Sunday, September 23, 2012

PROF(DR.) RABINDRA NATH OJHA: A UNIQUE PERSONALITY

प्रो (डॉ ) रवीन्द्र नाथ ओझा : अदभुत व्यक्तित्व,विलक्षण  कृतित्व 

(All the images are subject to IPR)
फोटो  डॉ  अजय  कुमार (ओझा)

         


                प्रो    (MkW) johUnz ukFk vks>k (1932&2010)

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राघव शरण पाण्डेय ( भारतीय प्रशासनिक सेवा )
पूर्व सचिव पेट्रोलियम मंत्रालय , भारत  सरकार 

" मैं अपने जीवन में तीन लोगों से बहुत प्रभावित रहा हूँ  - आइन्स्टीन , महात्मा गाँधी और रवीन्द्र नाथ टैगोर। ओझा जी में मैं तीनों महापुरूषों  की छवि पाता हूँ ।"



                               'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' के  विमोचन के अवसर पर मुख्य अतिथि के  रूप में बोलते हुए 


" A tough administrator, a widely read teacher  with a flair for literature, a warm individual and at the same time a stickler for discipline and man with the courage of his convictions."
                                                         From "Viprah BahudhaVadanti"


 Krinwant Sahay
 (Indian Revenue Service)


" Apart  from being a distinguished teacher and a successful writer, another aspect of Shri Ojha's personality that touches me the most is the human element in him. In my opinion, it is this element that makes him outstanding. To appreciate others' problems and attempts to resolve them in the most possible humane manner has been the most focused thing in his nature."
                                                         From"Viprah BahudhaVadanti"



 डॉ बालेन्दु शेखर तिवारी 

" प्रो रवीन्द्रनाथ ओझा  निबन्धकार  नहीं , ललित निबन्धकार  हैं। इस रूप में  उनकी पहचान  ललित निबन्धों  की उस सुदीर्घ  परम्परा  में है, जिसमें हिंदी के कई समर्थ ललित निबन्ध लेखक  हैं -  आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ विद्यानिवास मिश्र,   कुबेरनाथ राय।

ललित निबंध  के स्थापत्य को एक प्रवाहमान और सार्थक विचरण प्रो ओझा  ने प्रदान किया है  और इसे संभव किया है - ललित निबंध के उपकरणों की सुघड़ अन्विति और भावनाओं की बरसात ने।.... उनके निबंध आत्मीयता की मनभावन रंगोली पेश करते हैं। इन रचनाओं में भावुक मन की पुकार है और अनुभव  का संसार भी। इनमें सांस्कृतिक बोध का सारस्वत अनुष्ठान  है और खुली बयार में रचनात्मक गतिशीलता  का सुख भी।इन ललित निबंधों में लालित्य और स्वछंदता का पहला दरवाज़ा भावुकता के इलाके में ही खुला है।

परिवेश और प्रकृति , सारल्य और मनमौजीपन ,  सांस्कृतिक  जुड़ाव और रचनात्मक लावण्य के समन्वय  से बने हैं प्रो ओझा के ललित निबंध और इसी कारण अविस्मरणीय   हैं।
                                                                                                           'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 



डॉ हितेंद्र नारायण मित्रा 'सदानंद '

"सर्वमान्य रचनाकार फिराक गोरखपुरी जी एवं  हरिवंश राय 'बच्चन ' अंग्रेजी भाषा  के अध्यापक होते हुए भी उर्दू एवं  हिंदी साहित्य  के क्षेत्र  में  अपनी अमिट छाप  छोड़ गए हैं , क्यों न मैं  साहित्य सेवक  प्रो रवीन्द्रनाथ ओझा  को भी इसी पंक्ति में मान लूँ। मेरे विचार में  उनके ललित-निबंधों  के संग्रह  भी असाधारण सृजनशीलता  के सनद हैं। 

                                                                                                         'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 


Dr. Sushil Raphael


" This fair-complexioned, handsome and intelligent man, Prof. R.N.Ojha  is a rustic in toto with a lout-like simplicity within, has the guts of a warrior, laughs like a soldier, loves eating sweets and relishes them like child. Look into his eyes and you shall be amazed. They are beautiful and penetrating and in the course of conversation you will not fail to notice or observe occasional flashes or flare-ups of enlightenment and illumination in them."
                                                       
                                                        From"Viprah BahudhaVadanti"





फोटो  डॉ  अजय  कुमार (ओझा)


Prof. B.N.Chaubey

" His way of teaching impressed me very much because we felt no difficulty in understanding his lecture. What he was speaking was fully expressed through his facial and bodily language. His face and body while teaching, was most expressive. What we could not understand through his words, we could understand through his bodily movements, through his gestures and postures. In a way his body and language complemented and supplemented each other to make his teaching thoroughly communicative to the students.His   pronunciation was so clear that the spelling of the words become clearly known to us, letter by letter. One more specialty of Prof. Ojha's method of teaching was that  he taught the lower classes with lower standard and the higher classes with higher standard."

"Considering his love for and contribution to Hindi, Prof. Ojha was nominated a member of Hindi Advisory Committee of Ministry of Railways and then again to the Ministry of Law and Social Justice , Government of India."

                                                          From"Viprah BahudhaVadanti"



मंत्रमुदित 

"हिंदी  के प्रबुद्ध पाठकों  को ज्ञात  है कि  ओझा जी जमकर पत्र लिखते हैं , लम्बे-लम्बे पत्र  लिखते हैं और लगातार लिखते हैं। उनके पत्र 'सारिका ', 'दिनमान', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान', 'नवनीत', 'मधुमती', कादम्बिनी', 'आजकल', 'हंस', जैसी पत्रिकाओं  में  बार-बार छपे हैं। अक्टूबर  1989 के अंक में 'हंस' द्वारा उन्हें प्रबुद्ध पाठक का सम्मान भी  दिया गया है , उनका चित्र भी छापा  गया है।"    
                                                                                                             
                                                                                                                'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 



फोटो  डॉ  अजय  कुमार (ओझा)



प्रो जुबैर अहमद 

"कुछ  लोग टेनिस के बिना  जी नहीं  सकते थे। उन्हें tennis addict कहना उचित होगा। ओझा जी  उसी श्रेणी  में आते हैं। वह क्लास  में पढाने और टेनिस खेलने  में कभी भी अवकाश  नहीं लेते थे। ओझा जी  खेलते समय उसी तरह लीन हो जाते थे जिस प्रकार  कोई साधू तपस्या में डूब जाता है।

एक बार Shri J.S. Barara  IAS अपना  कैमरा लेकर आये। उन्होंने केवल ओझा जी  का फोटो खींचा और कैमरा बंद कर दिया। उन्होंने बताया कि ओझा जी में मैंने एक अनोखी बात देखी। संभवतः ओझा जी विश्व के एकमात्र   खेलाड़ी हैं जो धोती पहन कर भी इतना अच्छा टेनिस खेल सकते  हैं। यह  टेनिस का भारतीयकरण  है।"
                                                               
                                                                                                               'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 


मोहम्मद शमी 

" साठ के दशक के पूर्वार्ध  में अंग्रेजी विभाग  के वार्षिकोत्सव के अवसर पर श्री आर  एन  ओझा  ने Shakespeare के एक कठिन नाटक                         'A Mid-Summer Night's Dream'  का मंचन अपने ही निर्देशन और निगरानी में कराया।हम सभी साथियों ने  प्रोफेसर  आर  एन  ओझा जी के कठिन परिश्रम से कराये गए अभ्यास से ड्रामा को बड़े ही कुशल तरीके से रंगमंच पर प्रस्तुत किया।

 Chairman, District Collector Shri C.R.Vaidyanathan IAS   सहित सभी ने नाटक के निर्देशक  प्रोफेसर  आर  एन  ओझा की कोशिशों की भूरि -भूरि  प्रशंसा की तथा उन्हें हार्दिक बधाई  दी। बेतिया (Bettiah) शहर में पहली बार इस तरह के नाटक का आयोजन  किया गया था जिसकी प्रशंसा दर्शकों ने इतनी खुलकर की। इस सफलता का पूरा श्रेय आदरणीय  प्रोफेसर  आर  एन  ओझा  को जाता  है।"
                                                             
                                                                                                                  'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 


डॉ विजय प्रकाश 

"मैंने विश्व का  श्रेष्ठतम साहित्य पढ़ा  है  और श्रेष्ठ  साहित्यकारों-कलाकारों की उपलब्ध जीवनियों के आधार पर मुझे पता है कि श्रेष्ठ साहित्य का सृजन करनेवाले लेखक -कवि  के लिए श्रेष्ठ मनुष्य होना आवश्यक नहीं है , अपने पत्र में आपने अपनी जिन चार पुस्तकों की चर्चा की है , उन्हें मैंने नहीं पढ़ी है , इसलिए मुझे नहीं पता कि साहित्यकारों की श्रेणी में आप कहाँ बैठते हैं ; परन्तु  विगत दो दशकों के पत्र-व्यवहार से मैं जानता हूँ और पूर्ण विश्वास से कह सकता हूँ कि ईश्वर ने आप जैसा श्रेष्ठ मनुष्य बनाना अब बहुत  कम कर दिया है।"

"पत्राचार खूब हुआ है पर प्रत्यक्ष दर्शन नहीं हुआ। मैं बहुत भावुक हूँ।मेरे पिता बहुत  छोटे में ही मुझे छोड़ कर चले गए। मैं नहीं जानता मेरा -आपका पूर्व जन्म का कोई रिश्ता है या नहीं। लेकिन आप ने मुझे अहैतुक स्नेह दिया है  -  It cannot be described in words. it is beyond all words."
                                                                  
                                                                                                              'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 




शंभुनारायण ओझा 
मेरे गुरुदेव , मेरे बाबूजी : रवीन्द्रनाथ  ओझा

"प्रो ओझा 1988 से ही मेरे गुरु , मेरे शिक्षक ,मेरे  अभिभावक , मेरे मार्गदर्शक , मेरे पथ-प्रदर्शक ,मेरे प्रकाश -पुंज  एवं प्रेरणा-स्रोत रहे हैं।

वे मुझे इस तरह संजोते -संवारते -संभालते -अपनाते गए जैसे  कि मैं उनका कोई खोया हुआ ,अरसे से बिछड़ा  हुआ पुत्र ही हूँ। उन्होंने  मुझे वह  सब कुछ दिया  जिसकी मुझे उस वक्त ज़रूरत थी  और आज मैं जो कुछ भी हूँ,उन्हीं के स्नेह -आशीर्वाद की बदौलत। और सच पूछिये तो मैं तो यहाँ तक कह सकता हूँ 'एस एन ओझा माईनस  आर एन ओझा बराबर जीरो।"


                                                                                                             'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 

   

फोटो  डॉ  अजय  कुमार (ओझा)

डॉ आदिनाथ उपाध्याय 
पी एच डी ,संगीतशास्त्र (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय )


"ओझा जी  सपरिवार मेरे ही आवास में ठहरे हुए थे।  ये उन दिनों एकांत कमरे में 'हरे राम हरे कृष्ण 'धुन गा-गाकर खूब मस्त होकर नाचने लगते थे। मगर तारीफ की बात यह थी कि इनका स्वर -ताल  अंत-अंत तक मेंटेन रहता था।प्रायः ऐसा होता कि मैं जिस राग में गाने का अभ्यास कर रहा होता उसी राग में ये 'हरे राम हरे कृष्ण' गाने लगते।इनके  द्वारा यह काम प्लानिंग  अथवा  पारस्परिक समन्वय से नहीं होता था , बिलकुल अनजाने में होता था। क्योंकि मैं अपने कमरे में होता था  और ये अपने में।मैं इन्हें इस बात का कभी  एहसास नहीं होने देता कि मैं इनके लिए लिए कोई प्रयोग कर रहा हूँ।एक दिन  मुझे थोड़ा कौतूहल जगा , मैंने सोचा आज एक कठिन राग उठाता हूँ फिर देखूं  क्या ये उसे भी अपने 'हरे राम हरे कृष्ण' में सेट कर लेते हैं। मैंने 'राग  तोड़ी' जो उच्च कक्षा का एक कठिन राग है उठाया , यह सोचकर कि इसे तो हरगिज नहीं कर पाएंगे। किन्तु मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, मैंने देखा कि इनके लिए तो कोई अंतर ही नहीं पड़ रहा,बड़े आराम से एकदम कम्फर्टेबली राग तोड़ी कि धुन पर 'हरे राम हरे कृष्ण' गाये जा रहे हैं। इसे आप क्या कहेंगे ? क्योंकि इस लेवेल का प्रदर्शन तो एक निष्णात संगीतवेत्ता ही कर सकता है।"  


                                                                                                                    'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 




प्रो ठाकुर रसिकचन्द्र सिन्हा                                                         



"ओझा जी में  एक खूबी मैंने देखी है कि वे जिस काम में पड़ते  हैं  पूरे   मनोयोग से पड़ते हैं, पूरे दिल से पड़ते हैं। इसलिए जिधर भी जाते हैं, जिस क्षेत्र  में जाते हैं अपनी एक विशिष्ट छाप छोड़ते हैं, अपनी एक अलग पहचान बना लेते हैं।कॉलेज के शुरूआती दिनों में(कॉलेज की स्थापना 1956 में हुई थी ) उन्होंने Shakespeare के तीन कठिन नाटकों (Macbeth, Othello , A Mid Summer Night's Dream)  का पुनर्लेखन कर उन्हें मंचित कराया जो काफी सफल रहा, काफी सराहा गया। यह काम बड़ा कठिन और दुरूह था पर यह उनके मनोयोग , उत्साह और प्रेरणा का ही परिणाम कहा जायेगा कि एक छोटी जगह (Bettiah, Champaran, ---------------------Bihar) के एक छोटे कॉलेज(M.J.K College) में Shakespeare के तीन-तीन  नाटकों का सफलता पूर्वक मंचन हो सका।"


                                                                                                            'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 

डॉ बलराम मिश्र 

"ओझा जी एक सफल आदर्श प्राध्यापक रहे हैं। सहृदय ,श्रद्धा-सम्पन्न शिष्यों की विपुल संख्या है , उन सबके प्रति स्नेह-भाव से लबालब भरा हुआ ओझा जी का ह्रदय  है, उनमें प्रगाढ़ता है ; किन्तु  मूलतः वे साहित्यस्रष्टा   हैं , रचनाकार हैं , सर्जक हैं। उनमें अध्यात्मिक रूचि की प्रगाढ़ता है ,दार्शनिकता की प्रवृत्ति भी उनमें चरम सीमा पर है।उन्हें रुढ़िवादी धार्मिक नहीं कहा जा सकता किन्तु उन्हें अधार्मिक नहीं कहा जा  सकता। छद्म धर्म,
साम्प्रदायिकता, अंध विश्वास के वे विरोधी हैं। उनकी दार्शनिक चेतना प्रबल है।"

रवीन्द्र  नाथ ओझा  व  डॉ  बलराम' मिश्र
फोटो  डॉ  अजय कुमार (ओझा)


"खेल में उनकी रूचि है। कॉलेज में नियमित टेनिस(Tennis)खेलते थे।कभी Football  भी खेलते होंगे किन्तु क्रिकेट(Cricket) की कमेंट्री  (Commentary) सुनने का उनका शौक चरम सीमा पर है ; इस पर वे जान न्योछावर करते हैं। रेडियो -टेलीविज़न ( Radio-Television) पर उनके कान, उनकी आँखे लगी रहती हैं।वे अपना सुधबुध खो बैठते हैं, खाने-पीने-सोने की भी उपेक्षा कर देते हैं।प्रायः कमेंट्री  अकेले सुनते हैं।एकांत में आत्ममुग्ध होकर उछलते,कूदते,हँसते , आनंदित हो तथा दुखी होते भी देखे जाते हैं। खेल का आनंद वे अपने पूरे व्यक्तित्व से लेते  हैं।


                                                                                                           'विप्राः बहुदा  वदन्ति ' से 






  



    





















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