आठवें पूर्ण अवतार, लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण के इस पृथ्वी पर अवतरण का उत्सव है।


सनातन काल गणना के अनुसार, जब-जब पृथ्वी पर पाप, अत्याचार और अधर्म अपनी चरम सीमा को लांघ जाते हैं, तब-तब सृष्टि के संचालक भगवान विष्णु धर्म की पुनः स्थापना के लिए मानव रूप में अवतरित होते हैं। द्वापर युग के अंत में भारतवर्ष की स्थिति कुछ ऐसी ही हो चुकी थी। मगध, मथुरा और उसके आस-पास के क्षेत्रों में शक्तिशाली राजाओं ने जनता का शोषण करना शुरू कर दिया था। सत्ता केवल भोग-विलास और दमन का साधन बन चुकी थी।

श्रीमद्भगवद्गीता के चौथे अध्याय का यह श्लोक इसी शाश्वत सत्य को प्रमाणित करता है:

"यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। 
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥"

पृथ्वी गाय का रूप धारण कर देवताओं के पास रोती हुई पहुँची। उसने गुहार लगाई कि राजाओं के रूप में बैठे ये राक्षस उसका भार बढ़ा रहे हैं। तब क्षीरसागर में विराजमान भगवान नारायण ने देवताओं को आश्वस्त किया कि वे स्वयं यदुवंश में कंस के कारागार में जन्म लेंगे और इस धरा को अधर्म के बोझ से मुक्त करेंगे। कृष्ण का जन्म केवल एक बालक का जन्म नहीं था, वह ब्रह्मांडीय चेतना का अंधकार को मिटाने के लिए लिया गया संकल्प था। 

मथुरा का राजा उग्रसेन एक न्यायप्रिय राजा था, लेकिन उसके दुष्ट पुत्र कंस ने उसे बलपूर्वक गद्दी से उतारकर स्वयं को राजा घोषित कर दिया। कंस का आतंक इतना बढ़ गया कि उसने संतों, ऋषियों और गौ-वंश पर अत्याचार करना अपनी नीति बना लिया। परंतु, उसी कंस का अपनी चचेरी बहन 'देवकी' से अगाध प्रेम था। जब देवकी का विवाह शूरसेन के पुत्र 'वासुदेव' से हुआ, तो कंस स्वयं रथ हांककर अपनी बहन को विदा करने चला।
तभी मार्ग में एक भयंकर और अलौकिक आकाशवाणी हुई: "हे मूर्ख कंस! जिस बहन को तू इतने प्रेम से विदा कर रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरा काल बनेगी।"
इस आकाशवाणी ने कंस के भीतर के भय को जगा दिया। उसने तुरंत तलवार निकाल कर देवकी को मारना चाहा, लेकिन वासुदेव ने बीच में आकर वचन दिया कि वे अपनी प्रत्येक संतान को कंस को सौंप देंगे। कंस ने वासुदेव और देवकी को मथुरा के कालकोठरी (कारागार) में लोहे की मोटी जंजीरों से जकड़ कर बंद कर दिया। उसने एक-एक करके देवकी की छह संतानों की निर्मम हत्या कर दी। सातवें गर्भ में शेषनाग के अंश 'बलराम' थे, जिन्हें योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया। अब प्रतीक्षा थी तो केवल आठवीं संतान की। 
विक्रम संवत के अनुसार, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, रोहिणी नक्षत्र और बुधवार का दिन था। रात के ठीक बारह बज रहे थे। बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, बिजली कड़क रही थी और यमुना उफान पर थी। मथुरा के कारागार के चारों ओर कड़ा पहरा था। लेकिन नियति अपना खेल रच रही थी।
जैसे ही भगवान कृष्ण के अवतरण का क्षण आया, कालकोठरी में एक अलौकिक प्रकाश फैल गया। चतुर्भुज रूप में, शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए साक्षात भगवान नारायण देवकी और वासुदेव के सामने प्रकट हुए। भगवान ने वासुदेव से कहा कि वे उन्हें तुरंत गोकुल में नंदबाबा के घर छोड़ आएं और वहाँ जन्मी कन्या (योगमाया) को मथुरा ले आएं।
इसके बाद जो हुआ, वह चमत्कार से कम नहीं था:
  • कारागार के पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए।
  • वासुदेव और देवकी के हाथों और पैरों में बंधी लोहे की जंजीरें स्वतः ही खुल गईं।
  • कालकोठरी के विशाल लोहे के दरवाजे अपने आप खुलते चले गए।
वासुदेव ने नन्हे कृष्ण को एक सूत की टोकरी में रखा और उसे अपने सिर पर उठाकर आधी रात को ही मूसलाधार बारिश के बीच गोकुल की ओर चल पड़े। मार्ग में विशाल और उफनती हुई यमुना नदी थी। जल का स्तर लगातार बढ़ रहा था। लेकिन जैसे ही वासुदेव नदी में उतरे, भगवान शिव के स्वरूप शेषनाग ने अपने फनों से छत्र तानकर बालक कृष्ण को बारिश से बचाया।
यमुना नदी का जल लगातार ऊपर उठ रहा था क्योंकि वह अपने स्वामी के चरणों को स्पर्श करना चाहती थी। जैसे ही टोकरी के भीतर से बालक कृष्ण ने अपना नन्हा पैर नीचे लटकाया और यमुना के जल को छुआ, यमुना शांत हो गई और उसने वासुदेव को जाने के लिए मार्ग दे दिया। वासुदेव सुरक्षित गोकुल पहुँचे, जहाँ यशोदा के बगल में सो रही कन्या को लेकर वे वापस मथुरा आ गए। यह यात्रा दिखाती है कि जब ईश्वर आपके साथ हों, तो प्रकृति की सबसे विकट बाधाएँ भी आपका मार्ग नहीं रोक सकतीं। 
हम जन्माष्टमी क्यों मनाते हैं, इसके पीछे गहरे दार्शनिक और आध्यात्मिक संदेश छिपे हैं:
  • अंधकार पर प्रकाश की विजय: कृष्ण का जन्म भाद्रपद के 'कृष्ण पक्ष' (अंधेरी रात) में आधी रात को हुआ था। यह दर्शाता है कि जब अज्ञान, वासना और अहंकार का अंधकार मानव मन को घेर लेता है, तब कृष्ण रूपी ज्ञान का प्रकाश भीतर जन्म लेता है।
  • बंधन से मुक्ति का पर्व: कारागार की जंजीरों का टूटना इस बात का प्रतीक है कि सांसारिक बंधनों और मोह-माया से मुक्ति केवल ईश्वर की शरणागति से ही संभव है।
  • वैज्ञानिक और प्राकृतिक दृष्टिकोण: वर्षा ऋतु का यह समय नवजीवन का समय होता है। आयुर्वेद के अनुसार, इस समय व्रत (उपवास) रखने से शरीर की जठराग्नि संतुलित होती है और वर्षा जनित बीमारियों से रक्षा होती है। अर्धरात्रि का शांत वातावरण ध्यान और आत्मचिंतन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 

भगवान राम को 'मर्यादा पुरुषोत्तम' कहा जाता है क्योंकि उन्होंने मर्यादाओं के भीतर रहकर जीवन जिया। परंतु भगवान कृष्ण 'लीला पुरुषोत्तम' हैं। वे विष्णु के एकमात्र ऐसे अवतार हैं जिन्हें 'सोलह कला पूर्ण अवतार' माना गया है। कृष्ण का चरित्र अत्यंत व्यापक और विरोधाभासों से भरा है:
  • वे जहाँ माखन चुराने वाले नटखट 'बालकृष्ण' हैं, वहीं पूतना और कालिया नाग का वध करने वाले महाबली भी हैं।
  • वे गोपियों के साथ रास रचाने वाले 'राधाकृष्ण' हैं, तो रणभूमि में अस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा करने वाले 'योगेश्वर' भी हैं।
  • वे सुदामा के फटे पैर धोने वाले 'दीनबंधु' हैं, तो जरासंध और शिशुपाल का न्याय करने वाले 'द्वारकाधीश' भी हैं।
कृष्ण जीवन के हर रंग को पूरी समग्रता से जीने का संदेश देते हैं। वे संन्यास की बात नहीं करते, वे संसार के भीतर रहकर अनासक्त भाव से कर्तव्य निभाने की प्रेरणा देते हैं। 

जन्माष्टमी मनाने का उद्देश्य तब तक पूरा नहीं होता जब तक हम कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को दिए गए श्रीमद्भगवद्गीता के ज्ञान को न समझें। जब अर्जुन अपनों के मोह में फंसकर अस्त्र डालने लगा, तब कृष्ण ने उसे कायरता से जगाया।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"

कर्मयोग का सिद्धांत: कृष्ण का सबसे व्यावहारिक संदेश यही है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर नहीं। परिणाम की चिंता में वर्तमान को नष्ट करना मूर्खता है। गीता का यह दर्शन आज के आधुनिक युग में तनाव (Stress), अवसाद (Depression) और असफलता के डर से जूझ रहे युवाओं के लिए सबसे बड़ी मानसिक औषधि है। 
जन्माष्टमी पूरे भारत और विश्व भर में अलग-अलग सुंदर रूपों में मनाई जाती है:
  • मथुरा और वृंदावन: यहाँ महीनों पहले से तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। 'छप्पन भोग' लगाए जाते हैं और मंदिरों को अभूतपूर्व रूप से सजाया जाता है।
  • महाराष्ट्र की दही-हांडी: मुंबई और पुणे में गोविदाओं की टोलियाँ मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर बंधी दही-हांडी को तोड़ती हैं। इसका आध्यात्मिक मर्म यह है कि 'हांडी' हमारा अहंकार है और ईश्वर तक पहुँचने के लिए समाज के सभी वर्गों को मिलकर (एक-दूसरे का सहारा बनकर) ऊपर उठना पड़ता है।
  • वैश्विक स्तर पर: इस्कॉन (ISKCON) के माध्यम से आज अमेरिका, लंदन, रूस और अफ्रीका तक में विदेशी नागरिक पीले वस्त्र धारण कर 'हरे कृष्णा हरे रामा' की धुन पर झूमते हैं, जो कृष्ण नाम की वैश्विक स्वीकार्यता को दर्शाता है। 
आज के युग में माता-पिता बालकृष्ण के स्वरूप से 'बाल-मनोविज्ञान' (Child Psychology) सीख सकते हैं। कृष्ण का बचपन बंधनों में नहीं बीता; वे गाय चरवाते थे, माखन चुराते थे, प्रकृति के बीच रहते थे।
  • सीख: यह दर्शन सिखाता है कि बच्चों के विकास के लिए उन्हें केवल किताबी कीड़ा न बनाकर प्रकृति, खेल और स्वतंत्रता के अवसर दिए जाने चाहिए।
  • सच्ची मित्रता: सुदामा और कृष्ण की मित्रता ऊंच-नीच और अमीरी-गरीबी के भेदभाव को मिटाने का सबसे अनुपम उदाहरण है। 
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल कैलेंडर की एक तारीख या उपवास रखकर रात को बारह बजे आरती गा लेने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जन्माष्टमी मनाने की वास्तविक सार्थकता तब है जब हम अपने भीतर छिपे 'कृष्णत्व' को जगाएं।
कृष्ण हमें सिखाते हैं कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों (उनका जन्म कारागार में हुआ, बचपन संकटों में बीता, युद्ध का सामना करना पड़ा), चेहरे पर हमेशा 'मंद मुस्कान' बनी रहनी चाहिए। जीवन को एक बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक 'उत्सव' (Celebration) की तरह जीना ही कृष्ण का वास्तविक दर्शन है। 














Thursday, September 3, 2026

डॉ. अजय कुमार ओझा का काव्य पाठ : ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित कार्यक्रम में

डॉ. अजय कुमार ओझा का  काव्य पाठ : 
ऑथर्स गिल्ड ऑफ इंडिया  द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 








#ऑथर्सगिल्डऑफइंडिया (#AuthorsGuildofIndia) और #दिल्लीविश्वविद्यालय (#DelhiUniversity)के #पीजीडीएवीमहाविद्यालय (#PGDAVCollege, Nehru Nagar)के संयुक्त तत्वावधान में 29 अगस्त 2026 को आयोजित एक भव्य "काव्य गोष्ठी" में काव्य पाठ करते हुए।
"हम तो भाई विषपायी हैं "
#डाॅअजयकुमारओझा की पुस्तक: हम तो भाई विषपायी हैं
(#आचार्यरवीन्द्रनाथओझा की कविताओं पर आधारित कविता संग्रह)
#अनुराधाप्रकाशनदिल्ली से प्रकाशित यह पुस्तक #अमेज़न पर उपलब्ध है।








 

ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी, क्या होगी? - माँ की पुण्य तिथि पर विशेष

ऐ मां तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी, क्या होगी? - माँ की पुण्य तिथि पर विशेष



"उसको नहीं देखा हमने कभी
पर इसकी जरूरत क्या होगी?
ऐ मां तेरी सूरत से अलग
भगवान की सूरत क्या होगी, क्या होगी?"
आज पांच वर्ष बीत गए ममतामयी, करुणामयी, स्नेहमयी, वात्सल्यमयी हमारी मां #श्रीमतीराधिकादेवी को अपना पार्थिव शरीर छोड़े हुए पर फिर भी वह हमारे दिल की हर धड़कन में है, हमारी सांसों की हर सांस में है, हमारे संस्कार के हर आयाम में ‌है - वस्तुत: उसी का अंश हैं हम सब और इस तरह उसका शुभाशीष हमें अनवरत सदा सर्वदा प्राप्त होता रहता है।
लोग पूछते हैं आपने ईश्वर को देखा है ? हमारा उत्तर होता है ‌हां - हमने अपनी मां ‌की आंखों में ईश्वर को देखा है - आपकी दृष्टि अनुकूल होनी चाहिए - क्योंकि जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि।
तो सही ही कहा गया है - 'ऐ मां तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी?'
मां के साथ मां का आशीर्वाद लेता हुआ मेरी आवाज़ में मोबाइल से ही रिकॉर्ड किया हुआ एक गाना आपके समक्ष प्रस्तुत है - मां की पुण्य तिथि पर।








 

Wednesday, September 2, 2026

प्रतिक्रियाएं : अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच' की राष्ट्रीय ऑनलाइन मासिक काव्य गोष्ठी (1 सितंबर 2026)

 

प्रतिक्रियाएं :

अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच' (Anamika Sahityik Evom Sanskritik Manch)  की  राष्ट्रीय ऑनलाइन मासिक काव्य गोष्ठी (1 सितंबर 2026)






स्वागत वक्तव्य :
(डॉ सुशीला ओझा
संरक्षिका
अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच)


अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच पर दूसरे सत्र की आज की इस चतुर्दश ऑनलाइन काव्य गोष्ठी में मैं सुशीला ओझा आप सभी का हार्दिक वन्दन, अभिनन्दन करती हूंँ। यह मंच समीक्षक, आलोचक, शिक्षाविद्, रंगकर्मी, संस्कृतिकर्मी, प्रोफेसर डॉ बलराम मिश्र जी को समर्पित है। अपनी समृद्ध पुस्तकालय का नाम उन्होंने अनामिका रखा था। छायावादी रचनाकारों के प्रति उनका आकर्षण सर्वविदित है। उन्हें स्मरण करना मुझे ऊर्जस्वित और प्रोत्साहित करता है। यह सितम्बर माह अनेक हिन्दी साहित्य सेवियों को स्मरण और नमन करता है। जहाँ एक ओर गोविन्द मिश्र, दुष्यन्त कुमार, राही मासूम रज़ा, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, चित्रा मुद्गल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय, काका हाथरसी, श्रीकान्त वर्मा, कुँवर नारायण, रामधारी सिंह दिनकर जैसे अनेकानेक हिन्दी साहित्य के प्रखर पुंज उद्भट विद्वानों एवं हिन्दी सेवियों की जन्मदिवस और जयंतियाँ हैं, वहीं धर्मवीर भारती, शरद जोशी, रामवृक्ष बेनीपुरी, गजानन माधव मुक्तिबोध, महादेवी वर्मा, रांगेय राघव, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, काका हाथरसी, विष्णु खरे, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, वीरेन डंगवाल, शिव प्रसाद सिंह जैसे माँ सरस्वती के अनेक वरद पुत्र-पुत्रियों की पुण्यतिथियाँ भी हैं। भाद्रपद मास की घनघोर घटाएंँ और तड़ित दामिनी हमें भयभीत कर रही हैं। अपने विकराल रूप में आकर प्रलय एवं आपदा से धरा को छिन्न-भिन्न कर रही हैं। धरती अथाह जलराशि से आप्लावित हो गई है। वर्षा ऋतु कृषकों के लिए अमृतदान बनकर आता है। श्रावण मास में कृषक मन उल्लास और आनंद से मयूर की तरह नृत्य करने लगता है किन्तु भाद्रपद मास में वे ही कृषक भयाक्रांत हो रहे हैं। जहाँ सावन सोहावन, हरसावन, मनभावन होता है, वहीं भादो अपने रौद्र रूप में मूसलाधार वर्षा से सर्वत्र जलप्लावन की स्थिति कर देता है। इसकी भयावहता को देखकर सूने घर में विरहिणी के दुख की कोई सीमा नहीं रह जाती है। विद्यापति करुणासिक्त विरहिणी का बड़ा सुन्दर सजीव चित्रण किया है -"सखि हमर दुखक नहिं ओर/ इभर बादर माह भादर सून मंदिर मोर।" इसी माह में पूर्ण ब्रह्म का जन्म होता है। इस मास में उत्सवधर्मिता का नवोन्मेष होता है। कल्याणकारी जगत पिता शिव का तो यह पवित्र मास समर्पित है ही, साथ ही जगत उद्धारक श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी और गणनायक करिवर वदन को भी समर्पित है। चुनौतियों के बीच जीता-जागता मनुष्य विपरीत परिस्थितियों में भी उत्साह और उत्सवधर्मिता का मार्ग ढूँढ ही लेता है। 
        प्राकृतिक सौंदर्य सुषमा से परिपूर्ण भूमि छत्तीसगढ़ से डॉ संगीता मनीष बनाफर जी, उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक भूमि से डॉ शैलजा दूबे जी, विश्व पटल पर हिन्दी को मान दिलाने वाली महाराष्ट्र की भूमि से डॉ ममता जैन जी, बिहार की बौद्धिक भूमि से सशक्त हस्ताक्षर डॉ अनीता देवी जी, नवोदित किन्तु स्थापित रचनाकार लकी कुमारी जी, अहिन्दी भाषी क्षेत्र से स्त्री स्वर की मुखर अभिव्यक्ति देने वाली श्रीदेवी जी, शक्ति की आराधक शक्तिपुंज भूमि से स्त्री सशक्तिकरण की परिभाषा गढ़ रही दर्शना शर्मा जी, पर्यटन एवं संस्कृति के क्षेत्र में अत्यंत सक्रिय विनय जायसवाल जी, महाराणा के शौर्य और पराक्रम की भूमि से मयंक शर्मा जी - आप सभी की सर्जनात्मक उपस्थिति को मैं नमन करती हूँ। 


          महिला सशक्तिकरण की सार्थक परिभाषा गढ़ रही अध्यक्ष सुमन झा और इस मंच के सभापति डॉ अजय कुमार ओझा का मैं हृदय से स्वागत करती हूँ। इस ऑनलाइन काव्य गोष्ठी के सूत्रधार कमल अपरिचित जी और प्रणति ठाकुर की हिन्दी सेवा भावना को नमन करती हूँ। आप सभी अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ हैं। आपके सुझाव, सहयोग और मार्गदर्शन के बिना इस मंच की कल्पना निराधार है। आप सभी को समक्ष देखकर, सुनकर मैं अत्यंत गौरवान्वित हो रही हूँ। संचालन का संपूर्ण भार यशस्विनी प्रणति ठाकुर को देती हूँ। आप सभी का पुनः वदन, अभिनन्दन करती हूँ। 


कार्यक्रम की अध्यक्ष :
डॉ.संगीता मनीष बनाफर 
बिलासपुर, छत्तीसगढ़ 
(व्याख्याता, साहित्यकार, समाजसेवी, वक्ता )
शिप्रा जी, आज के इस शानदार आयोजन के लिए आपको हार्दिक बधाई! कार्यक्रम सचमुच बेहद उत्कृष्ट रहा, जिसमें सभी अनुभवी और मंजे हुए कवियों ने अपनी उपस्थिति से समा बांध दिया। मंच का संयोजन और संचालन भी अत्यंत उच्च कोटि का था।
​इस भव्य आयोजन में मुझे आमंत्रित करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार। इस अवसर पर पूजनीय माता-पिता जी का असीम स्नेह और आशीर्वाद भी प्राप्त हो रहा था, जिसने इस पूरे अनुभव को मेरे लिए और अधिक अलौकिक व भावनात्मक बना दिया।
​यद्यपि किसी कारणवश मैं कार्यक्रम के अंत तक नहीं रुक पाई, जिसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ, किंतु जितना भी समय वहाँ व्यतीत हुआ वह अत्यंत स्मरणीय रहा। एक बार फिर इस सफल आयोजन के लिए आपको ढेरों बधाइयाँ!


डॉ.  दर्शना शर्मा 
कोलकाता 
(प्रोफेसर, साहित्यकार, समाजसेवी, शोधकर्मी )

शिप्रा दीदी सफल कार्यक्रम की बधाई व शुभकामनाएं।
प्रणति दीदी आप का सुंदर संचालन 👏👏🙏🙏 आपको बधाई व शुभकामनाएं।

डॉ. शिप्रा मिश्रा 
संस्थापिका एवं संयोजक 
अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच 

आप सभी की गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम में चार चांद लग गए 👏



डॉ. ममता जैन
पुणे, महाराष्ट्र 
(पुरातत्व शोधकर्मी, सम्पादक, दूरदर्शन प्रस्तोता, लेखिका )

आदरणीय शिप्रा जी आपको बहुत-बहुत बधाई और बहुत-बहुत धन्यवाद इतना सुंदर साहित्यिक मंच से आपने मुझे जोड़ा कार्यक्रम बहुत सफल रहा आप निश्चित रूप से प्रशंसा के पात्र हैं और आपकी पूरी टीम भी🙏🌹💐
सभी की प्रस्तुति समसामयिक थी.. सारे रस आज के कार्यक्रम में बरसे।


विनय जायसवाल 
कोलकाता 
(साहित्य, संस्कृति , पर्यटन एवं योग के क्षेत्र में सक्रिय )

आज का कार्यक्रम वास्तव में अमरत्व को प्राप्त कर गया।
कुछ आयोजन समाप्त होकर समाप्त नहीं होते—वे स्मृतियों में उतर जाते हैं, और स्मृतियाँ जब हृदय में घर कर लें, तो वही क्षण कालातीत हो जाते हैं।

इस अद्भुत एवं आत्मीय आयोजन के लिए संयोजिका शिप्रा दीदी एवं माताजी के प्रति हृदय की गहराइयों से आभार। 🙏

प्रणति दीदी, कार्यक्रम के इतने सुंदर एवं प्रभावशाली संचालन के लिए आपको हार्दिक बधाई एवं बहुत-बहुत धन्यवाद। आपके सहज, सधे हुए और आत्मीय संचालन ने पूरे कार्यक्रम को एक सुंदर लय, गरिमा और प्रवाह प्रदान किया। सचमुच, मंच संचालन भी एक कला है और आपने इसे बेहद खूबसूरती से निभाया। 🌸🙏

आज ऐसा लगा मानो प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर का कोई एक रंग, कोई एक रस, कोई एक अनुभूति लेकर आया था। उन सभी रंगों और रसों के मिलन से जो हृदयस्पर्शी इंद्रधनुष बना, उसकी सुंदरता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हम सबकी सामूहिक संवेदना की थी। 🌈

मेरे लिए यह अवसर केवल सहभागी होने का नहीं, बल्कि जानने, समझने और सीखने का भी था। कई बार जीवन हमें पुस्तकों से नहीं, बल्कि मनुष्यों से पढ़ाता है; आज ऐसे ही कुछ जीवंत पाठ सीखने का सौभाग्य मिला।

अंततः, हम अंतर्मन से सभी सुधीजनों के प्रति कृतज्ञता एवं आभार व्यक्त करते हैं।

आप सबकी उपस्थिति, आपकी संवेदनाएँ और आपके विचार इस संध्या को एक साधारण कार्यक्रम से उठाकर एक ऐसी स्मृति में बदल गए, जो समय के साथ धुंधली नहीं होगी।

कुछ क्षण बीतते नहीं—वे भीतर बस जाते हैं।
आज का दिन उन्हीं क्षणों में से एक था। 🙏🌸


श्रीमती प्रणति ठाकुर 
महामंत्री एवं संचालक 
अनामिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच 

बहुत बहुत आभार विनय भाई ।आप सबके सारगर्भित काव्य पाठ ने कार्यक्रम को अत्यंत सफल बनाया है। हार्दिक धन्यवाद आप सबका 🙏🙏


मयंक शर्मा 
सीकर, राजस्थान 
(अध्यापक एवं लर्नर )

कल आदरणीया शिप्रा दीदी के कॉल के साथ सार्थक शुरुआत हुई, जब उन्होंने पूछा था कि "समय याद है ना", और उसके बाद वह पूरा समय अत्यंत अविस्मरणीय क्षणों में परिवर्तित होता चला गया।
गोष्ठी में उपस्थित सभी माननीय सदस्यों की उपस्थिति बहुत ही सार्थक रही। सभी वरिष्ठ रचनाकारों के श्रीमुख से जो उत्कृष्ट काव्य-पाठ और प्रेरक विचार सुनने को मिले, वे सीधे हृदय को स्पर्श कर गए। आप सभी गुणीजनों को सुनना और आपकी रचनाधर्मिता से रूबरू होना मेरे लिए एक अत्यंत ज्ञानवर्धक और सुखद अनुभव रहा।
आदरणीया प्रणति जी के कुशल और शानदार संचालन से लेकर हर एक सदस्य का सहयोग अप्रतिम रहा। आपके इस अनुज को आप सबका जो स्नेह और आशीर्वाद मिला है, वह मुझे आजीवन याद रहेगा और निरंतर साहित्य सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा।
इस भव्य आयोजन के लिए सभी का हृदय से अनंत आभार!