पुस्तक समीक्षा :
"कश्यपमीर"
(ऋषि कश्यप की धरती तो सदियों से सनातनी है)
लेखक : डॉ. अजय कुमार ओझा
प्रकाशक : लोकमित्र
इस पुस्तक का प्राक्कथन श्री गिरीश कौल ने लिखा है जिनका जन्म अनंतनाग के वेरीनाग तहसील के एक गाँव में हुआ था पर चरम आतंकवाद और कश्मीर में अस्थिरता के चलते अपने ही देश में अपनी ही भूमि-घर से पलायन के लिए विवश होना पड़ा - कश्मीर के एक मूल निवासी को ही अपनी ही मिट्टी से निर्मूल होना पड़ा।
‘कश्यपमीर’ : नाम में ही निहित एक कथा
‘कश्यपमीर’ शब्द अपने आप में अत्यंत आकर्षक है। सामान्यतः हम ‘कश्मीर’ कहते हैं, किंतु ‘कश्यपमीर’ शब्द के माध्यम से लेखक उस सांस्कृतिक आख्यान की ओर संकेत करते हैं जिसमें इस भूभाग का संबंध ऋषि कश्यप से जोड़ा जाता है।
भारतीय पुराण-परंपरा में कश्मीर की उत्पत्ति और उसके भूगोल से संबंधित कथाएँ मिलती हैं। नीलमतपुराण कश्मीर के प्राचीन धार्मिक-सांस्कृतिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है। कश्मीर की झील को सुखाकर आबाद किए जाने की कथा भी इसी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। ऐतिहासिक दृष्टि से इन आख्यानों की व्याख्या अलग-अलग प्रकार से की जा सकती है, लेकिन सांस्कृतिक स्मृति के स्तर पर उनका महत्त्व निर्विवाद है।
डॉ. ओझा की पुस्तक का विशेष आकर्षण यही है कि वह कश्मीर को केवल राजनीतिक घटनाओं की भूमि के रूप में देखने के बजाय उसे एक दीर्घ सांस्कृतिक यात्रा के रूप में देखने का अवसर प्रदान करती है।
कश्मीर की सनातन सांस्कृतिक परंपरा
कश्मीर भारतीय ज्ञान-परंपरा के अनेक आयामों का केंद्र रहा है। शैव दर्शन, संस्कृत साहित्य, तंत्र, दर्शन, काव्य, कला और आध्यात्मिक साधना के क्षेत्र में कश्मीर की विशिष्ट भूमिका रही है।
कश्मीर शैव दर्शन भारतीय दार्शनिक परंपरा की एक अत्यंत महत्वपूर्ण धारा है। अभिनवगुप्त जैसे महान आचार्य ने दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र और आध्यात्मिक चिंतन को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ भारतीय इतिहास-लेखन की परंपरा में कश्मीर के संदर्भ में एक असाधारण कृति है।
इस दृष्टि से ‘कश्यपमीर’ का सांस्कृतिक आधार केवल धार्मिक भावना तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक व्यापक दार्शनिक, साहित्यिक और सभ्यतागत विरासत भी है।
कॉफी-टेबल पुस्तक की विशिष्टता
कॉफी-टेबल पुस्तक का मूल आकर्षण उसका दृश्यात्मक संसार होता है। सामान्य शोधग्रंथ जहाँ पाठक को मुख्यतः शब्दों के माध्यम से किसी विषय तक ले जाता है, वहीं कॉफी-टेबल पुस्तक चित्र, रंग, दृश्य, छोटे-छोटे आलेख और संक्षिप्त टिप्पणियों के माध्यम से विषय को अनुभव कराने का प्रयास करती है।
‘कश्यपमीर’ इसी विधा की संभावनाओं का उपयोग करती हुई दिखाई देती है। कश्मीर के पर्वत, घाटियाँ, जलधाराएँ, मंदिर, स्थापत्य, प्राकृतिक सौंदर्य और सांस्कृतिक प्रतीक—इन सबको एक साथ देखने पर कश्मीर की एक ऐसी छवि उभरती है जिसमें प्रकृति और संस्कृति एक-दूसरे से अलग नहीं दिखाई देते।
यही इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक है—प्रकृति को संस्कृति से और संस्कृति को इतिहास से जोड़कर देखना।
कश्मीर की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का चित्रात्मक दस्तावेज
डॉ. अजय कुमार ओझा की कॉफी-टेबल पुस्तक ‘कश्यपमीर’ कश्मीर की प्राचीन सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को केंद्र में रखकर तैयार की गई एक महत्वपूर्ण दृश्यात्मक कृति है। पुस्तक का उपशीर्षक—‘ऋषि कश्यप की धरती तो सदियों से सनातनी है’—कश्मीर की प्राचीन सांस्कृतिक स्मृति की ओर संकेत करता है और पाठक को उन स्थलों की यात्रा पर ले जाता है जो इस भूभाग के इतिहास, आस्था, स्थापत्य और सभ्यता के विविध पक्षों को सामने रखते हैं।
पुस्तक की विषय-वस्तु को देखते हुए स्पष्ट होता है कि लेखक ने कश्मीर की पहचान को केवल प्राकृतिक सौंदर्य तक सीमित नहीं रखा है। परिहासपुरा से अवन्तिस्वामी और अवन्तीश्वर तक, नरानाग से मार्तण्ड तक, तथा शारिका अम्बा से खीर भवानी तक—पुस्तक अनेक ऐसे स्थलों को एक साथ प्रस्तुत करती है जो कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति के अलग-अलग अध्यायों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
पन्द्रह पड़ावों में कश्मीर की सांस्कृतिक यात्रा
पुस्तक का अनुक्रम स्वयं एक सांस्कृतिक यात्रा का रूप ले लेता है। इसमें सम्मिलित पन्द्रह स्थल हैं—
- परिहासपुरा
- नरानाग
- प्राचीन पोखरीबल मंदिर
- श्री शारिका अम्बा मंदिर
- सुगंधेश मंदिर
- शंकर गौरीश्वर मंदिर
- वेरीनाग
- माता खीर भवानी जी मंदिर
- ज्येष्ठा देवी मंदिर
- रानी मंदिर, गुलमर्ग
- सूर्य मंदिर मार्तण्ड तीर्थ
- प्राचीन मार्तण्ड मंदिर
- बुमजुवा गुफा और मंदिर
- अवन्तिस्वामी मंदिर
- अवन्तीश्वर मंदिर
इस सूची को केवल विषय-सूची कहना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तव में यह कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति का एक मानचित्र है।
परिहासपुरा : वैभवशाली अतीत की स्मृति
परिहासपुरा कश्मीर के इतिहास में राजा ललितादित्य मुक्तापीड से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ के पुरातात्त्विक अवशेष कश्मीर के उस ऐतिहासिक काल की ओर संकेत करते हैं जब स्थापत्य और धार्मिक संरचनाओं का व्यापक निर्माण हुआ।
‘कश्यपमीर’ में परिहासपुरा का समावेश पुस्तक को केवल धार्मिक स्थलों के संकलन से आगे ले जाता है। यह कश्मीर की राजनीतिक और स्थापत्य विरासत की ओर भी पाठक का ध्यान आकर्षित करता है।
नरानाग : जल, तीर्थ और स्थापत्य का संगम
नरानाग कश्मीर की प्राचीन स्थापत्य परंपरा का महत्वपूर्ण स्थल है। यहाँ स्थित प्राचीन मंदिर-समूह और उससे जुड़ा प्राकृतिक परिवेश इस बात का उदाहरण प्रस्तुत करता है कि कश्मीर में धार्मिक स्थल प्रकृति से कितनी गहराई से जुड़े हुए थे।
नरानाग को पुस्तक में स्थान देना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे कश्मीर की प्राचीन तीर्थ-परंपरा और स्थापत्य कला दोनों को समझने का अवसर मिलता है।
शारिका अम्बा से खीर भवानी तक : जीवित आस्था की परंपरा
पुस्तक में श्री शारिका अम्बा मंदिर, माता खीर भवानी जी मंदिर और ज्येष्ठा देवी मंदिर जैसे स्थलों को शामिल किया गया है। ये स्थल केवल पुरातात्त्विक अवशेष नहीं हैं, बल्कि धार्मिक स्मृति और आस्था की जीवित परंपरा से जुड़े हुए हैं।
यहीं पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है—यह कश्मीर को केवल ‘अतीत के अवशेषों’ में नहीं खोजती, बल्कि उन धार्मिक परंपराओं में भी खोजती है जो आज तक विभिन्न रूपों में स्मृति और आस्था का हिस्सा बनी हुई हैं।
वेरीनाग : प्रकृति में संस्कृति का दर्शन
वेरीनाग का समावेश पुस्तक की विषय-वस्तु को एक अलग आयाम प्रदान करता है। यहाँ प्राकृतिक जल-स्रोत और उससे जुड़ी सांस्कृतिक स्मृतियाँ कश्मीर की उस परंपरा को सामने लाती हैं जिसमें जल को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन और पवित्रता से जोड़कर देखा गया। वेरीनाग पवित्र नदी वितास्ता (झेलम) का उद्गम स्थल है।
इस प्रकार ‘कश्यपमीर’ में प्रकृति और संस्कृति का संबंध बार-बार उभरता है।
मार्तण्ड : कश्मीर के स्थापत्य वैभव का प्रतीक
पुस्तक में ‘सूर्य मंदिर मार्तण्ड तीर्थ’ और ‘प्राचीन मार्तण्ड मंदिर’ को अलग-अलग प्रविष्टियों के रूप में स्थान दिया जाना विशेष ध्यान आकर्षित करता है। मार्तण्ड सूर्य मंदिर कश्मीर की प्राचीन स्थापत्य परंपरा का सबसे प्रसिद्ध प्रतीकों में से एक है।
इसके विशाल अवशेष आज भी दर्शक को उस स्थापत्य-परंपरा की कल्पना करने के लिए प्रेरित करते हैं जिसने कभी इस क्षेत्र को भव्य धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों से समृद्ध किया था।
मार्तण्ड के माध्यम से पुस्तक केवल एक मंदिर का परिचय नहीं देती; वह पाठक को सूर्योपासना, स्थापत्य, इतिहास और कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति के परस्पर संबंधों पर विचार करने का अवसर देती है।
अवन्तिस्वामी और अवन्तीश्वर : इतिहास के स्थापत्य साक्ष्य
अवन्तिस्वामी मंदिर और अवन्तीश्वर मंदिर का समावेश पुस्तक के ऐतिहासिक विस्तार को और मजबूत करता है। अवन्तिपुर से जुड़े ये मंदिर कश्मीर की प्राचीन मंदिर स्थापत्य परंपरा के महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
इन स्थलों के भग्नावशेष आज भी अतीत की स्थापत्य प्रतिभा के साक्षी हैं। किसी कॉफी-टेबल पुस्तक में ऐसे स्थलों के उच्च गुणवत्ता वाले चित्र पाठक को उन अवशेषों को केवल ‘खंडहर’ के रूप में देखने के बजाय उनके पीछे छिपे इतिहास को समझने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
सुगंधेश और शंकर गौरीश्वर : स्थानीय स्मृति के महत्वपूर्ण केंद्र
सुगंधेश तथा शंकर गौरीश्वर मंदिरों को शामिल करके लेखक ने कश्मीर की मंदिर-परंपरा के अपेक्षाकृत कम चर्चित पक्षों की ओर भी ध्यान खींचा है। इससे पुस्तक का दायरा कुछ प्रसिद्ध स्मारकों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह व्यापक सांस्कृतिक भूगोल की ओर बढ़ता है।
यह विशेषता पुस्तक को एक प्रकार के दृश्यात्मक सांस्कृतिक सर्वेक्षण का स्वरूप प्रदान करती है।
बुमजुवा गुफा और मंदिर
बुमजुवा गुफा और मंदिर पुस्तक के उन अध्यायों में से है जो कश्मीर की धार्मिक परंपराओं के विविध रूपों को सामने लाते हैं। गुफा, मंदिर और प्राकृतिक परिवेश का संबंध भारतीय धार्मिक वास्तु एवं साधना-परंपरा की एक व्यापक विशेषता रहा है।
ऐसे स्थलों का दस्तावेजीकरण विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इनके माध्यम से मुख्यधारा के पर्यटन-मानचित्र से बाहर स्थित सांस्कृतिक धरोहरों पर भी ध्यान जाता है।
रानी मंदिर, गुलमर्ग : परंपरा और आधुनिक स्मृति
रानी मंदिर, गुलमर्ग पुस्तक में एक अलग प्रकार की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक परत जोड़ता है। गुलमर्ग की आधुनिक पर्यटन पहचान के बीच यह मंदिर उस क्षेत्र की धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति को सामने लाता है।
इस प्रकार पुस्तक प्राचीन पुरातात्त्विक स्थलों के साथ अपेक्षाकृत आधुनिक काल से जुड़े धार्मिक स्थल को भी अपने सांस्कृतिक आख्यान में स्थान देती है।
‘कश्यपमीर’ की सबसे बड़ी विशेषता : दृश्यात्मकता
कॉफी-टेबल पुस्तक की शक्ति उसके शब्दों के साथ-साथ उसके चित्रों में होती है। ‘कश्यपमीर’ के संदर्भ में यह विशेषता और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि कश्मीर की विरासत को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि स्थापत्य के दृश्य, प्राकृतिक परिवेश और स्मारकों की संरचना के माध्यम से भी अनुभव किया जा सकता है।
एक मंदिर का भग्न शिखर, किसी प्राचीन पत्थर की नक्काशी, किसी तीर्थ का प्राकृतिक परिवेश या किसी जलस्रोत का दृश्य—ये सभी पाठक के मन में इतिहास की एक प्रत्यक्ष अनुभूति उत्पन्न करते हैं।
यही कारण है कि ‘कश्यपमीर’ को केवल पढ़ने की पुस्तक नहीं, बल्कि देखने और अनुभव करने की पुस्तक भी कहा जा सकता है।
कश्मीर : केवल घाटी नहीं, एक सभ्यतागत स्मृति
‘कश्यपमीर’ का सबसे महत्वपूर्ण संदेश कश्मीर को देखने की दृष्टि से संबंधित है। कश्मीर को प्रायः उसकी प्राकृतिक सुंदरता—बर्फीले पर्वतों, झीलों, बागों और घाटियों—के लिए जाना जाता है। किंतु इस पुस्तक के पन्द्रह पड़ाव बताते हैं कि कश्मीर का एक दूसरा चेहरा भी है—उसकी सभ्यतागत और सांस्कृतिक स्मृति।
परिहासपुरा इतिहास का स्मरण कराता है, नरानाग स्थापत्य का; मार्तण्ड सूर्योपासना और स्थापत्य का; अवन्तिस्वामी और अवन्तीश्वर प्राचीन मंदिर-परंपरा का; शारिका और खीर भवानी जीवित धार्मिक आस्था का; जबकि वेरीनाग प्रकृति और संस्कृति के संबंध का।
इस प्रकार पुस्तक के विभिन्न स्थल मिलकर कश्मीर की एक बहुआयामी तस्वीर बनाते हैं।
इतिहास, आस्था और अकादमिक दृष्टि
पुस्तक का सांस्कृतिक आग्रह स्पष्ट है। ऐसे विषयों पर लिखते समय एक अकादमिक पाठक के लिए यह भी आवश्यक है कि पुराणिक आख्यान, लोकविश्वास, धार्मिक परंपरा और पुरातात्त्विक/ऐतिहासिक प्रमाणों को उनके-अपने संदर्भ में समझा जाए।
यही संतुलित दृष्टि ‘कश्यपमीर’ को आगे के गंभीर अध्ययन के लिए उपयोगी आधार बना सकती है। पुस्तक का उद्देश्य यदि पाठक को इन स्थलों तक पहुँचाना और उनके बारे में जिज्ञासा उत्पन्न करना है, तो यह कॉफी-टेबल विधा की एक सार्थक उपलब्धि है।
एक पुस्तक, अनेक यात्राएँ
‘कश्यपमीर’ को पढ़ते हुए वास्तव में पन्द्रह अलग-अलग यात्राएँ आरंभ होती हैं—इतिहास की यात्रा, स्थापत्य की यात्रा, आस्था की यात्रा, प्रकृति की यात्रा और स्मृति की यात्रा।
यह पुस्तक पाठक से जैसे कहती है कि कश्मीर को केवल पर्यटन की आँख से न देखें। उसके मंदिरों, जलस्रोतों, भग्नावशेषों और तीर्थस्थलों के पीछे छिपी दीर्घ सांस्कृतिक यात्रा को भी समझें।
और अंत में
‘कश्यपमीर’ डॉ. अजय कुमार ओझा की एक ऐसी कॉफी-टेबल पुस्तक है जो कश्मीर की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को दृश्यात्मक रूप में सामने लाने का प्रयास करती है। इसके अनुक्रम में सम्मिलित पन्द्रह स्थल पुस्तक को व्यापक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं।
यहाँ परिहासपुरा का इतिहास है, नरानाग का स्थापत्य है, शारिका की आस्था है, वेरीनाग की प्रकृति है, खीर भवानी की धार्मिक परंपरा है, मार्तण्ड का स्थापत्य वैभव है और अवन्तिस्वामी-अवन्तीश्वर के प्राचीन अवशेष हैं।
इन सबको एक साथ देखने पर ‘कश्यपमीर’ केवल कश्मीर के मंदिरों की पुस्तक नहीं रह जाती; वह कश्मीर की सांस्कृतिक स्मृति का एक चित्रात्मक कोलाज बन जाती है।
पुस्तक का शीर्षक अपने आप में इसकी मूल भावना को व्यक्त करता है—कश्यप से कश्मीर तक की सांस्कृतिक स्मृति।
इस दृष्टि से ‘कश्यपमीर’ उन पाठकों के लिए विशेष आकर्षण का विषय हो सकती है जो कश्मीर के प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ उसकी प्राचीन सभ्यता, मंदिर स्थापत्य, तीर्थ-परंपरा और सांस्कृतिक विरासत को भी जानना चाहते हैं।
‘कश्यपमीर’ अंततः कश्मीर को देखने का निमंत्रण ही नहीं, उसे उसकी स्मृतियों में पहचानने का निमंत्रण है।